‘डायन’ करार देकर अमानवीय अत्याचार

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’
डायन प्रथा की आड़ में कई संगीन अपराधों को अंजाम देना हमारे समाज में आम बात है । नेपाल के गांवों में तथा छोटे कस्बों में आज भी तान्त्रिक, ओझा, भोपा, गुनिया तथा रसूखदार लोग अपने मतलव के लिए किसी महिला को कथित तौर पर ‘डायन’, ‘डाकन’, ‘डकरी’, ‘टोनही’ आदि घोषित कर देते हैं । उदाहरण के तौर पर किसी परिवार में नवजात बच्चे को कोई बीमारी हो जाती है, तो घरवाले बीमार बच्चे की चिकित्सा किसी डॉक्टर से न कराकर किसी ओझा से जादू–टोना करवाते हैं । नवजात बच्चा कुछ ही दिनों में मर जाता है । मरते समय उसका शरीर नीला पड़ जाता है । लोग कह देते हैं कि बच्चे पर किसी डायन की बुरी नजर जरूर पड़ी होगी । इसी तरह प्रसव के बाद नवजात बच्चे की मां भयंकर दर्द से कराहने लगी । उसके हाथ–पांव में खिंचाव पैदा हो गया था, तो इसकी भी जिम्मेदार डायन ही होती है जबकि ऐसा होना एक प्रकार की बीमारी ‘एक्लामशिया’ का परिणाम है ।capture-witch-hunt
हारी–बीमारी व परेशानियों से घिरे लोग अकसर ओझा की शरण में जाते हैं । भयभीत परिवारजनों के चेहरे को देखकर ही ओझा समझ जाता है कि पैसे ऐंठने का यह अच्छा मौका है । ओझा कहता है, ‘लगता है परिवार पर किसी डायन की कुदृष्टि पड़ी है । अभी तो परिवार पर और घोर विपत्ति आएगी ।’
लोग घबड़ाकर विनती करते हैं, कोई उपाय करो ओझाजी ! ‘शान्ति के लिए अनुष्ठान करना पड़ेगा । जाओ पान, सुपाड़ी, लडडू, एक बकरा, चामल, रुपये आदि सामानों की व्यवस्था करो’, ओझा कहते हैं ।
बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी कमानेवाला निर्धन परिवार इस डर से कि डायन की बुरी नजर सारे परिवार को ही खत्म कर देगी, किसी तरह से खर्च की व्यवस्था करता है, क्योंकि भूत–प्रेत, डायन से लड़ना तो ओझा के ही वश में हैं ।
बड़ी मुश्किल से अुनष्ठान की व्यवस्था हो जाने पर, ओझा अनुष्ठान का दिन निर्धारित करता है । निर्धारित दिन पर ओझा अपना तमाम ताम–झाम लेकर पीड़ित परिवार के घर पहुँचता है । जादू–टोना के साथ अनुष्ठान किया जाता है । ओझा गले में अजीबों गरीब आवाजें निकाल, तरह–तरह की हरकतों से ऐसा नाटक करता है कि मानों उसके सिर पर वाकई देवता आ गया है । वह जोर जोर से सिर हिलाने और उछल–कूद करने लगता है । बच्चों तथा महिलाओं को यह दृश्य देखने की मनाही होती है । इस बीच ओझा जोर से चिल्ला उठता है, ‘बोल ! किसकी बुरी नजर पड़ी है इस घर पर । बता वरना मैं तुझे खतम कर दूंगा ।’
उपस्थित लोग वैसे ही बे सिर पैर के प्रश्न करने लगत हैं । इस बीच गांव की किसी महिला का नाम लेकर ओझा हांक मारता है, ‘अमुक औरत की नजर पड़ी है इस घर पर । वह औरत डायन है ।’
ओझा बाद में बकरे की बलि चढ़ाने के लिए अनुमति देते हैं । अनुष्ठान में उपस्थित लोग डटकर भोजन करते हैं । इस प्रकार से पूरा होता है अनुष्ठान । पीड़ित परिवार के लोग इस बात पर संतोष कर लेते हैं कि चलो बुरी नजर तो कटी ।
इस प्रकार भविष्यवाणी के लिए अचेतावस्था की कई विधियां अपनायी जाती हैं । उदाहरण के लिए जब ओझा झाझा बजाता है तो उसका साथी सिर हिलाता है । यह सब तब तक होता है, जब तक भूत नहीं आ जाता । उसके बाद ओझा बताता है कि उस पर कौन सा देवता आया है और शान्ति के लिए वह देवता क्या चाहता है । अक्सर बीमा आदमी ओझा के साथ नाचने लगता है फिर अचेच अवस्था में बताता है कि उस पर कौन सा देवता आया है अर्थात् कौनसी महिला अमुक देवता बनकर आयी है ।

वे देवता सामान्यतः कबूतर, बकरा की बलि या मिठाई, आभूषण, वस्त्र या धन की भेंट चाहता है । ये सारी चीजें ओझा को मिलती हैं । डायन या देवता का जानने के और तरीके भी अपनाये जाते हैं । वह ओझा अपने यजमान से तम्बाकु मंगवाता है और इसे, जब झांझ बज रही होती है? मरीज के शरीर के चारों ओर घुमता है । फिर वह चिलम पीता है और नाचना शुरु कर देता है । कभी–कभी तो ओझा खूद को ही कोड़ों से पीटता है । इसके बाद ओझा अचेत हो जाता है और इसी अचेतावस्था में वह बीमारी का कारण एवं उपचार के देवताओं के नाम गिनता है । कभी–कभी वह खांसने लगता है और खांसते समय ओझा जिस देवता का नाम लेता है, वही देवता बीमारी पैदा करनेवाला होता है । डायन करार देने का यह भी तरीका देखा गया है । (गोरखापत्र २०५५, सप्तरी ।
इसके बाद वाले दिन गांव पञ्चायत बैठकर निर्णय लेती है कि अमुक स्त्री डायन है । औरत को डायन करार देने के बाद उसे सजा दी जाती है । सजा भी विविध प्रकार की होती हैं । जैसे, मयावी स्त्री को जूतों और डंडों से पीटा जाता है । कभी–कभी उसे गधे की पीठ पर बैठाकर गांव से बाहर निकाल दिया जाता है । पत्थर से उसके दाँत तोड़ दिए जाते हैं । उस पर कूड़ा–कचरा फेंका जाता है, उसे चमड़ा कमाने वाले पात्र का पानी पिलाया जाता है, उसका अंग–भंग कर दिया जाता है । प्रायः उसे मार डालने का प्रयास किया जाता है । पहले जमाने में महिलाओं को जादू टोना करने के कारण ही मार दिया जाता था (गोरखापत्र, २०५४) और ऐसा आज भी हो रहा है । नेपाल के हर क्षेत्रों में ‘डायन’ की कुप्रथा आज भी जारी है । ऐसी बेचारी औरतों को ‘डायन’, डेणी’, ‘डाकिनी’ ‘मायावी स्त्री’, ‘मरघटी’ ‘डायनी’, ‘बोक्सी एवं बोक्सिनी’ (नेपाली में) कहा जाता है । इसी प्रकार ओझा को मायावी, जादूगर, भविष्यवक्ता, झाड़–फूंक करनेवाले, वैद्य, सयाना, भगत, अघोरा, बोक्सो (नेपाली में) कहा जाता है ।
डायन करार दिये जाते समय अकसर यह देखने को मिलता है कि विधवा या बुजुर्ग महिला को ही ‘डायन’ कहा जाता है जो सामथ्र्यहीन होते हुए भी कुछ सम्पन्न हों और उसकी गांववालों या पड़ोसियों या परिजनों या गांव के ओझा से न बनती हो ताकि उसे खतम कर उसकी सम्पत्ति छीनी जा सके । कई मामले ऐसे भी हैं, जिसमें शारीरिक शोषण का विरोध करनेवाली महिलाओं को भी डायन करार देकर मारा गया है (गोरखापत्र, २०५४) । काला जादू या टोना–टोटका के अन्धविश्वास भरे आरोप लगाकर किसी महिला को डायन बताकर मार डाला जाता है । यौन शोषण का विरोध करने या पत्नी को तलाक देने के लिए इस प्रथा का इस्तेमाल किया जाता है । एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर महिलाएं सम्पत्ति और जायदाद की वजह से डायन हिंसा की शिकार हो रही है । अधिकतर मामलों में दलित महिला को उनके ही संगे संबंधी और गांव के लोग डायन करार देकर उनकी हत्या कर दे रहे हैं । गांव पञ्चायत द्वारा निर्दोष होते हुए भी उस महिला पर ऐसे–ऐसे अत्याचार किए जाते हैं, सजा के नाम पर अमानवीयता की सभी सीमाएं पार कर जाती हैं ।
कभी–कभी गांव पञ्चायत का मुखिया या गांव के लोगों द्वारा तथाकथित डायन से दंड स्वरुप मोटी रकम वसूल किया जाता है । कभी–कभी उसे पूरे गांव को सामूहिक भोज देने का हुक्म दिया जाता है । (पंक्तिकार के पड़ोसी गांव में, वि.सं. २०५३) । इतने पर भी उस पर लगाया गया ‘डायन’ होने का आरोप वापस नहीं लिया जाता । फिर कभी जब ऐसी ही कोई घटना होती है तो फिर उस महिला को पुनः सजा दी जाती है । इस बार सजा में और सख्ती बढ़ा दी जाती है । यदि गांव में इस प्रकार की घटनाएं तीन–चार बार घट जाती हैं, तो डायन करार दी गई महिला के गांव पञ्चायत में सबके सामने उसके कपड़े फाड़ दिये जाते हैं । नितान्त नंगा करके उसे गांव से बाहर कर दिया जाता है । उसके परिवारजन, पति, बेटा–बेटी या दूसरे रिश्तेदार भी उसका साथ छोड़ देते हैं । गांव की कोई औरत या आदमी उसे बचाने के लिए आगे नहीं आता । यह भी देखा गया है कि गांव से बाहर निकालने के बाद उसे किसी मैदान में पेड़ से बांध दिया जाता है । गांववाले उसे पत्थर मार–मारकर लहुलुहान कर देते हैं । परन्तु इससे भी अमानवीय तथा शर्मनाक बात तो यह होती है कि यदि वह जवान होती है तो उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है (गोरखापत्र २०६५) ।

और इस सब में गांव–समाज के ठेकेदार ही बढ़–चढ़कर हिस्सा लेते हैं । बलात्कार करने का पहला अधिकार ओझा को ही होता है । ओझा के इस अधिकार के पीछे यह कहानी भी गढ़ ली गई है कि वह ओझा जिसके प्रभाव से वह औरत डायन बनी है, वह देख ले कि वह डायन महिला कुलटा है, और वह उस कुलटा को डायन समूह से निकाल बाहर कर दे । अर्थात्, एक ओझा द्वारा बनायी गयी डायन दूसरे ओझा की भोग्या बनने के बाद पुनः आम औरत बन जाए ।
एक रिपोर्ट के अनुसार डायन करार देकर अमानवीय अत्याचार करने की घटनाओं में कमी आई है, परन्तु अभी भी इस पर नियन्त्रण पाने की दिशा में व्यापक तौर पर समर्पित होकर कार्य करने की जरूरत है । इसके लिए जन–जागृति के साथ विशेष कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है । अन्धविश्वासपूर्ण डायन की कुप्रथा को मिटाने के लिए समाज के हर तबके के उन लोगों को आगे आना होगा, जिन्हें मानवीय मूल्यों तथा मर्यादाओं में अभी भी विश्वास है । डायन की प्रथा पूरे नेपाली समाज के लिए कलंक है । अतः इसे मिटाने की जिम्मेदारी भी पूरे समाज की है ।
इस कुप्रथा के विरोध में मानवाधिकारकर्मी, नागरिक समाज तथा जागरुक लोग उठ खड़े हुए हैं और वे इस पर नियन्त्रण लगाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं उन्हें दबाने के लिए राजनीतिज्ञ, सांसद व प्रभावशाली लोग और ठेकेदार, जिनके कि स्वार्थ जुड़े हुए हैं, गोलबन्द हो रहे हैं ।

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