ठंडा मतलब कोकाकोला राष्ट्रवाद मतलब एमाले, संसोधन न करने का हठ : बिम्मीशर्मा

व्यग्ंय…….बिम्मीशर्मा, वीरगंज , 27 पुस |
यह देश अजब, गजब है और यहां की जनता और मीडिया भी वैसी ही है । विभिन्न राजनीतिक दल, नेता और उनके दूम छल्लों का तो कहना ही क्या ? हमेसा अपने विरोधियों को परास्त करने और गिराने के चक्कर में रहते हैं नेता हो या जनता । अभी नेपाल में संविधान संसोधन का भय बर्ड फ्लू की तरह सभी के दिमाग में घर कर गया है । सब ईस से बचना चाहते हैं यानिकि संविधान संसोधन न हो । क्योंकि अपने दिमाग का संसोधन तो यह कर नहीं पाते ईसी लिए संसोधन संसद में बहूमत से पारित न हो ईस के लिए जम कर विरोध कर रहे हैं और सडक में नारे लगा रहें हैं ।

sansad
६, ६ बार संविधान बनाना मंजुर है पर संसोधन मंजुर नहीं । क्या एक मां अपने बिमार बच्चे का ईलाज ना कर के उसे मरना छोड देती है कि यह मर जाएगा तो दुसरा पैदा कर लुगीं ? नही न मां बच्चे का बकायदा ईलाज करवाती है क्यों कि उसको मालमु है बच्चे का खोना क्या होता है । ईसी लिए बच्चे की स्वास्थ्य की चिंता मां को ज्यादा होती है । पर ईस देश के नेता और दल खुद का ही पैदा किया हुआ बच्चा जैसा संविधान जो बिमार है उसको उपचार यानी संसोधन नहीं करने देना चाहते हैं । भले ही यह संविधान उपचार के अभाव में मर क्यों न जाएं पर संसोधन नहीं ।
दुनिया में हर देश में विशेष परिस्थिति आने पर संविधान का संसोधन होता ही है । पर कुपात्र नेता संसोधन करने नहीं देगें भले ही दुसरा संविधान क्यों न बनाना पडे । अपनी अंटे से पैसा थोडे ही जा रहा है ? जनता ने अपने खून पसिने की कमाई को टैक्स के रुप में देश को दिया ही है उसी को खर्च कर के दुसरा संविधान फिर बना लेगें । किसी के बाप का थोडे ही न कुछ जा रहा है । तीन साल पहले अरबों रुपयां खर्च कर के संविधान ईसी लिए बनाया था कि उसको संसोधन नहीं करेगें कभी ।
ईस देश में ६, ६ बार संविधान ऐसे ही नहीं बना है । संविधान न हुआ कोई जलेबी हो गई । जिसमें चाशनी कम या ज्यादा होते ही फेंक कर दुसरा बना लिया । यहां के दल और ईन के नेता गण अपने मां, बाप के साथ भी ऐसा ही करते होगें शायद । मां, बाप बिमार पडे तो कौन उनका ईलाज करवाए ? फेकं दो उन्हे या वृद्धाश्रम में भेज दो । दुसरी कपी मिल जाएगी मां, बाप की फोटो कपी करके रख लेगें । नेताओं ने सिर्फ बिगाड्ना सिखा बनाना नहीं । ईसी लिए संसोधन के नाम पर ईनकी नानी मर रही है । संसोधन करते ही दुसरा सुनामी आने का डर दिखा कर नेता और दल दोनों जम कर विरोध कर रहे हैं । यह नेता नहीं जानते कि यह खुद ही किसी ज्वालामूखी या सुनामी से कम नहीं हैं ।
