डा. यादव की विदाई

पहले राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव ने अपना कार्यकाल पूरा किया है । संविधानतः दो साल के लिए निर्धारित उनका कार्यकाल विभिन्न कारण सात साल से लम्बा हो गया । इसबीच में देश में महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना हुई, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डा. यादव की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही । सामान्यतः उनका कार्यकाल सफल ही माना जाएगा । उनके कार्यकाल में कुछ ऐसी भी घटना घटित हुई, जिसके चलते पूर्वराष्ट्रपति डा. यादव को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में विवादित होना पड़ा । लेकिन यह विवाद उनकी अभिभावकीय भूमिका के आगे गौण बन गया । विशेषतः उनके कार्यकाल में शान्ति प्रक्रिया से जुड़े हुए विषय को निर्णायक परिणाम देना था यह कम चुनौतीपूर्ण नहीं था । सशस्त्र युद्ध लड़कर आए माओवादी मानसिकता को परिवर्तन करना और विद्रोही सेना को नेपाली सेना के साथ समायोजन करना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं था । इसी तरह हर साल परिवर्तन होने वाला सरकार और उस में राष्ट्रपति को घसीटने जैसा राजनीतिक दलों के कदम का भी उन्हें सामना करना पड़ा ।
विशेषतः मधेसी समुदाय से राष्ट्रपति चयनित यादव ने निर्वाह किए गए राष्ट्रीय भूमिका बहुतों के लिए प्रंशसनीय बन गया । राजनीतिक एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए उन्होंने जो भूमिका निर्वाह किया, वह कम महत्वपूर्ण नहीं था । लेकिन उनकी यही भूमिका को क्षेत्रीयतावादी कुछ मधेसी दलों ने ‘पहाडि़या राष्ट्रवाद’ का आरोप लगाते हुए आलोचना भी की । इस तरह राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले डा. यादव दूसरी संविधानसभा कार्यकाल के अन्तिम क्षण में मधेशवादी दिखाई देकर कुछ विवादित भी नजर आए । लेकिन उन्होंने बहुमत से पारित संविधान जारी कर अपनी भूमिका कुशलता पूर्वक निर्वाह किया ।
वैसे तो उनका विवादित विषय इतना ही नहीं है । संविधानसभा निर्वाचन के बाद सबसे बड़े दल के नेता होने के नाते भी संसद में बहुमत हासिल कर विद्रोही समूह के नेता पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड प्रधानमन्त्री बने थे । उन्होंने अपने कार्यकाल में तत्कालीन सेनापति रुक्मांगत कटुवाल को बर्खास्त करने का निर्णय लिया । ‘कटुवाल काण्ड’ नाम से परिचित उस घटना में राष्ट्रपति यादव ने प्रचण्ड को रोक दिया । संवैधानिक राष्ट्रपति होने के नाते उनका यह पहला गलत कदम था । इसमें उनको सबसे ज्यादा विवादित होना पड़ा । उसी तरह पहले संविधानसभा के उप–निर्वाचन में अपने बेटे चन्द्रमोहन यादव को चुनाव जिताने के लिए भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निर्वाह किया, ऐसा आरोप उनके ऊपर रहा । पार्टीगत पृष्ठभूमि के सम्बन्ध में वह और कुछ घटना में भी विवादित रहे । वह है– कांग्रेस के १२वें महाधिवेशन में सुशील कोइराला के पक्ष में वोट मांगना । इसी तरह और एक आरोप है– वि.सं. ०६९ साल में कांग्रेस–एमाले के साथ मिल कर डा. बाबुराम भट्टराई नेतृत्ववाली सरकार को बर्खास्त करने का प्रयास भी उन्होंने किया । इस तरह के कुछ विवादित घटना के बावजूद भी उनका कार्यकाल सफल माना जाता है । क्योंकि उनके कार्यकाल में शान्ति प्रक्रिया ने पूर्णता पायी है और देश ने नया संविधान । और जितना भी विवादित हो गए, लेकिन यादव के विरुद्ध संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं हो सका ।
चर्चा में ये दोनों भी
माओवादी सशस्त्र विद्रोह के सैन्य कमाण्डार नन्दकिशोर पुन ‘पासाङ’ मर्यादा क्रम के अनुसार देश के दूसरे सम्मानित व्यक्तित्व ‘उपराष्ट्रपति’ हुए है । उनको उप–राष्ट्रपति बनाने के लिए कुछ ज्यादा ही राजनीतिक खींचातानी हुई है । क्याेंकि पासाङ के विपक्ष में स्वयं सत्ता साझेदार कुछ दलों के कुछ नेता हाथ धोकर लगे थे । जब माओवादी ने सरकार छोड़ने की धमकी दी, तब वे लोग पासाङ के लिए सहमत हो गए । इसीतरह नेपाली सेना के कुछ अधिकारी भी पासाङ के विरुद्ध थे । और स्वयं एमाओवादी पार्टी भीतर से भी उनके विरुद्ध लॉबिंग हो रही थी । इन सारी चुनौतियों के बावजूद भी पासाङ उप–राष्ट्रपति होने में सफल बने । राजनीतिक वृत्त में अभी राष्ट्रपति विद्या भण्डारी से कम चर्चा उनकी नहीं है । इसमें उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि ज्यादा काम कर रही है ।
विद्रोही सेना के सर्वोच्च कमाण्डर पासाङ को आज नेपाली सेना सलामी अर्पण कर रही है । एक समय ऐसा भी था, जहाँ पासाङ के विरुद्ध नेपाली सेना युद्ध लड़ रही थी और उनके सर का मूल्य घोषित किया गया था । आज वही व्यक्ति नेपाली सेना से ‘सलामी’ ले रहा है । सिर्फ नेपाल में ही नहीं विश्व भर राजनीतिक वृत्त में ऐसी घटना कम ही होती है, जहाँ राष्ट्र की वैधानिक सेना विद्रोही सेना को ‘सलामी अर्पण’ करे । इसीलिए उनकी चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है ।
उप–राष्ट्रपति सम्मानित पद है, लेकिन हमारे देश में उप–राष्ट्रपति को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गयी है । आलोचक कहते हंै– इस पद को अनावश्यक रूप में सृजित किया गया है । जो भी हो, पासाङ उक्त पद में पहुँचने में सफल हुए है ।
इसी तरह, चर्चा के शिखर में और एक भी पात्र है– ओनसरी घर्ती मगर । ओनसरी नेपाल की पहली महिला सभामुख हैं । एमाओवादी कोटा में से सभामुख बनने के कारण भी उनकी चर्चा कुछ ज्यादा है । वह भी माओवादी के सैन्य पृष्ठभूमि की हैं । सशस्त्र युद्ध के समय घर्ती ने माओवादी सेना के भीतर कमाण्डर की भूमिका निर्वाह किया था और दर्जनों सैन्य आक्रमण में नेतृत्व किया था । लेकिन आलोचकों की माने तो उन में वह खूबी नहीं है– जो सभामुख में होनी चाहिए । लेकिन संसदीय राजनीति में उन्होंने नेपाल की पहली महिला सभामुख हो कर एक नया इतिहास निर्माण किया है ।
नेपाल के अतिदुर्गम क्षेत्र रोल्पा, स्थायी निवासी ओनसरी का पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सामान्य हैं । पाँच सर्वोच्च पदों में से एक हैं, सभामुख का पद । माओवादी लड़ाकु कमाण्डर से सभामुख तक की उनकी यह राजनीतिक यात्रा को देखकर बहुत महिला अपने जीवन में प्रेरणा ले सकती है ।

Loading...
%d bloggers like this: