टोपी दिवस और धोती दिवस अलग अलग राष्ट्रीयता का प्रदर्शन : विकास प्रसाद लोध

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विकास प्रसाद लोध, लुम्बनी, ४ जनवरी | जनवरी एक तारीख अन्तर्राष्ट्रीय समय सुचक जो विश्व मे नयाँ साल की सुरूवात का संकेत करता है। विश्व के अनेको देश इस दिन को वड़े हर्षोउल्लास के साथ स्वागत करते हैं। वहीं नेपाल के लोगों ने भी नयें साल २०१७ का स्वागत किया, परन्तु कुछ अलग थलग अन्दाज मे। “हम किसी से कम नही” के अन्दाज मे लोगों मे उमड़े भावनावों को देख लगता था कि नये साल  की स्वागत विल्कुल आलग तरीके से हो रहा है। नेपाली मुलके लोगो के तरीका कुछ और मधेशी मुल के लोगो के तरीका कुछ और देखने को मिली। जिस मे कही न कही एक विशेष प्रकार कि भावनात्मक वटवारा भी दिखा। फस्ट जनवरी राष्ट्रीय पोसाग दिवश के रूप मे धोषणा हुइ। नेपाली समुदाय अपने राष्ट्र पोसाक का पर्दर्शन करने मे व्यस्त।

इसविच  मधेशी, मुस्लिम और थारू समुदाय के लोग आखिर चुप कैसे रहते उन्होंने भी आपना अलग राष्ट्र पोसाक का प्रदर्शन कर डाला। नेपालीयो ने टोपी प्रदर्शन किया तो मधेश वासी गर्व से धोती प्रदर्शन करने मे तनिक भी पिछे नही हटे। ताजुव कि वात है ” जो मधेशी थारू अभी तक नेपाली वन्ने के लिए ललाईत थे, जिन मधेशीयो का अन्तिम सपना नेपाली वनना रहता था। उन पर क्या जादु चल गइ ? क्या होगया उन्हें जो आज वे नेपाली वनने से अधिक गर्व मधेशी वनने मे महसुश करने लगे। सोचने योग्य वात है आखिर एक ही छत के निचे रह रहे लोगों मे दो तरीके से नयाँ साल (राष्ट्रीय पोसाक दिवश) मनाने की सोच कहाँ, कैसे और क्यो उत्पन्न हुइ ? अगर इसे समान्य मे लिया जाए तो  सायद वहुत वड़ा भुल सावित हो सकता है। इस पुरे घटनाक्रम को, यदि नजदिक से देखा जाए, तो इसे अपनी राष्ट्रियता प्रदर्शन करने हेतु एक माध्यम के रूप मे प्रयोग किया गया। जिसको राष्ट्र पोसाक दिवश का नाम दिया गया। जहाँ अनेको भेषभुषा के लोग है वहाँ किसी एक पोसाक को राष्ट्रिय पोसाक के रूपमे प्रयोग करना कितनी महानता है वह आप स्वयम विचार कर सकते है। नेपाल के द्वारा लादी गई भेषीक उपनिवेश का वहिस्कार का माध्यम मधेशीयो ने धोती दिवश के रूप मे प्रस्तुत किया। और सायद यह वहिस्कार आन्दोलन का सुरूवात हो सक्ता है।

