डेंगु का मरीच Bpkihs में भर्ती, डेंगू रोग नेपाल मे बचना जरुरी है : डा .अरुणकुमार सिंह

jina-rai

डा .अरुणकुमार सिंह बालरोग विशेषज्ञ बी.पी. कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान,धरान, धरान, २७ गते | डेंगु से ग्रसित एक मरीच को धरान स्थित बिपिकोइराला प्रतिष्ठान (Bpkihs) में इलाज के लिए भर्ती किया गया है | १३ बर्ष की जीना राई के शरीर में यह रोग पाया गया है | इसकी जानकर डा.अरुण कुमार से मिली है |

 डेंगू रोग नेपाल मे बचना जरुरी है सब को …..!!! डेंगू एक उष्णकटिबंधीय संक्रामक रोग बीमारी हैं जो एडीज इजिप्टी मच्छरों के काटने से होता है। आज नेपाल के तराई मे डेंगू रोग बहुत देखा जा रहा हे !तराई के जनकपुर ,धरान,बिराटनगर ,राजविराज ,चितवन ,बिरगंज मे काफी डेंगू रोगि मिलाता हे !डेंगू रोगि बी.पी. कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान,धरान मे डेंगु शोक के जीना राई धारण १६ निवासी को कारण दाखिल करना पडा,इलाज़ के बाद अब बचा ठिक हो गया हे !!डेंगू रोगि बी.पी. कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान,धरान मे रोगि काफी आज काल नजर आरहे हे ! आखिर डेंगू रोग क्या हे कसे होता हे हिमालानी के पाठक को जानकारी दिने का परयास किया हे ! लक्षण डेंगू रोगमे अचानक तीव्र ज्वर के साथ शुरू होता है, जिसके साथ साथ तेज सिर दर्द होता है, मांसपेशियों तथा जोडों मे भयानक दर्द होता है जिसके चलते ही इसे हड्डी तोड़ बुखार कहते हैं। इसके अलावा शरीर पर लाल चकते भी बन जाते है जो सबसे पहले पैरों पे फिर छाती पर तथा कभी कभी सारे शरीर पर फैल जाते है। इसके अलावा पेट खराब हो जाना, उसमें दर्द होना, कमजोरी, दस्त लगना, ब्लेडर की समस्या, निरंतर चक्कर आना, भूख ना लगना भी लक्षण रूप मे ज्ञात है। कुछ मामलों मे लक्षण हल्के होते है जैसे चकते ना पडना, जिसके चलते इसे इंफ्लूएंजा का प्रकोप मान लिया जाता है या कोई अन्य विषाणु संक्रमण, यदि कोई व्यक्ति प्रभावित क्षेत्र से आया हो और इसे नवीन क्षेत्र मे ले गया हो तो बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती है रोगी यह रोग केवल मच्छर या रक्त के द्वारा दूसरे को दे सकता है वह भी केवल तब जब वह रोग ग्रस्त हो। ये ज्वर ६-७ दिन रहता है ज्वर समाप्ति के समय फिर से कुछ समय हेतु ज्वर आता है, जब तक रोगी का तापक्रम सामान्य नहीं होता है तब तक उसके रक्त मे प्लेटलेटस की संख्या कम रहती है। जब डेंगू हैमरेज ज्वर होता है तो ज्वर बहुत तेज हो जाता है रक्तस्त्राव शुरू हो जाता है, रक्त की कमी हो जाती है, थ्रोम्बोसाटोपेनिया हो जाता है, कुछ मामलों में डेंगू प्रघात की दशा [डेंगू शोक सिंड्रोम] आ जाती है जिसमे मृत्यु दर बहुत ऊँची होती है। इलाज डेंगू का इलाज आम तौर पर चिकित्सकीय प्रक्रिया से किया जाता है, लेकिन इसे दूसरे विषाणु-जनित रोगों से अलग कर पाना कठिन है। उपचार का मुख्य तरीका सहायक चिकित्सा देना ही है, मुख से तरल देते रहना क्योंकि अन्यथा जल की कमी हो सकती है, नसों से भी तरल दिया जाता है, यदि रक्त मे प्लेटलेटस की संख्या बहुत कम हो जाये या रक्त स्त्राव शुरू हो जाये तो रक्त चढाना भी पड़ सकता है, आंतो मे रक्तस्त्राव होना जिसे मेलना की मौजूदगी से पहचान सकते है मे भी खून चढाना पड सकता है। इस संक्रमण मे एस्प्रीन या अन्य गैर स्टेरोईड दवाएँ लेने से रक्तस्त्राव बढ जाता है इसके स्थान पर संदिग्ध रोगियों को पेरासिटामोल देनी चाहिए। नियंत्रण और बचाव डेंगू के रोक्थाम के लिए यह जरुरी है कि डेंगू के मछरो के काटने से बचे, तथा इन मछरो के फैलने पर नियन्त्रण रखा जाए। ईजिप्टी को नियंत्रित करने की प्राथमिक विधि उसके निवास को नष्ट करने से है।यह पानी के कंटेनर खाली करने या इन क्षेत्रों मे कीटनाशकों के उप्योग से किया जात है।पर्यावरण संशोधन के माध्यम से पानी के खुले संग्रह को कम करना ही नियन्त्रण का मुख्य तरीका है क्योंकि कीटनाशकों और नियंत्रण एजेंटों से स्वास्थ्य पर् नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह उपाय माने गये है। लोग पूरे वस्त्र पहनकर् तथा मच्छर जालो का प्रयोग करके इससे बच सक्ते है। लेखक डा. अरुणकुमार सिंह ,बालरोग विशेषज्ञ ,बी.पी. कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान,धरान मे हे )

 

15044679_10209874441571062_470199737_o

 

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: