डंक मारता दशहरा

कञ्चना झा:चार साल पहले की बात है । दशहरे की छुट्टी में मनोज गुप्ता ने घर जाने का प्रोग्राम बनाया । पत्नी, दो साल की एक बच्ची और दो भतीजे । कुल मिला के चार टिकट खरीदने पडÞे । करीब साढÞे चार सौ किलोमीटर की इस यात्रा के लिए उसेे ३६ सौ रूपये टिकट में देने पडेÞ थे, वो भी करीब दशहरा शुरु होने से एक महीना पहले । रात्रि बस में कोई सीट नहीं थी इसलिए दिवा सेवा के बस में टिकट लेना पडÞा । टिकट काउन्टर वाले ने सुबह पौने पाँच बजे कलंकी पहुँच जाने को कहा । दशहरे का समय, थोडÞा बहुत सामान तो हो ही जाता है और फिर यात्रा करने वाले पाँच आदमी हों तो सामान ज्यादा होना स्वाभाविक ही है । सुबह चार बजे गुप्ता परिवार उठकर कलंकी जाने को तैयार हुआ तो बस स्टेंड पहुँचने के लिए कोई र्सार्वजनिक साधन नहीं । अन्ततः एक ट्याक्सी लेनी पडÞी जो बहुत अनुनय विनय करने के बाद साढÞे तीन सौ में जाने को तैयार हुआ । मनोज के घर से कलंकी बस स्टयाण्ड की दूरी चार किलोमीटर से भी कम है ।dashain in nepal_himalini
गुप्ता परिवार करीब साढÞे चार बजे कलंकी पहुँच चुका था । कलंकी में मानव सागर लहरा रहा था । वैसे दृश्य अस्वाभाविक नहीं था, क्योंकि नेपाल में दशहरा को कुछ विशेष ही महत्व भी दिया जाता है । स्कूल, काँलेज और प्राइवेट कम्पनी सब करीब १० दिन के लिए बन्द रहते हंै । सभी को छुट्टी । लम्बी छुट्टी के कारण ही, पिछले दिनों देखा गया है कि दशहरा को पर्व से भी ज्यादा अपनों से मिलने के अवसर के रूप में लिया जाने लगा है ।
सुबह के पौने पाँच बज चुके थे । मनोज ने जिस बस का टिकट लिया था वह नहीं आई । उसने फोन किया तो बस का कन्डकटर बोला बस थोडÞी देर में हम लोग कलंकी पहुँच रहे हैं । फिर थोडÞा देर बाद फोन किया तो पता चला कि सात दोबाटो के जाम में बस फँसी हर्ुइ है । कन्डक्टर ने ये भी बताया कि सात दोबाटो से कलंकी तक ऐसे ही जाम है लेकिन चिन्ता करने की बात नहीं, थोडÞी देर में हम लोग पहुँच जाएँगे । करीब १५ फोन किया होगा मनोज ने इस बीच और अन्ततः उसने देखा कि करीब पौने नौ बजे गाडी कलंकी पहुँची ।
जैसे ही वह बस के अन्दर गया तो बस से बदबू आ रही थी । कन्डक्टर से पूछा भाई बदबू क्यों – कन्डक्टर का उत्तर था उधर से बकरा लेकर आये हैं और तुरन्त अनलोड किया, लेट हो गया इसलिए गाडÞी साफ भी नहीं कर पाये । आधे घन्टे के बाद गाडी वहाँ से खुली तो बस में क्षमता से तीन गुणा ज्यादा यात्री । ड्राइवर बेचारा लगातार १४ घन्टे से गाडÞी चलानेे के कारण थक गया था और उसकी आँखें लाल हो गयी थी । वह बोल रहा था, कुछ भी हो जाये, मैं थोडी देर आराम कर लूँ । लेकिन बस में बैठे लोग बेचैन हो चुके थे, इसलिए गाडÞी रोक कर सोना सम्भव नहीं । रास्ते की बात की जाय तो हर जगह लूट मची थी चाहे नौबिसे का नास्ता करनेवाला लाइन होटल हो या रामपुर का खाना खाने का होटल । और अन्ततः १० घन्टे की इस दूरी को तय करने के लिए गुप्ता परिवार को १७ घन्टे लगे । बच्चांे की हालत खराब । और उसी दिन मनोज ने कसम ली कि दशहरा में घर नहीं । मनोज कहते हैं- और किसी समय में चला जाउँगा लेकिन दशहरा में नहीं जाना । वैैसे भी घर आने जाने में जितना खर्च होता है उतने में यहीं पर धूमधाम से दशहरा मना लेंगे । घर में माँ और बाबूजी हैं, उन लोगों को ही यहाँ बुला लूंगा । उधर से आने में उतना कष्ट नहीं ।
