डॉ राउत के साहित्य और विचारों पर खुली-चर्चा जरुरी

दीपेन्द्र चौवे

दीपेन्द्र चौवे

दीपेन्द्र चौबे,काठमांडू, २ अक्टूबर २०१४ । नेपाल में मधेश का तिरस्कार–
उपनिवेशिक व्यवस्था के बाद विश्व में बहुतसे बदलाव हुए 24 अक्टूबर 1945 यूनाइटेडनेशन का गठन विश्व में शांति व्यवस्था बनाए रखने और बिना भेदभाव किये सभी राष्ट्रों के विकास को आगे बढ़ाने के लिए किया गया । लेकिन इस प्रतिबद्धता के बावजूद शोषण की राजनीति आज भी जारी है । वैश्विक स्तर पर दूसरे की साहित्य. संस्कृति भाषाए ज्ञान.विज्ञान इतिहास के साथ नीचा या छोटा दिखाने की राजनीति तेजी से जारी । बहुत बार दूसरे की संस्कृति की अच्छी चीजों पर कब्ज़ा जमा कर एक छल के साथ संचारित किया जाता है कि वो उस संस्कृति का हिस्सा है । इस तरह की राजनीति यूरोपीय और भारतीय संस्कृति के बीच दिखाई देती है । भारत के ऊपर शासन करते हुए ब्रिटेन ने बहुत से भारतीय चीजों को लेकर उन्हें अपना दिखाया है जो आज भी जारी है । इस तरह का छल न केवल देशों के बीच बल्कि एक देश के अन्दर विभिन्न समुदायों के बीच भी होता है ।  इसका सबसे अच्छा उदाहरण नेपाल में मधेशी समुदायों के साथ नेपाल के पहाड़ी समुदाय द्रवारा किया जा रहा भेद.भाव है । आज भी नेपाल में मूल  मधेश के निवाशियों को खतरनाक हिंसक विखंडनकारी माना जाता है । उदाहरणस्वरुप जब भी मधेशियों ने अपने अधिकार और राष्ट्रीयता की बात की है तो उन्हें विखंडनवादी और राष्ट्रीय अखंडता के विरुद्ध दिखाने की कोशिश की गयी है जबकि नेपाल के इतिहास में ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं पाया गया की नेपाल के मधेशियों ने नेपाल की एकता और राष्ट्र के विरुद्ध कोई कार्य किया हो । बल्कि यह देखा गया है की वहां के खास नेपाली शाशक वर्ग नौकरशाह या तो इनके परिवार के सदस्य पश्चिमी देशो में है या पश्चमी देशों सहित अमेरिका ,आस्ट्रेलिया आदि के नागरिक बने हुए हैंऔर इन्हें राजनितीक प्रचार के तहत राष्ट्रवादी दर्शाया जाता है । जबकी देश के लिए इनका कितना योगदान है यह छुपा हुआ नहीं है। नेपाल के शाशक वर्ग की राजनीत के दबाव का ही प्रभाव है की मधेशी समुदाय के लोगों के योगदान को इतिहास और साहित्य के पन्नों से अलग रखा गया है ।

सी के राउत अदालत मे

सी के राउत अदालत मे

विश्व का इतिहास गवाह है कि साहित्य का वर्चस्व किसी युद्ध से भी अधिक घातक है। जैसे यूरोपीय लेखकों साहित्यकारों एवं इतिहासकारों द्वारा अपनी रचनाओं में अफ्रीकी रेड इंडियन्स और फिलिपीनीए विएतनामी लोगों को नरमांसभक्षी के तौर पर पेश किया गया। जबकि दूसरी ओर यूरोपीय लोगों की छवि नैतिकता के प्रतिमान परिपक्व विज्ञान के ज्ञाता की बनाई गई। वैसे ही नेपाल में मधेशी साहित्य भाषा ज्ञान.विज्ञान संस्कृति कला पर नेपाली पहाड़ी शाशकों द्रवारा जिस तरह से वर्चस्व कायम किया गया है इससे मधेशी इतिहास साहित्य भाषा और संस्कृति तिरस्कार का शिकार होता आ रहा है जिसका असर मधेशियों के लिए अधिक घातक है औरयह प्रभाव किसी युद्घ से भी अधिक खतरनाक होता जा रहा है । इसी क्रम में अगर हम डा सी के राउत की बात करें तो उनके ‘मधेश का इतिहास’ ‘स्वराज’ ‘वीर मधेशी’ और अपनी आत्मकथा जैसे साहित्य में आज मधेश की जनता को उन्होंने मधेश का इतिहास बता कर जागरूक करते हुए अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के लिए अपने साहित्य से प्रेरणा दी है । इसकी प्रसंशा होनी चाहिए। लेकिन यह नेपाल सरकार और खषवादी लोगों को पसंद नहीं आया और उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दरकिनार करते हुए डॉ सी के राउत को झूठे आरोंपों के तहत अवैधानिक तरीके से गिरफ्तार कर लिया । नेपाल में २५० वर्षों से राजाओं से लेकर आज के राजनेताओं का शासन होता आ रहा है औरवर्षों से इनका मधेश और मधेशी साहित्य पर प्रभाव रहा है इसलिएनेपाल के साहित्य में मधेशियों के योगदान  पर यहां अभी तक बहस नहीं हुआ है । आज जब डॉ सी के राउत ने साहित्यों के माध्यम से नेपाल के इतिहास में मधेश के योगदान को दर्शाने की कोशिश की तो अभियक्ति की स्वतंत्रता की अनदेखी कर के उन्हें अपहरण की शैली में गैरन्यायिक तरीके से गिरफ्तार कर उनपर देश की अखंडता को तोड़ने का इल्जाम नेपाली शाशकों द्र्वारा लगाया जा रहा है। इसलिए डॉ सी के राउत के साहित्यों और उनके द्रवारा प्रस्तुत किए गए विचारों पर विचार.विमर्श होना चाहिए जिससे नेपाल के इतिहास में मधेश के योगदान की सच्चाई सबके सामने आये । इसमें एक बात ध्यान में रखने की है कि आज भी नेपाली मीडिया इस विषय को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं हैं। आज भी उनकी आंखों पर नेपाली शाशकों का चश्मा चढ़ा है लेकिन इस आक्रामक तिरस्कारका प्रतिकार किए बिना इस देश में प्राप्त मधेशी अधिकार परिपूर्ण नहीं मानी जा सकता।

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