नेपाली शासको द्वारा सदियो से मधेश पर नियन्त्रण करने के लिए एक से एक नियम कानुन लादे गए है। मैथली अवधी, थारू, भोजपुरी,भाषा वोल्ने वाले मधेशी समुदाय पर जवरन नेपाली को राष्ट्रीय भाषा कायम कर नेपाली मे ही वोलने, लिखने तथा पढ़ने पर मजवुर किया गया था। जिसके कारण मधेश की शिक्षा प्रणाली भी ध्वस्त हो गई। मधेश की शिक्षा कमजोर होते ही मधेश की आर्थिक अवस्थ गम्भिर रूप से धारासायी हो गइ। और तराई वासी मधेशी किसान जमीन वेचने पर विवश हो विस्थापित होने पर मजवुर हुवे। उसी प्रकार नेपाली पोसाग के रूप मे दाउरा सुरवाल टोपी अनिवार्य किया गया। यहाँ तक कि जो नेपाली टोपी नही पहनता वह नेपाली ही नही है, वह देश द्रोही है कह कर दोषी करार कर सजाय दियाजाता था। जिसके डर से मधेशीयों को अपने पहिचान/पोसाग को त्यागना पड़ा। लेकिन मधेश के मिट्टि से जन्मे मधेश के प्रवुद्ध व्यक्तित्व ने आपने इतिहास को उजागर कर सवित कर दिया कि “हम मधेशी जहाँ रहते हैं, वह भूमि यदि नेपाल ही होता तो यहाँ की सभ्यता ‘मध्यदेशी’ होता, नेपाली नहीं। यहाँ की भाषा हजारों वर्ष पुराने मैथिली, भोजपुरी और अवधी रहता, सौ वर्ष से भी कम आयू रहे ‘नेपाली’ नहीं। नेपाली सभ्यता यदि उतनी ही पुरानी होती तो नेपाल का वेश ‘धोती’ होता, दौरा और सुरवाल नहीं। सच में नेपाल का इतिहास हजारों वर्ष पहले का होता तो यहाँ के सम्राट जनक, बुद्ध, अशोक होता पृथ्वी नारायण और जंग बहादुर नहीं। परंतु यह सत्य नहीं है। मधेशी सभ्यता का इतिहास हजारों वर्ष पुराने हैं। हमारा नेपालियों से कुछ भी नहीं मिलता। भुगोल, भाषा, वेश, मनोविज्ञान, संस्कृति, रहनसहन, पर्व त्यौहार हरकुछ अलग, बिलकुल ही भिन्न है” लेकिन आज मधेश पर जवरन उपनिवेश लाद कर मधेश की भाषा भुषा रहनसहन रितिरिवाज और ईतिहास पर कव्जा जमाया गया है।

उपनिवेशीक शासन के माध्यम दो सौ वर्षो से मधेशी तथा मधेश को आपने मे समेटने की  हर सम्भव प्रयास हुवा कि मधेश वासीयो को जवरन नेपाली वना लिया जाए।और मधेश को नेपाल वनालिया जाए। मधेशी भी कम मेहनत नही किए! वह भी नेपाली वनने के लिए ललाइत हर वह चिज को अपनाया जो नेपालीयो ने फर्माया। अपने तरफ से पुरी कोशीस किए। जो भी नियम कानुन था सिर्योधार्य किए। माथे कि पगड़ी उतार टोपी सिरोधार्य किए,धोती कुर्ता छोड़ दाउरा सुरवाल से तनको ढका। दोनो तरफ से वरावर का प्रयास होने के वाद भी आखिर आज दुध और पानी अलग अलग हो ही गए। आखिर हो भी क्यो नही जवरजस्ती आखिर कव तक टिकेगी। कितना भी छुपाले कोई, ईतिहास अपना रूप दिखा देता है। और आज नेपाल के टोपी दिवश पर मधेश कि धोती दिवश हावी हो ही गया। सदियो की वह भुली विसरी कहानीया, वह एतिहासीक मधेश की विर गाथा, वह मधेश की गौरव पुर्ण इतिहाश को आखिर कार मधेशीयो ने स्विकार्य ही लिया जिस का परिणाम है नहले पे दहला। लेकिन वर्तमान मधेश की अवस्था तथा डा सिके राउत के अभियान के विच यदि इस प्रकार के दो रूपी खेल होते रहेंगे तो मधेश मे डा सिके राउत तथा उनके मिसन को अत्यधिक फायदा होना निश्चित है।।

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