डोकलाम विवाद : चीन कीबढ़ती आकांक्षाओं पर लगाम : कुमार सच्चिदानन्द


भारत और चीन के बीच भुटान के डोकलाम को लेकर तनाव शिखर पर है और एक अशाँति का साया समस्त एशिया पर मँडरा रहा है । दोनों ही देशों के बीच वाक्युद्ध तेज है और युद्ध का मनोविज्ञान भी लगभग तैयार है । लेकिन तीली अभी तक नहीं सुलगायी गयी है क्योंकि दोनों ही पक्ष जानते हैं कि अगर युद्ध हुआ तो यह सामान्य नहीं होगा और इसके विनाशकारी परिणाम दोनों को ही झेलने होंगे । यही कारण है कि दोनों ही पक्ष अपनी–अपनी सीमाओं पर शस्त्रास्त्र तो तैनात कर ही चुके हैं मगर सीमा की सुरक्षा तैनात सैनिकों की मानव–श्रृंखला कर रही है और दो महीने की तनातनी के बावजूद एक भी गोली या बम का धमाका वहाँ नहीं हुआ और स्थिति नियंत्रण में है । चीन का पक्ष यह है कि डोकलाम, जहाँ वह सड़क बनाना चाहता है उसकी जमीन है जबकि भुटान इस पर अपना दावा कर रहा है । सच चाहे जो भी हो मगर इस जमीन का सम्बन्ध चीन और भुटान से है । इसलिए भारत का यहाँ न तो सरोकार है और न ही उसके विरोध की कोई आवश्यकता । लेकिन इस भूभाग पर भुटान अपना दावा करता है और चीन के सड़क निर्माण के प्रयास को वह अवैधानिक मानता है । इसलिए वह इसका प्रबल विरोध कर रहा है और इसे सशक्त बनाने के लिए भारत से सैन्य सहयोग की गुहार उसने की है । भारत का पक्ष यह है कि भुटान उसके सुरक्षा छाते में है, इसलिए उसके आह्वान पर उसकी सीमाओं की सुरक्षा उसका दायित्व है । अगर वह यहाँ चूकता है तो न केवल उसकी विश्वसनीयता समाप्त होगी बल्कि भुटान पर चीन के प्रभाव का विस्तार होगा । इसके साथ ही भारत की अपनी सामरिक चिन्ताएँ भी हैं । अगर इस क्षेत्र में चीन सड़क बनाने में सफल हो जाता है तो तो वहाँ से भारत का ‘चिकेन–नेक’ क्षेत्र महज कुछ किलोमीटर ही रह जाएगा जहाँ तक चीन की पहुँच सहज हो जाएगी और अगर कभी वह इस भूभाग पर अपना कब्जा बनाने में सफल हो गया तो पूरे पूर्वोत्रर भारत से शेष भारत का सम्पर्क टूट जाएगा । इस लिए यहाँ चीन द्वारा सड़क बनना वह अपनी अखण्डता पर खतरा मानता है ।
आज डोकलाम के बहाने भारत और चीन के बीच चरम तनाव की स्थिति देखी जा रही है । इसका मूल कारण दोनों ही एशियाई महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं का टकराव ही है । चीन न केवल एशिया वरन वैश्विक स्तर पर उभरती हुई महाशक्ति है, विश्व की श्रेष्ठतम शक्ति बनने की होड़ में शामिल है । लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर उसे सबसे अधिक भारत की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है । यही कारण है कि विगत एक दशक से वह धीरे–धीरे भारत को सामरिक और व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा के स्तर पर घेरने का प्रयास कर रहा है । पाकिस्तान के ग्वादरकोट बन्दरगाह से उसकी यात्रा लंका और बंगलादेश होते हुए अब भुटान में अपना पैर पसार रही है और नेपाल में भी उसकी बढ़ती कूटनैतिक सक्रियता इसी का नतीजा है । इस ताजा विवाद में घी का काम किया कि भारत की अधिकतम प्रसार वाली पत्रिका इण्डिया टुडे का अंग्रेजी संस्करण (अगस्त, २०१७) जिसमेंं चीन का एक व्यंग्य मानचित्र प्रकाशित किया गया । इसमें ताईवान के चीन से असंलग्न दिखलाया गया । इसकी चीनी कूटनैतिक वृत्त में तीव्र प्रतिक्रिया हुयी और प्रतिकार में चीनी समाचार माध्यमों ने चीन का जो मानचित्र प्रस्तुत किया उसमें एशिया के निकटतम पड़ोसी देश का मानचित्र भी चीन के नक्शे में समाहित कर लिया । लेकिन सम्बद्ध पक्ष में इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है ।
चीन के साथ भारत का इतिहास बहुत उथल–पुथल भरा रहा है और युद्ध तथा पराजय के कड़ुए स्वाद का भी उसे अनुभव है । इसलिए दोस्ती, व्यापार और उसके विस्तार की महत्वाकांक्षा को भी वह बारीक नजर से देखता है । इधर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मोदीजी के राज्यारोहण के बाद भारतीय विदेशनीति की सक्रियता बढ़ी है और किसी भी देश की तिरछी आँखों को देखना भी उसने छोड़ दिया है । मोदी के इस संस्करण में उन्होंने ईरान से चाबहार बन्दरगाह के समझौते के कारण एक ओर चीन भारत की ओर अपेक्षाकृत और संवेदनशील हुआ । दूसरी ओर अन्य देशों में किए गए निवेश से सम्बन्धित स्वयं के द्वारा दिए जाने वाले कर्ज के सम्बन्ध में दोहरी नीतियों के कारण लंका और बंगलादेश से उसके रिश्तों में खटास आए हैं । फिर मोदी की सक्रियता के कारण इन देशों से भारत के रिश्ते सुधरे हैं । यही बातें दोनों के सिकुड़ते रिश्तों की जमीन है ।
एशिया के छोटे–छोटे देशों को चीन निवेश के द्वारा आकर्षित करता है । लेकिन अब इन देशों को समझ में आने लगा है कि चीन का निवेश और उस पर ब्याज सम्बन्धी नीतियाँ स्थिर नहीं है और इसका प्रयोग वह अपने हिसाब से करता है । ज्ञातव्य है कि चीन ने पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ढाका यात्रा के दौरान सॉफ्ट लोन को कामर्शियल क्रेडिट में बदलने का प्रस्ताव बंगलादेश के सामने रखा । इससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि अब बंगला देश भी श्रीलंका की तरह कर्ज के दलदल में फँस सकता है । हलांकि बंगलादेश इसका विरोध कर रहा है । ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रोजेक्ट के जरिये चीन शेष एशियायी देशों के साथ–साथ एशिया और यूरोप से जुड़ेगा । इस प्रोजेक्ट के तहत लोन पेटर्न बदलने की चीन की पहल का बंगलादेश ने इसलिए विरोध किया क्योंकि इससे बंगलादेश को अधिक ब्याज का भुगतान करना होगा । सॉप्mट लोन को कॉमर्शियल क्रेडिट में बदलने का मतलब है कि बंगला देश को उस कर्ज राशि के लिए उच्चतम ब्याजदर का भुगतान करना होगा । राष्ट्रपति की विगत यात्रा के दौरान चीन के साथ बंगलादेश के करीब ढाई दर्जन प्रोजेक्ट के लिए २५ बिलियन डॉलर पर हस्ताक्षर किया गया था । अब चीनी अधिकारियों का दावा है कि बीजिंग ने दावा नहीं किया कि दोनों देशों के बीच हस्ताक्षर किए गए सभी प्रोजेक्ट दोनों सरकारों के स्तर पर लागू नहीं होंगे बंगलादेश अगर चाहे तो स्वतंत्र रूप से योजनाओं के लिए राशि मुहैया करा सकता है । इसे एक तरह से बंगला देश को घेरने का कदम माना जा सकता है ।
लंका की स्थिति यह है कि चीनी फंडिग वाले प्रोजेक्ट के कारण श्रीलंका कर्ज के भारी बोझ का सामना कर रहा है । श्रीलंका का कुल कर्ज ६० अरब डॉलर से अधिक का है और उसे इससे दस फिसदी से अधिक चीन को चुकाना है । चीन सरकार का मानना है कि उसका इन्वेस्टमेण्ट चार लाख करोड़ डॉलर का होगा । इसके अतिरिक्त ‘वन बेल्ट वन रोड’ के कारण पर्यावरण से जुड़े और सामाजिक जोखिम भी पैदा हो सकते हैं । गौरतलब है कि चीन श्रीलंका में आधारभूत संरचनाओं में निवेश कर रहा है । लेकिन अधिकांश स्थानीय नागरिकों को लग रहा है कि देश को चीन के हाथों बेचा जा रहा है । इसकी वजह है परियोजनाओं से जमीन का छिनना और भारी कर्ज की अदायगी का संकट । आमतौर पर एशियाई बन्दरगाह चहल–पहल भरे होते हैं । लेकिन श्रीलंका के हम्बांटोटा बन्दरगाह पर सन्नाटा पसरा होता है । जबकि इसे एक अरब डॉलर की लागत से चीन ने बनाया है । यह निवेश श्रीलंका को कर्ज के रूप में दिया गया था । लेकिन पोर्ट चल नहीं पा रहा है और कर्ज की अदायगी में समस्याएँ खड़ी हो गई हैं । इसलिए एक समझौता हुआ जिसमें चीनी कंपनी को शेयर देने की सहमति हुई । यह शेयर ८० प्रतिशत तक दिया जाना है । इस पर लंका का मानना है कि यह लाभकारी सौदा नहीं है ।
