“डम्पिङ साइट” बनता नेपाली समाज रेमिटेन्स समाधान नहीं

kachana jhaकञ्चना झा:साढÞे तीन वर्षके उमंग को क्या पता कि उसकी माँ आज सुबह से क्यों रो रही है – घर में सब चुपचाप, हर तरफ आँसू । जब शाम हर्ुइ तो सभी लोग त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल की ओर चल दिये । उमंग तो खुश था क्योंकि आज शाम उसे घूमने का मौका मिला । करीब  आठ बजे फ्लाई दर्ुबई एयरलाइन्स का विमान अवतरण किया । और थोडÞी ही देर में एक बक्सा थमा दिया गया उमंग के परिवारवालों को । और उस बक्से में था निरेश का शव ।
निरेश करीब साढÞे दो महीने पहले ही दर्ुबई गया था । नेपाल के मध्य पश्चिमी जिला बर्दिया का रहनेवाला निरेश पिछले साढÞे तीन वर्षसे राजधानी काठमांडू में ही काम करता था । पेशे से फोटो पत्रकार लेकिन कमाई अच्छी नहीं होने के कारण वह काठमांडू स्थित एक मैन पावर एजेन्सी के मार्फ दर्ुबई चला गया । सावन २० गते दर्ुबई स्थित अपने कार्यस्थल में उसकी मौत हो गई है । घटना का सत्य तथ्य तो अभी आना बाकी है लेकिन कहा गया है कि कार्यस्थल में करेन्ट लगकर उसकी मौत हो गई । remi
परिवार वालों की काफी मशक्कत के बाद उसका शव काठमांडू लाया गया । निरेश के परिवार वाले शायद भाग्यशाली थे इसलिए उनलोगों को कम से कम शव तो मिल गया । लेकिन वैदेशिक रोजगार में गये कितने लोगो का शव भी नेपाल नहीं आता और घरवाले उसका परम्परागत ढÞंग से संस्कार भी नहीं कर पाते । गाँवघर से अधिकांश युवा कर्जा  लेकर विदेश जाते हैं तो ऐसे में कहाँ से ला पाएँगे उनके परिवार वाले उनका शव । त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल अध्यागमन विभाग के तथ्यँाक के अनुसार भविष्य के लिए सुन्दर सपना संजोंकर नेपाल से दैनिक औसतन साढÞे सत्रह सौ युवा विदेश जा रहे हैं । और प्रतिदिन सात शव नेपाल आ रहा है । ये लोग वो होते हैं जिनकी कार्यस्थल में ही किसी कारणवश मृत्यु हो जाती है । लेकिन फिर भी विदेश जानेवालों की संख्या दिन ब दिन बढÞती ही जा रही है ।
सुनसरी  के मनोज चौधरी भी आजकल बहुत व्यस्त है । वह सउदी अरब जाने की तैयारी में है । पासपोर्ट बन गया है, जिसे वह काठमांडू स्थित एक मैन पावर कम्पनी को दे रखा है । पढर्Þाई की बात की जाय तो उसने स्नातक उत्तर्ीण्ा कर लिया है । पिछले चार पाँच साल से नौकरी के लिये बहुत प्रयास भी किया । पहले तो सरकारी नौकरी के लिए लेकिन उपर कोई न होने के कारण उसको नौकरी नहीं मिली । मनोज कहता है- हम लोगों को नौकरी कहाँ से मिलेगी, आजकल तो एक चपरासी के लिए मन्त्री का सोर्स चाहिए और अगर सोर्स नहीं तो घूस चाहिए । सरकारी नौकरी नही मिलने के बाद स्थानीय प्राइवेट स्कूल में काम किया लेकिन उसमें इतनी तन्ख्वाह नहीं मिलती कि परिवार चल सके । न तो उसके पास इतनी खेती है जिसमें काम कर वह अपना घर चला सके । अन्ततः उसने निश्चय किया कि अब इस देश में नहीं रहना है । उसे कोई परवाह नहीं कि सउदी अरब में वह कौन सी नौकरी करेगा, काम कोई भी हो लेकिन पैसा होना चाहिए । मैनपावर कम्पनी को भी उसने यही कह रखा है ।
मनोज जैसे अभी लाखों नेपाली युवा विदेश जाने के चक्कर में है । अगस्त १२ तारीख को जब नेपाल जैसे सारा विश्व अन्तर्रर्ाा्रीय युवा दिवस मना रहा था तो इस देश के युवा पुलिस की लाठी खा रहे थे । दक्षिण कोरिया में रोजगार के लिए भाषा परीक्षा देनी पडती है और उसी परीक्षा का फार्म भरने के लिए जगह जगह पर केन्द्र खोला गया था । वैसे तो फार्म भरने का डेट १२ तारीख से था लेकिन हजारों युवा  ११ तारीख की शाम से ही लाइन में खडÞे थे । कर्ीर्तिपुर के ल्याब स्कूल में भी फार्म भरने का केन्द्र था जिसकी लाइन करीब एक किलोमीटर लम्बी थी । सबके सब युवा एवं युवती २१ से ३० वर्षके बीच । यही हाल ललितपुर स्थित च्यासल फार्म संकलन केन्द्र का भी । बारिश हो रही थी और हजारों युवा युवती लाइन में खडÞे थे । जब युवा हल्ला करने लगे कि थोडा सा व्यवस्थित करना चाहिए तो उन्हे पुलिस के डन्डे मिले । कई युवा युवती घायल हो गयी । चार दिन में करीब करीब साठ हजार युवा युवती ने दक्षिण कोरियाई भाषा परीक्षा का फार्म भरा है । अभी जो फार्म लिया गया है उसकी परीक्षा सेप्टेम्बर २६ और २७ तारीख को होगी और उसका रिजल्ट अक्टोबर १५ तारीख को होगी । भाषा परीक्षा में पास हो जाने के बाद वह कोरिया जाने के लिए सक्षम हो जायेगा । उसके बाद दक्षिण कोरिया से आये मांग के अनुसार इन लोगांे को भेजा जायेगी । जुलाई ३१, २००७ में नेपाल और दक्षिण कोरिया सरकार के बीच श्रमिक भेजने का समझौता हुआ था और उसके बाद अभी तक २२ हजार नेपाली युवा दक्षिण कोरिया जा चुके हैं । इसबार दक्षिण कोरिया सरकार ने श्रमिक का कोटा पिछले वर्षकी अपेक्षा  बढाकर पाँच हजार सात सौ किया है और न्यूनतम पारिश्रमिक भी बढाया है । श्रमिक कोटा में चार साल पहले दक्षिण कोरिया गये दिब्यराज कट्टेल कहते हंै -नेपाल में जिन्दगी भर कमाता रहता फिर भी दो शाम खाना से उपर नहीं उठ सकता लेकिन आज मेरे पास बहुत कुछ है । वह प्रत्येेक महीना करीब एक लाख रूपया तो घर भेज रहा है । कट्टेल की पत्नी अपने पति के मेहनत से आये हुए पैसे का उपयोग कर रही है । बच्चों की पर्ढाई अच्छे स्कूल में करवा रही है, कुछ पैसे से उसने जमीन खरीदी और घर भी बना लिया । अब उसने छोटा मोटा व्यापार शुरु कर दिया है । कट्टेल का कहना है- कुछ दिन और यहाँ कमा लेता हूँ फिर आराम से नेपाल में रहँूगा ।
ये तो हर्ुइ दक्षिण कोरिया की स्थिति अमेरिका की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है । अमेरिका प्रत्येक वर्षविदेशी नागरिकों के लिए डाइभर्सिटी भीसा -डिभी) निकालता है । यह एक किस्म की लौटरी है , जिसको पडÞ जाये वह अमेरिका जा सकता है अमेरिका सरकार उसको वहाँ के नागरिक की हैसियत देता है । जब डिभी भरने का मौसम आता है तो पूरे नेपाल में ही पर्व का माहौल बन जाता है । हर युवा दूसरे को यही पूछता है कि-तुमने डिभी भर लिया – और तो और नेपाल सरकार के उच्च पदाधिकारी यहाँ तक कि साँसद सब भी ये फार्म भरते है और लटरी मिल गई तो नेपाल को दुलत्ती मार कर चले जाते है ।
अच्छे रोजगार की तलाश में नेपाली लोग करीब दो सौ साल से वैदेशिक रोजगार में जाने लगे हैं  । उन्नीसवीं शताब्दी में सिख राजा रञ्जित सिंह के शासन काल के दौरान नेपाली लोगों ने लाहौर जाना शुरु किया । उस समय लाहौर भारत में था और लाहौर जाने के कारण ही नेपाल से विदेश जाने वालों को लाहुरे कहना शुरु कर दिया गया । अभी भी विदेश में रहने वाले को लाहुरे ही कहा जाता है । लेकिन अभी परिस्थिति र्फक है ।
खासकर सन् १९९० में प्रजातन्त्र की पर्ुनर्वहाली के पश्चात बहुत बडी संख्या में नेपाली युवा विदेश जाने लगे है । भारत में कितने नेपाली युवा हैं उसका लेखाजोखा सरकार के पास नहीं है । लेकिन कतार, मलेसिया, साउदी अरब, संयुक्त अरब इमिरात, कुवैत और दक्षिण कोरिया की बात की जाय तो नेपालियों की संख्या उल्लेख्य है । इन राष्ट्रों मे ३० लाख से ऊपर नेपाली युवा कार्यरत हैं । ये संख्या वैधानिक तरीका से विदेश गये लोगों की है । ंत्रिभुवन अन्तर्रर्ााट्रय विमानस्थल के मार्ग से प्रत्येक दिन औसतन १७ सौ ४८  युवा वैदेशिक रोजगार में जा रहे हैं । कुछ युवा अवैधानिक रूप से भारत या बंगलादेश के रास्ते भी विदेश जा रहे हैं लेकिन उनका कोई तथ्याँक सरकार के पास नहीं है । अनुमान किया जाता है कि अवैध ढंग से बैदेशिक रोजगार में गये नेपाली युवकों की संख्या भी लगभग तीस्ा लाख के आसपास ही है ।
इन राष्ट्रों में काम कर रहे सभी की हालत एक  जैसी नहीं है । खासकर साउदी अरब, मलेशिया, कतार में काम कर रहे नेपाली युवाओं को बहुत समस्या झेलना पडÞ रहा है । इन राष्ट्रो में नेपाली कामदार को तीन किस्म के काम मिलते है । उन कामों को थ्री डी अर्थात र्डर्टर्ीीन्दा),डेरिङ-साहासिक) और डिफिकल्ट-कठिन) कहा जा सकता है । और यह स्वाभाविक भी है क्यों की जो काम के लिए वे जातें है उसमें वह स्किल्ड-सक्षम) नहीं हो तो, ना तो उस विषय का अध्ययन रहता है उन लोगों के पास ना तो कोई तालीम । इसलिए और देश के कामदार की तुलना में नेपाली को कम वेतन दिया जाता है और स्किल्ड न होने के कारण खतरा भी बढÞ जाता है ।
कतार में रह रहे नेपाली मजदूर के संबन्ध में इंग्लैण्ड से प्रकाशित होने वाली पत्रिका गार्जियन ने अपने फरबरी अंक में लिखा है- कतार, सन २०२२ में कतार विश्वकप फुटबाँल आयोजना की तैयारी में लगा हुआ है । स्टेडियम के साथ-साथ बहुत से निर्माण कार्य वहाँ चल रहा है जिसमें अधिकांश नेपाली मजदूर कार्यरत है । जहाँ अभी तक चार सौ नेपाली मजदूर की मौत हो चुकी है । दोनो देश की सरकार और संबन्धित  संगठन सब इसपर गंभीर नहीं हुए तो सन २०२२ तक वहाँ करीब चार हजार नेपाली मजदूर की मौत हो चुकी होगी । गार्जियन लिखता है नेपाली मजदूरों को अमानवीय वातावरण में काम करना पड रहा है और उन्हे वेतन भी ठीक से नहीं मिल रहा है ।  लेकिन किसको मतलब है उन लागों की । सरकार तो बस इस बात पर खुश है कि रेमिटेन्स बढÞ रहा है । सरकार तो इस फेर में लगी है कि ज्यादा से ज्याद रेमिटेन्स आये । सबके सब नेपाली युवा विदेश चले जाये ताकि उन पर रोजगार का दबाब नहीं होगा । किसी भी राष्ट्र के लिए १९ से लेकर ३५ उम्र के युवा को गहना माना जाता है । इस उम्र के लोग चाहें तो रेगिस्तान को हरियाली कर दे । अर्थविद कहतें है – दर्ुभाग्य है इस राष्ट्र का, यहाँ से मसल और ब्रेन दोनो पलायन हो रहा है ।
वैदेशिक रोजगार में जाने वालों को देखा जाय तो करीब करीब चार किस्म के लोग चार तरीके से विदेश जा रहे है । पहला जिनके पास लम्बी दूरी तय करने के लिए ज्यादा पैसा नहीं । अधिकांश ऐसे युवा भारत जा रहे है । दूसरा जो थोडÞे बहुत पढÞे लिखे हैं और करीब एक लाख तक खर्च भी कर सकते हंै, ऐसे युवा साउदी अरब, कतार, मलेशिया और संयुक्त अरब अमिरात जा रहे हैं । तीसरा जो चार से सात लाख तक खर्च कर सकते है वो जापान, इजरायल जा रहे है और चौथा जो दस लाख तक खर्च करने की क्षमता रखते हैं । ऐसे युवा अमेरिका और यूरोप जा रहे है । इन लोगों का उद्देश्य भी र्फक है । पहले श्रेणी के लोग सिर्फरोजी रोटी के लिए जा रहे हैं । दूसरेी श्रेणी के लोग थोडÞा पैसा हो जाये तो गाँव में खेत या स्थानीय बाजार में छोटा सा घर हो जाये या छोटा व्यापार करने के लिए पैसा हो जायेगा सोच कर जा रहे हैं । लेकिन तीसरी और चौथी श्रेणी के लोग यह सोचते रहते हैं कि राजधानी में घर, गाडÞी और कुछ बैंक बैलेन्स हो जाये ।
प्राकृतिक श्रोत से भरपूर इस राष्ट्र से बडी संख्या में हो रहा पलायन निसन्देह चिन्ता का विषय है । कृषि, जलश्रोत, ऊर्जा, पर्यटन जैसे बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अवसर सृजना की जा सकती है । जिसके लिए सबसे अहम बात है राजनीतिक स्थिरता । लेकिन दर्ुभाग्य पिछले पच्चीस साल से इस राष्ट्र को स्थिरता नहीं मिल सकी । वि सं २०४६ में प्रजातन्त्र की पर्ुनर्वहाली के बाद लोगो में बहुत आशा थी । लेकिन राजनीतिक संक्रमण अन्त नहीं हुआ । जनता की आकाँक्षा पूरा न होने के कारण देश गृहयुद्ध में चला गया । और २०६२-६३ तक यह राष्ट्र गृहयुद्ध में फँसा रहा । विसं २०६३-६३ में फिर एक बार आन्दोलन हुआ । राष्ट्र में फिर एक बहुत बडा राजनीतिक परिवर्तन हुआ, संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की स्थापना हर्ुइ और  अभी राष्ट्र संविधान निर्माण की प्रक्रिया में है । इस परिवर्तन का सबसे बडा असर पडÞा है विकास पर । सही मायने में पिछले पच्चीस साल से यहाँ कोई विकाशमूलक गतिविधि हर्ुइ ही नहीं कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । विकास ही रोजगारी का अवसर निर्माण करती है और  यह बात राजनेताओं को समझना पडेÞगा । रेमिटेन्स से राष्ट्र नहींं चलता । अध्ययनशील, दूरदृष्टि और युवा वर्ग को राजनीति में सक्रिय होना होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि नेपाल वृद्धवृद्धाओं के लिए “डम्पिङ साइट” बनकर रह जायेगा ।।

उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए मैं विगत चार सालों से अमेरिका में हूँ । अपने जन्मभूमि से दूर रहना काफी मुश्किल है, यहाँ खाना देने के लिए माँ नहीं रहती या रास्ता

निकिता देवकोटा, काठमांडू  -हाल वाशिंगटन,अमेरिका)

निकिता देवकोटा, काठमांडू -हाल वाशिंगटन,अमेरिका)

दिखाने के लिए पिताजी नहीं रहते । लोगों को बहुत मेहनत करनी पडÞती है । विदेश में शिक्षा या शिप प्राप्त कर अपने देश के विकास में लगना निःसन्देह अच्छी बात है लेकिन यहाँँ रह जाने से मुल्क को नुकसान होता है । नेपाल में दो प्रमुख समस्याएँ हैं, एक तो अवसर की कमी और दूसरा अवसर का पहचान न होना । जिसके लिए जनता और सरकार दोनो जिम्मेवार हैं ।  नेपाल को युवा धारणा और शक्ति की आवश्यकता है । जिसके लिए जनचेतना आवश्यक है । देश की आवश्यकता  अनुसार शिक्षा होनी चाहिए । स्कूली शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक शिक्षा देनी चाहिए ताकि लोग अपने घर में रह कर छोटा मोटा उद्योग व्यवसाय कर सके, उनमें उद्यमशीलता आये और अपना गुजार कर सके । अभियान शुरु हो कि लोग स्वदेशी सामान ही उपयोग करें तो पलायन को कुछ हद तक रोका जा सकता है । निकिता देवकोटा, काठमांडू  -हाल वाशिंगटन,अमेरिका)

 दिब्यराज कट्टेल -हाल बुसान, दक्षिण कोरिया

दिब्यराज कट्टेल -हाल बुसान, दक्षिण कोरिया

स्नातक तक की पढर्Þाई और उसके के बाद कम्प्युटर की तालीम लेकर नेपाल में करीब दस वर्षों तक काम किया लेकिन हमेशा दो शाम पेट भरने की चिन्ता बनी रहती थी । फिर मैं कोरिया आ गया और पाँच सालों से यहाँ रह रहा हूँ । कृषि सम्बन्धी काम कर रहा हूँ और इन पाँच सालों ने मुझे  बहुत कुछ दिया । पैसा और स्कील दोनों । दो चार वर्षऔर यहाँ काम करुंगा फिर मैं नेपाल वापस चला जाऊँगा । यहाँ आर्जन किया शिप नेपाल में जाकर उपयोग करने की योजना है । जब तक युवाओं को स्वदेश में ही रोजगारी का अच्छा अवसर नहीं मिलेगा तब तक पलायन होता रहेगा । दिब्यराज कट्टेल -हाल बुसान, दक्षिण कोरिया)

पाँच वर्षसे मेलबर्न में रह रही हूँ । पति मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करते हैं  । कमाई भी

सोनी ठाकुर, सप्तरी -हाल मेलबर्न, आष्ट्रेलिया

सोनी ठाकुर, सप्तरी -हाल मेलबर्न, आष्ट्रेलिया

अच्छी हो जाती है ।  जब यहाँ आयी थी तो अच्छा लगता था लेकिन अब चिन्ता हो रही है । बच्चा बडÞा होेता जा रहा है और उसमें वो संस्कार नहीं जो बचपन में हम लोगों में था । यहाँ के लोगों का तरीका अलग है और हमारा बच्चों का पालन पोषण करने का तरीका अलग । आप बीमार हो जाइये पूछने वाला कोई नहीं । सब के सब व्यक्तिवादी हैं और यही चीज मुझे अच्छी नहीं लगती । सोचती हूँ कि वापस आ जाऊँ लेकिन स्वदेश में अवसर बहुत कम हैं और अवसर सृजना करने के लिए सरकार की कोई सोच भी नहीं । स्थिति दिन ब दिन बदतर होते जा रही हंै । अब तो कुछ दिन के बाद ऐसा होगा कि नेपाल में सिर्फबच्चे और बुजर्ुग लोग रहेंगे, युवा युवती सब बाहर । देश की  पहचान ही बदल रही है । पहले नेपाली भाइयों को बहादुर और कान्छा कहके बुलाया जाता था और अब “कण्ट्री अफ लर्ेबर्स” । सोनी ठाकुर, सप्तरी -हाल मेलबर्न, आष्ट्रेलिया )

इस बार तो बहुत अच्छी तैयारी की है मैंने । करीब ६ महीना तक कोरियाई भाषा की तालीम ली है, आशा है कि इस बार मैं पास हो जाउFmगा । देखिये कहने वाले ऐसे ही कहते हैं कि नेपाल में रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है । खास कर जो बडÞे लोग हैं, वो ऐसा बोलते हैं । अपने बच्चो को अमेरिका, इंग्ल्याण्ड भेज देते हैं और दूसरो को नेपाल में ही रहने का सलाह देते है । आप ही बताइये किस नेता का बच्चा नेपाल में रहता है या यह बताइये कि किस सरकारी अधिकारी का बेटा बेटी नेपाल में है । अपने आपको र्सवहारा पार्टर्ीीा नेता कहने वाल बाबुराम भट्टर्राई ने बेटी को पढने के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया था । सबसे बडी चीज है, दो शाम का खाना, तन पर वस्त्र और रहने के लिए छत , जो इस देश में संभव नहीं । कहावत है- मरता क्या न करता । बस यही हालत है इस देश के युवाओं का । कोई पढÞ लिख के बेरोजगार है, किसी को नौकरी तो मिली लेकिन उससे पेट नहीं भरता और जो पढा लिखा नहीं है उनकी तो बात नहीं की जाय । सरकार विकल्प दे तो कोई घर छोडÞ के पराया देश नहीं जाना चाहेगा । – हरिहर चौधरी, सुनसरी

स्नात्ाक उत्तर्ीण्ा करने के बाद कुछ दिन सरकारी नौकरी के लिए प्रयास किया लेकिन संभव नहीं हो पाया । सम्भव भी कैसे होता, न तो मेरे पास घूस देने के लिए पर्याप्त पैसे थे न तो सोर्स लगाने के लिए जान पहचान । फिर मैने दार्चुला स्थित एक आर्ट सेन्टर में काम किया, घर की स्थिति अच्छी नहीं थी और  पैसा भी कम मिलता था । अपना खर्च, दो बच्चे  और परिवार की जिम्मेवारी ,जीवन चलाना कठिन हो गया और मैंने विदेश जाने का निर्ण्र्ााकर लिया । पिछले एक महीने से काठमांडू में हँू । पासपोर्ट बना लिया है और एक मैन पावर वाले से बात भी हो गई है । मंै आशावादी हूँ कि जल्द ही मुझे मौका भी मिल जायेगा । मैं जानता हूँ कि विदेश में पैसा कमाना आसान नहीं । हर वक्त अपने लोग याद आएँगे खास कर बच्चे । मंैने सुना है कि वहाँ बहुत कठिन काम करके लोग पैसा कमाते हैं । लेकिन मैंने योजना बनायी है कि कुछ पैसे कमा लूँगा और  फिर नेपाल वापस आकर सामूहिक खेती करुँगा । और छोटा भाई जो कि पढर्Þाई में बहुत अच्छा है उसे पढÞाउFmगा । वास्तव में नेपाल सरकार को गंभीर होना बहुत जरूरी है अन्यथा देश में सृजनात्मकता खत्म हो जायेगी । जब तक अपना उत्पादन नहीं होगा तब तक देश विकास सम्भव नहीं ।  पता नहीं ये बात जब मै समझता हूँ तो ये बडेÞ नेता लोग, नीतिनिर्माता और योजनाकार क्यों नहीं समझते – अरविन्द सिंह कुंवर,दार्चुला

चार वर्षपहले दोहा आया रोजगार के सिलसिले में । बहुत कठिन जिन्दगी है लगभग पचास ड्रि्री सेल्सियस की गर्मी में फील्ड में काम करना पडÞता है । कभी कभी तो पीने के लिए पानी भी नहीं मिलता । लेकिन फिर भी कोई चिन्ता नहीं, कोई पश्चाताप नहीं । क्योंकि नेपाल में था तो हर रोज मरता था । बाल्यकाल की तो याद नहीं लेकिन जबसे बात समझ में आने लगी तब से भर पेट नहीं खाया, ढंग का कपडÞा कभी नहीं पहना । जिस देश की सरकार गैर- जिम्मेवार होती है वहाँ के लोगों कीे हालत ऐसी ही होती है । यहाँ अगर ढंग का काम मिल जाता तो कौन आता इस रेगिस्तान में – लेकिन बाध्यता है और ये केवल मेरी नहीं बल्कि सभी नेपाली भाइयों और बहनों की है । दोहा आने के बाद मेरी  स्थिति बदल गयी है, दोनो शाम खाता हूँ, ढंग का कपडा पहनता हूँ और कुछ पैसा जमा करके भी रख रहा हूँँ । कुछ दिन और कमाउFmगा और फिर नेपाल वापस जाउँगा । जोगिन्दर पासवान, धनुषा -दोहा में कार्यरत)

प्लस टु पास करने के बाद मैंने अमिन का तालीम लिया लेकिन नौकरी अभी तक मिली । अब तो मंैने आशा भी छोडÞ दिया है कि इस देश में मुझे नौकरी मिलेगी  और मिलेगी भी तो उससे पेट भरना संभव नहीं । आठ घण्टा काम करवा के चार हजार देने की बात करते हैं । मेरे गाँव के बहुत लोग दोहा में है और उन लोगों के सलाह मुताबिक मैं विदेश जाने की तैयारी में लगा हूँ । मेन पावर वाला ने कहा है कि १५ दिन में   मुझे उडÞा देगा । जो काम मिलेगा करुंगा बस पैसा मिलना चाहिए । लेकिन मैं ज्यादा दिन तक वहाँ नहीं रहूँगा । कुछ पैसा कमा लेने के बाद घर वापस आकर यहीं कुछ काम करुंगा । नरेश सिंह कुवंर -दार्चुला)

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