ठुमरी की गंगा गिरिजा देवी के निधन से खामाेश हुइ ठुमरी

२५ अक्टुवर

 

गिरिजा देवी का जन्म आठ मई, 1929 को कला और संस्कृति की प्राचीन नगरी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। उनके पिता रामदेव राय जमींदार थे। उन्होंने पांच वर्ष की आयु में ही गिरिजा देवी के लिए संगीत की शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। गिरिजा देवी के प्रारंभिक संगीत गुरु पंडित सरयू प्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पंडित श्रीचंद्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। इस अल्प आयु में ही एक हिंदू फिल्म याद रहे में उन्होंने अभिनय भी किया था।

संगीत यात्रा
1949 में आकाशवाणी से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद उनकी अनवरत संगीत यात्र शुरू हुई, जो जारी रही। उन्होंने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यो में भी अपना योगदान किया।

संगीत के सफर में मिले फनकार
अपने जीवन वृत्तांत में ठुमरी साम्राज्ञी लिखती हैं कि मैंने पूरे भारत में यात्र की और रास्ते में मुझे पं. रविशंकर, अली अकबर और अन्य महान समकालीन कलाकारों का साथ मिला। वे सभी मेरे अच्छे दोस्त बनते गए। हमने एक-दूसरे के साथ अपने संगीत को साझा किया। मैंने अपने जीवन के सबसे दर्दनाक क्षणों में से एक का सामना किया, मैंने अपना पति खो दिया। उस बिंदु तक मुङो अपने दम पर जीवन का प्रबंधन कभी नहीं करना पड़ता था। यहां तक कि साधारण चीजें, जैसे बिलों का भुगतान मेरी जिम्मेदारी नहीं थी। अचानक यह जि़म्मेदारियां मेरी थीं, मैंने प्रदर्शन रोक दिया। साल बीत गए, लेकिन मेरे दोस्तों और प्रशंसकों ने मुङो इस तरह से पीड़ित नहीं देखा। उन्होंने मुङो प्रदर्शन करने को किसी तरह आश्वस्त किया। तब मंच पर वापस आई और फिर मैंने गायन में कविता व गीतों के महत्व को समझने के लिए खुद को समर्पित किया। रस, भावना की अभिव्यक्ति, मेरी रचनाओं का प्राथमिक ध्यान बन गया। मैंने प्यार के विभिन्न रूपों को अपने कठिन परिश्रम से गायिकी के रूप में प्रस्तुत किया। कृष्ण की कहानियों पर आधारित मेरी ठुमरी मेरे अभ्यास का केंद्र बिंदु बन गया। मैंने ठुमरी गायन के पूरे रंग को बदलने का फैसला किया। ठुमरी को एक माध्यम के रूप में सोचा था, जिससे मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकती हूं। प्रेम, लालसा और भक्ति की भावनाएं ठुमरी का एक अभिन्न हिस्सा हैं और मैंने सोचा कि सही प्रकार के संगीत के साथ, मैं गीत को जीवित कर सकती हूं। यह संभव है कि गानों को एक भौतिक रूप दिया जाए।

शिष्यों की लंबी परंपरा
गिरिजा देवी बनारस की शान थीं। दिग्गज संगीत साधकों जैसे कंठे महराज, पंडित रविशंकर, लच्छू महराज, गोदई महराज, किशन महराज आदि नक्षत्र की अंतिम कड़ी थीं। तुलसी घाट पर संगीत समारोह के ठीक पहले एक उनका सम्मान समारोह हुआ था। जब हमने उन्हें संकटमोचन संगीत समारोह में आने के लिए कहा तो बोलीं ‘काहें न आईब’। हमारे बाबा प्रख्यात पखावज वादक पंडित अमरनाथ मिश्र जी को भईया कहती थीं। उन्होंने कोलकाता जाने के बाद भी बनारसीपन नहीं छोड़ा था। किसी भी बनारसी से मिलने पर वह बनारसी लहजे में ही बात करती थीं। उनकी शिष्यों की लंबी परंपरा है। उन्होंने सर्वाधिक शिष्य तैयार किए थे। यही वजह है कि उनकी गायकी लंबे समय तक कायम रहेगी। दुनिया में बनारस के संगीत और गायकी की जो लोकप्रियता है उसमें गिरिजा देवी का बड़ा योगदान रहा। -प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र, महंत, संकटमोचन मंदिर

मेरी तो मां चली गई..
राजधानी की अनगिनत ऐसी शाम रही हैं, जब मंडी हाउस स्थित कमानी सभागार में दर्शकों की भीड़ ठुमरी की रानी और शास्त्रीय संगीत की साम्राज्ञी गिरिजा देवी (अप्पा) को सुनने के लिए इंतजार करती थी। बनारस घराने की तान, चैती, ठुमरी, टप्पा जैसी तमाम शास्त्रीय और लोक विधाओं में महारत हासिल करने वाली गिरिजा देवी के निधन से कला जगत में शोक का माहौल है।

प्रसिद्ध लोक गायिका और गिरिजा देवी की शिष्या मालिनी अवस्थी रुंधे गले से कहती हैं कि मेरी तो मां चली गईं। मुझे एक शिष्या होने के अलावा एक बेटी होने का भी सौभाग्य मिला था। हमें डर लगता था कि ऐसा होगा, लेकिन अप्पा इतना उत्साहित, जिंदादिल, बहादुर और ऊर्जावान थीं कि कई बार मृत्यु को मात दे चुकी थीं। बाईपास सर्जरी करा चुकी थीं, दिल का दौरा भी पड़ा, लेकिन साधना के सुर मद्धम नहीं पड़े। वह कहती हैं कि साधकों की अंतिम परिपाटी चली गईं। उनका रोम-रोम संगीत और बनारस को समर्पित था। हम लोगों को आशीर्वाद देती थीं तब भी काशी का आशीर्वचन उसमें जुड़ा रहता था। बनारस घराने के शास्त्रीय गायक साजन मिश्र ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि गिरिजा देवी के साथ ही एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी गायिकी जिंदा रहेगी।

सोशल मीडिया में श्रद्धांजलि का दौर
ठुमरी साम्राज्ञी के निधन से समूचा संगीत जगत शोकाकुल नजर आया। यह उनका व्यक्तित्व ही था कि देर रात ट्विटर के शीर्ष ट्रेंड में भी गिरिजा देवी शामिल रहीं। सोशल मीडिया में जावेद अख्तर, पंकज उधास, प्रोसेनजित चटर्जी, शर्मिष्ठा मुखर्जी, अनुपम खेर, शुभा मुद्गल, शंकर महादेवन, अमजद अली खान जैसे कलाकारों ने भी भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वहीं देर रात तक सोशल मीडिया पर ठुमरी साम्राज्ञी को नमन करने और श्रद्धांजलि देने का दौर चलता रहा।

दैनिक जागरण से

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