ईस देश के राजनीतिक दलऔर नेता पिलिया रोग से ग्रस्त हैं । जिस तरह सावन के अंधे को चारो ओर हरा दिखाई देता है उसी तर ईनको हर जगह पीला दिखाई देता है । यह हर चीज में षडयंत्र देखते हैं वह भी उत्तर का नहीं दक्षिण का । उत्तर से जो दक्षिणा मिलता है दक्षिण को कोसने के लिए । ईसी लिए सभी दक्षिण और मधेश के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं । अमृत तो ईनके पास है नहीं ? तो जहर ही न उगलेगें । मधेश और मधेशियों से ईनको एलर्जी है ईसी लिए संसोधन के विरोध में आए दिन बखेडा कर रहे हैं । अब विरोध करने के लिए बांकी कोई मसला तो बचा नही है ।
अपने भ्रष्टाचार का पोल न खूले ईसके लिए लोकमान जैसे सिंह को रिगं मास्टर बन कर पिंजडें में फसा लिया । पर लोकमान को ईतना ज्यादा मानऔर पावर भी तो ईन्ही नेताओं ने दिया था । तब जब यह लोकमानको उपर चढाने के लिए सिंढी बनने वाले नेताओं के खिलाफ क्यों कोई कारवाही करने के लिए किसी ने दबाव नहीं दिया या सर्वोच्च ने बांकी भ्रष्टों के खिलाफ कोई निर्णय नहीं सुनाया । कंही सर्वोच्च को भी तो ईन नेताओं कि तरह पिलिया नहीं हो गया ।
यदि पहाड की जनता या पहाडी नेता स्वार्थ वश संविधान की किसी कमजोरी को हेर फेर करने या संसोधनका प्रस्ताव करते तो यहां की जनता और दल खुशी, खुशी मान जाते । पर यह संसोधन मधेश, मधेशी जनता और मधेश के नेता की तरफ से आया है तो यह सरासर गलत है । भले मधेश को अपना अधिकार न मिलें पर संविधान संसोधन कर के उनके घाव पर मलहम लगाना नहीं चाहते । हां नमक जरुर छिडकेगें । क्यों कि यह देश नेकपा एमाले, ओली और उनके रहनुमा के हाथों का खिलौना जो बन गया है । क्यों कि राष्ट्रवाद का ढोल पिट कर और नेपाली टोपी लगा कर ईस देश में चाहे जितना भ्रष्टाचार कर सकते हैं । “ठंडा मतलब कोकाकोला उसी तरह राष्ट्रवाद मतलब एमाले ।”
खुद ही अपनी भातृ संगठन के नेता को मार कर विरोधी पार्टी या सरकार को दोष थोपरने वाली पार्टी नेकपा एमाले का राष्ट्रवाद सभी को दिख रहा है । एमाले के सुप्रिमो केपी शर्मा ओली के मुखारबिंद से निकलने वाले मुहावरों मे ही अटक कर रह गया है ईस देश का राष्ट्रटवाद और भविष्य दोनों । एमाले को लगता है देश ईनकी जमिनदारी है और जनता उनके खेत मे दिहाडी में काम करने वाले मजदुर । ईसी लिए जनता को देश प्रेम का चश्मा पहना कर बरगला रहे हैं और भेंड जैसी जनता अपने राष्ट्रवाद को एमाले कि सूली पर चढा कर शहीद कर रही है ।
संसोधन न हुआ कोई कोढ या खाज की बिमारी हो गई । जिसे छुने से ही पूरा देश संक्रमितहो जाएगा । मधेशी तो सब दक्षिण से आयातित है यहां तो सिर्फ पहाडी ही पैदा हुएं है । ईसी लिए मधेश की जायज मागं को भी नाजायज ठहराना ईनका जन्मसिद्ध अधिकार है । एमाले अपने हठ में पूरे देश को नाव बना कर छेद कर रहा है जिसमें सभी डुब जाएं । सडक में कुछ हजार लोगों को ले आ कर नारा लगाना कोई बडी बात नहीं हैं । भाडे के टट्टु आजकल हर घर में पैदा हो चूके हैं जनाब ।

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