डॉ. राणा की उड़ान के साथ.. : डॉ.श्वेता दीप्ति (अठारहवीं गजल संग्रह का विमोचन)

डॉ.श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ८ सेप्टेम्बर | हमें भेजा है दुनिया में, निशानी छोड़ जानी है, जो देखा जिंदगानी में, कहानी छोड़ जानी है । डा. कृष्णजंग राणा नेपाली साहित्य का एक जाना पहचाना नाम है । मखमली आवाज, सौम्य और शालीन मुस्कान आपकी पहचान है । जब भी मिली एक सुखद अहसास के साथ मिली । आपके सहज और सौम्य व्यक्तित्व ने हमेशा प्रभावित किया है । आज उनकी अठारहवीं गजल संग्रह “उड़ान” का विमोचन हुआ और उसमें शामिल होने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ । जिन्दगी के उस पड़ाव पर आप हैं, जहाँ अक्सरहाँ लोगों की जिजीविषा लगभग समाप्त हो जाती है, पर उनका व्यक्तित्व हमें जीना सिखाता है । बस उनकी इसी खासियत की वजह से आज उनके लिए श्रद्धा के चंद भाव व्यक्त करने से खुद को रोक नहीं पाई । यूँ तो आपकी शख्शीयत को चंद अल्फाजों में बाँधना सूर्य को दीप दिखाने के जैसा है ।

उनकी तीन गजल संग्रहों को पढ़ने का अवसर मिला है मुझे, जिन्दगी की परछाइयाँ, धूपछाँह और अब उड़ान मेरे हाथों में है जिसके शब्दों के साथ रुबरु हो रही हूँ । रचनाकार जीता है अपनी तन्हाइयों के साथ, अपने अनुभवों के साथ, उम्मीदों के साथ और अपनी भावनाओं के साथ और उससे जो छन कर निकलता है, वो पद्य की कोई भी विधा हो सकती है, गीत, गजल, कविता, छंद या मुक्तक । नाम चाहे हम जो भी दे दें पर होती वो कवि के अनुभवों की गाथा ही है । आपने कहा है, कोई हँसता है यहाँ और कोई रोता है कोई पाता है यहाँ और कोई खोता है । जिन्दगी यूँ ही कटी, जाने या अनजाने में दिल की पीड़ा को तो वह आँसुओं से धोता है । जी हाँ ! ये आँसू ही तो हैं, जो न तो खुशियाँ देखती हैं और ना ही गम बस आँखों को भिगो जाती है । जो बह निकले आँखों से, वो आँसू है और जो जज्ब हो जाए दिल के किसी कोने में, वो हमारा अनुभव है । डा. राणा कई बार इस अनुभवों के साथ जीते नजर आते हैं जब वो कहते हैं कि, खुद–ब–खुद ही सीख लो, तदवीर जीने की जिन्दगी की खुद लिखो तहरीर जीने की । या फिर, दिल के अँदर ना जाने क्यों आग जली रहती है, पीड़ाओं को चूम रहा हूँ अनजाने अनदेखे । और कभी उनकी जिद होती है उन खुशियों को पा लेने की जो कहीं दूर उनके हाथों से फिसल गई है और इसी जुनून में वो कहते हैं, ढूँढ कर तुम छीन लो खुद अपनी खुशियों को अब तुम्हीं पर है टिकी जागीर जीने की । कभी खामोशी तो कभी बातें करतीं इनकी गजल, जिन्दगी के कई रुपों से हमें परिचित कराती हैं ।

जाहिर सी बात है कि जिन्दगी सिर्फ खुशियों का नाम नहीं, फूल हैं तो काँटें भी हैं, खुशियाँ हैं तो गम भी और धूप है तो छाँव भी और इन्हें समेटते हुए आपके शब्द बोल उठते हैं— जिन्दगी में दर्द का होना भी लाजिम है आदमी को कुछ बहुत रोना भी लाजिम है । हर किसी को प्यार हरदम है कहाँ मिलता प्यार के एहसास को खोना भी लाजिम है । एक हौसला भी है फिर से जिन्दा होने का इसलिए तो कहते हैं कि— सूखकर गुलशन अगर वीरान हो जाए प्यार के दो फूल को बोना भी लाजिम है । गजलकार कई बार टूटता हुआ नजर आता है, जब वो यह कहता है कि— लाए नहीं थे साथ कुछ, ले जाना कुछ नहीं है पास मेरे कुछ नहीं, बस दिल का खजाना । तो कई बार जिन्दगी की रुमानियों से सराबोर भी नजर आता है यार जितना भी कसक दे हमको यार को दिल में हम सजाते हैं । इश्क होता है बहुत दीवाना इश्क में जीते हैं मर जाते हैं । कहीं दर्द है कुछ खोने का तो कहीं बहुत कुछ पा लेने का सुकून भी । कहीं देश के लिए प्यार है तो कहीं प्रकृति के प्रति आभार भी, कहीं जिन्दगी से शिकायत है तो कहीं जिन्दगी से प्यार भी । यानि उड़ान एक पुरसुकून अहसास है जो हमें दूर कहीं उस जहाँ में ले जाती है जो जीवन के कई रंगो से कैनवास पर सजी वो तस्वीर है, जो हमें जीना सिखाती है और मुसीबतों से लड़ना भी । डा. राणा की लेखनी यूँ ही हमें शब्दों के अनमोल खजाने को देती रहे और उनका सानिध्य हमें मिलता रहे परम सत्ता से यही प्रार्थना है हमारी । पुनःश्चः आपकी लेखनी को हमारा नमन ।

 

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