एक बार फिर दशहरा दरवाजे पर दस्तक दे रहा है । नेपाल पुलिस यह दावा कर रही है कि इस बार के दशहरे में सभी को सहजता के साथ बस की टिकट उपलब्ध होगी । टिकट में कालाबजारी करने वालों पर कारवाही की जायेगी । लम्बी दूरी की गाडियों के लिए दो चालक रखना अनिवार्य, सीट से ज्यादा यात्री रखने पर प्रतिबन्ध । ऐसे ही बहुत सारे नियम एक बार फिर नेपाल पुलिस ने र्सार्वजनिक किया है । पुलिस के इस दाबे को परखना अभी तो बांकी है । लेकिन फिलहाल जो बात खुलकर आगे आयी है वो यह है कि एडवान्स बुकिङ खुलने के दूसरे ही दिन अधिकांश रुट की गाडियों में टिकट नहीं है । दशहरा के अवसर पर विराटनगर जाने के लिए अग्रिम टिकट बुकिङ करने गये मोहन चापागाँइ कहते है- टिकट लेने के लिए सुबह चार बजे ही बस पार्क आया लेकिन टिकट नहीं मिली । एक ही दिन में सारी टिकट खत्म हो जाये यह कैसे संभव है – उन्होने प्रत्रि्रश्न किया ।
देव और असुर बीच के संग्राम में दैवीय शक्ति के विजयोत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता है । नेपाल में इस पर्व को और भी ज्यादा महत्व के साथ लिया जाता है । माँ दर्ुगा द्वारा महिषासुर का वध करने के अवसर को लेकर यह पर्व मनाया जाता है । इस पर्व का पहला, सातवाँ, आठवाँ, नवमाँ और दशवाँ दिन विशेष रूप से मनाया जाता है । घटस्थापना के दिन लोग अपने अपने पूजाघर में घडÞा में यव बोते हैं । फिर लगातार दस रोज तक दर्ुगापाठ करते हुए दशवें दिन जयन्ती काटी जाती है । और बडÞे बुजुर्गों से आशर्ीवाद स्वरूप टीका और जयन्ती लगाते हैं । और यही कारण है कि लोग जहाँ भी रहें इस पर्व के मौके पर अपने घर को वापस आते हैं ।
लेकिन रमिता यादव कहती हैं- मैंने तो घर नहीं जाने का फैसला कर लिया है । एक तो सभी परिवार यहाँ से जाना और फिर वापस आना, इतने दिनों के बाद घर जा रही हैं तो खाली हाथ जाना भी उन्हंे ठीक नहीं लग रहा है । वह कहती हैं- पर्व त्योहार अब उत्सव नहीं होकर बाध्यता बन गयी है । दशहरा, उसके बाद दीपावली और फिर छठ, यह सभी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाने के लिए बहुत ज्यादा पैसा चाहिए । उनका कहना है- आप तो अपने आपको मना लेंगे लेकिन बच्चांे को कैसे समझाएँगें ।
रमिता का कहना बिल्कुल सही है । दशहरा के अवसर पर नये कपडÞे होने ही चाहिए, अच्छा खानपीन होना ही चाहिए और यह सब तभी सम्भव है जब आपके पास पर्याप्त पैसा हो । लेकिन बाजार अनियन्त्रित हो चुका है । चारो तरफ भ्रष्टाचार ने पैठ जमाया है । आलू ७० रूपया, प्याज ६० रूपया किलो बिक रहा है । चीनी, घी सभी की कालाबाजारी चल रही है । मिर्ठाई के दामों की तो बात ही ना करें, आसमान छू रहा है । खाना पकाने वाले ग्यास का अभाव हो गया है । लेकिन सरकार को मतलब नहीं । बाजार अनुगमन के लिए सरकार और निजी क्षेत्र की सहभागिता में संयुक्त अनुगमन संयन्त्र गठन किया गया है । लेकिन यह संयन्त्र भी सिर्फऔपचारिकता ही बन कर रह गया । महीना दो महीना में यह संयन्त्र एक बार सक्रिय होता है और बाजार अनुगमन की औपचारिकता भी पूरा कर लेता है । संयन्त्र के प्रभाव की बात करें तो बाजार पर ठीक उल्टा असर पडÞ रहा है । इसने भ्रष्टाचार और मंहगाई को और बढÞावा दिया है । मंहगाई और बढÞ गई है । वैसे वाणिज्य तथा आपर्ूर्ति व्यवस्था विभाग के महानिर्देशक नारायण प्रसाद विंडारी कहते हंै – बाजार में किसी चीज का अभाव नहीं । दशहरे में लोगों को दिक्कत न हो और बाजार मूल्य विचलित न हो यहीे सोचकर सरकार ने कई जगहों पर सुपथ मूल्य की दुकान संचालन करने की योजना बनाई है । वह आगे कहते हैं- पर्व के मौके का फायदा उठाकर कोई व्यापारी कृत्रिम अभाव पैदा करता है तोे उसपर सख्त कार्यवाही की जायेगी ।
धार्मिक रूप से अत्यन्त ही महत्वपर्ूण्ा यह पर्व एक दूसरे की नकल करने के कारण दिनोदिन मंहगा होता जा रहा है । लेकिन लोग चाहकर भी इससे अलग नहीं रह सकते । खासकर बाजारमुखी मीडिया ने इस पर्व को और तूल दे रखा है । दशहरा के अवसर पर टेलिभीजन, रेडियो और पत्र पत्रिका विज्ञापन से भरे हुए हैं । भारी छूट के नाम पर छपे विविध उत्पादन और दुकान का विज्ञापन लोगों को खरीददारी के लिए मजबूर कर देता है और लोग चाहकर भी इससे अलग नहीं रह सकते । रेडियो कान्तिपुर में कार्यरत अनिल परियारका मानना है कि- पिछले कुछ वर्षों से दशहरा भडÞकीला होता जा रहा है । दशहरा का मतलब लोग अच्छा खाना, नयाँ कपडा, जुआ, तास और शराब समझने लगे हैं । पूजापाठ पर लोगों ने ध्यान देना छोडÞ दिया है । वास्तव में देखा जाय तो इसी भडÞकीलेपन के कारण परम्परा और संस्कृति भी लोप होती जा रही है । लोगों को चाहिए कि अपनी हैसियत के अनुसार खर्च करें । लेकिन देखा गया है कि लोग क्रृण लेकर दशहरा मनाने लगे हैं, जो बिल्कुल गलत है ।
काठमांडू में कार्यरत महेन्द्र सिंह कुंवर का कहना है- मुझे तो ऐसा लगता है कि वर्षभर में जो कमाता हूँ वो सिर्फदशहरा के लिए ही है । अपनी छोटी कमाई में से वह कुछ पैसा बचा लेता है लेकिन सारा बचत किया हुआ पैसा दशहरा में खत्म हो जाता है । धनगढी घर है । वैसे तो परिवारवाले महेन्द्र से बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं रखते लेकिन इतने दिनों के बाद जा रहा है तो सबके लिए कुछ न कुछ तो ले जाना ही होगा । आखिर वह भी एक वर्षराजधानी में रहकर काम कर रहा है और पर्व के मौके पर घर जा रहा है ।
सञ्चारकर्मी स्नेहा झा का भी मानना है कि दशहरा एक कडुवी दबा की तरह बन गया है, निगलना भी मुश्किल और फेंकना भी मुश्किल । समाज में रहते है तो सामाजिक संस्कार मानना ही होगा लेकिन मंहगाई ने कमर तोडÞ रखी है । मंहगा बस किराया और पर्व के मौके पर परिवार के सदस्य के लिए कुछ न कुछ खरिदारी, इसने दशहरा के उमंग को खत्म कर दिया है । और फिर दशहरा के बाद दीपावली और उसके बाद छठ यनि की पूरे साल का बचाया हुआ सब खत्म ।
दशहरा यानी शक्तिपूजा का अवसर, उल्लास का माहौल, सभी से मिलने का अवसर, अपने घर लौटने का मौका । राष्ट्रीय पर्व का दर्जा मिले, इस त्योहार को लोग धूमधाम से मनायें इसके लिए लोगों को चाहिए कि अपनी हैसियत के अनुसार खर्च करें और सरकार को चाहिए कि बाजार को नियन्त्रित रखे । अन्यथा, दशहरा उमंग का नहीं, बाध्यता का प्रतीक बन जाएगा ।

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