डाकू बनाम नेता

व्यंग्य

बिम्मीशर्मा

 

ठीक डकैत का जैसा ही काम आज के जमाने में नेतागण कर रहे हैं । डकैत रात में चुपके से आते थे निर्वाचन के उम्मीदवार यानी कि नेता दिन, दहाडे किसी के भी घर में घुस जाता है वोट मागंने के लिए । डाकू बन्दूक तान कर या पड्का कर लूटते थे । पर उम्मीवार मतदाता को सादर नमस्कार या दण्डवत कर के बडे प्यार से हंसी, खुशी से वोट माग कर ले जाते है ।

अब डाकू भी बीते दिनों की बात हो गए हैं । लगता है पहले के सारे डाकुओं का पोलियो की तरह उन्मूलन हो गया और उनकी जगह पर खतरनाक रोग एचआइवी एड्स की तरह नेता और नेतागिरी फैल रहा है । अभी निर्वाचन का मौसम है लगता है कब्र मे सोए हुए सारे डाकू फिर से जिंदा हो कर निर्वाचन में उठ खडे हुए हैं । जो काम पहले के जमाने में डाकू करते थे अब नेतागण कर रहे हैं ।
जब इस दुनिया में डकैत का रोबदाब था तब उनसे सभी डरते थे । आज नेता और इन के बिल यानी कि राजनीतिकदल से सांप के बिल की तरह लोग डरते हैं । रात के स्याह अधेंरे में डकैतों का समूह किसी गाँव में डाका डालने जाता था । डकैत बन्दूक की नली सीधे सीने मे तान कर किसी के घर की सारी संपति और खेत, खलिहान लूट कर भाग जाते थे । उनको पहले से ही पता चल जाता था कि किस के घर में कितना जेवर और नगद है । वह टोह लगाए रहते थे ।
ठीक डकैत का जैसा ही काम आज के जमाने में नेतागण कर रहे हैं । डकैत रात में चुपके से आते थे निर्वाचन के उम्मीदवार यानी कि नेता दिन, दहाडे किसी के भी घर में घुस जाता है वोट मागंने के लिए । डाकू बन्दूक तान कर या पड्का कर लूटते थे । पर उम्मीवार मतदाता को सादर नमस्कार या दण्डवत कर के बडे प्यार से हंसी, खुशी से वोट माग कर ले जाते है । जैसे की बेटीब्याह कर के ले जा रहे हों । वो मागंने जाते समय फूल, माला और अबीर से उम्मीदवार का ऐसे स्वागत करते हैं कब्र में लेटे हुए डाकू भी आह भरने लगे ।
डकैत गाँव या लोगों को लूट कर ले जाने के बाद कुछ समय तक खूब मस्ती करते थे । वैसे ही जब नेतावोट मागं कर या पैसे से लूट कर जितता है तब पांच साल तक संसद, एसेंबली या नगरपालिका में मस्ती करता है और खुब कमाता है । आधुनिक डकैत यानी कि नेता कमाने के लिए ही जाता है संसद में कुछ गवांने के लिए नहीं । गवांना तो जनता या मतदाता को है अपनी अंटी का पैसा और चैन । मतदाता जितने दुबलाते जाएगें और नेता भैंस की तरह मोटा होता जाएगा ।
डकैत नगद लुटते थे निर्वाचन के उम्मीदवार अर्थात नोट दे कर वोट खरीदता है । जब निर्वाचन के दरमियान उम्मीदवार आम सभा या लीची सभा करते हैं तब वह अपने मतदाता को आकर्षित करने के लिए घोषणा पत्र को सत्य नारायण भगवान की कथा की तरह वाचन करते । मतदाता उब कर जम्हाई लेने लगते हैं या सो जाते हैं । भानूमती का पिटारा से जैसे एक से एक तिलस्मी चीज निकलता है उसी तरह घोषणा पत्र में विकास के पूल बनाए जाते है । कागज का यह पूल अगला चुनाव आते, आते बह कर दूर देश पहुंच जाता है ।
डकैत लूटने की योजना बनाते थे बडी होशियारी से ताकि पुलिस को पता न चले । आज के उम्मीदवार हवाई किले बना कर अपने मतदाता को खींचते हैं । पर जब हार जाते हैं तब यह हवाई किला ढह जाता है । कोई, कोई डाकू भी बडे अच्छे और मानवीयता वाले होते थे । और यह अच्छे, मानव स्वभाव वाले डाकू धन्ना सेठ को लूट कर गरीबों की मदद करते थे । ठीक वैसे ही कुछ उम्मीदवार या नेतागण अपने मतदाता का खुब ख्याल रखते हैं और अपने निर्वाचन क्षेत्र का विकास भी करते हैं । पर बांकी जो उम्मीदवार है निर्वाचन में उठ तो जाते हैं और जल्दी बैठ भी जाते हैं । डाकू के हाथ मे ंबन्दूक की तरह शोभा पाता है उम्मीदवार के हाथ में निर्वाचन का परचा । इसी लिए डाकू का आधुनिक रुप हैं उम्मीदवार । फर्क सिर्फ इतना है कि वह लूटते थे यह मागंते है । डाकू का लूटना कुछ महीने के लिए ही उन्हे आराम देता था पर नेताओं के लिए निर्वाचन में जितना जिंदगी भर के लिए कमाई की निश्चिंंतता लिए हुए आता है ।

 

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