वस्तुतः हम्बाटोंटा इसलिए बनाया गया था ताकि एशिया के अहम कंटेनर टर्मिनलों में से एक कोलंबो पोर्ट का भार कम हो । मध्यपूर्व से होनेवाले तेल आयात के रूट में श्रीलंका अहम पड़ाव है । इसलिए चीन को यहाँ निवेश करने में रुचि है । चीन वैश्विक स्तर पर बड़ा व्यावसायिक देश है । अपने व्यापार के प्रवद्र्धन के लिए ही वह इस ‘वन बेल्ट वन रोड’ की योजना पर काम कर रहा है जिसे नया सिल्करूट भी कहा जाता है । इसके तहत चीन दुनिया के कई देशों में व्यापार बढ़ाने के लिए रेल, सड़क और समुद्री मार्ग बढ़ाएगा । लेकिन अभी तो सिर्फ मार्ग बनाने की बात हो रही है लेकिन इसके बाद इन मार्गों के अधिकतम उपयोग की समस्या आएगी क्योंकि एशिया के अन्य देशों में उतना औद्योगिक विकास नहीं हुआ जितना की अपेक्षा की जाती है । फिर सम्बद्ध देशों का औद्योगिक विकास भी चीन की प्राथमिकता बनेगी । इसके लिए इन देशों को अपनी कुर्बानियाँ देनी होंगी । जैसा कि श्रीलंका में हुआ । हम्बांटोंटा बन्दरगाह को क्रियाशील बनाने के लिए इसके आसपास १५ हजार एकड़ में वह एक औद्योगिक क्षेत्र बनाना चाहता है । लेकिन यहाँ रहनेवालों को अपनी जमीनें खोने का डर सता रहा है । इसलिए वे इसका ये विरोध कर रहे हैं । ये सारी बातें पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री महिन्द्रा राजपक्षे के कार्यकाल में हुई । लेकिन रनिल विक्रमसिंघे की सरकार ने २०१५ में ही चीन पर निर्भरता कम करने की बात कही और १.४ अरब डॉलर के विदेशी निवेश से कोलंबो के आसपास बनी कृत्रिम जमीन पर एक नया शहर बनाने की योजना पर रोक लगा दी ।
भारत के प्रति चीन की कटुता का एक कारण यह भी है कि उसने चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ का न तो समर्थन किया और न ही इसमें हस्ताक्षर किया । वस्तुतः चीन की इस योजना के जबाब में अमेरिका ने दक्षिण और दक्षिण–पूर्व एशिया में दो बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है जिसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी । मौजूदा ट्रंप–प्रशासन ने दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया को जोड़ने वाले ‘इंडो–पेसिफिक इकोनोमिक कॉरिडोर’ और न्यू सिल्क रूट परियोजना फिर से स्वीकार की है जिसकी घोषणा जुलाई २०११ में ही चेन्नई में हिलेरी क्लिंटन द्वारा की गई थी । इन दोनों परियोजनाओं का ब्योरा ट्रंप प्रशासन के वार्षिक बजट के दौरान पेश किया गया । इसमें न्यू सिल्करोड प्रोजेक्ट को पब्लिक–प्राइवेट होने का संकेत दिया गया जिसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी इस योजना में अफगानिस्तान और उसके पड़ोसियों के साथ–साथ दक्षिण एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया को जोड़नेवाले इंडो–पेसिफिक कॉरडिोर का निर्माण होगा । निश्चय ही चीन इस योजना को अपने उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक मान रहा है । भारत के प्रति उसकी कटुता इसलिए भी है कि उसका सूत्रधार वही है ।
इधर भारत के साथ पारम्परिक बैर और आतंकवाद जैसे मुद्दे पर पाकिस्तान विश्व समुदाय से कटने लगा है और उसकी निर्भरता चीन के प्रति दिनानुदिन बढ़ती ही जा रही है क्योंकि एक वही है जिसे वह अपना तारनहार समझ रहा है । चीन भी सच्चे दोस्त की तरह उसकी हर गलत–सही फैसलों का समर्थन करता जा रहा है । चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे ‘सीपीईसी’ के लोकार्पण के तीन साल बाद आज स्थिति यह बन रही है कि सीपीइसी के मास्टरप्लान का मसौदा जिसे चीन के नेशनल डेवलपमेंट एण्ड रिफार्म कमिशन तथा पाकिस्तान के योजना मंत्रालय ने तैयार किया है और जिसे पाकिस्तान का अखबार डॉन ने छापा है—और परियोजना के बारे में चीन के अब तक का सबसे उथला आकलन— बीजिंग की रेनिमन युनिवर्सिटी के लिए की गई आंतरिक समीक्षा है कि दोनों ही व्यापक पैमाने पर एक सुनियोजित आर्थिक कब्जे की बात रेखांकित करते हैं जिसमें सड़क से लेकर पावर प्लांट और यहाँ तक कि कृषि परियोजनाएँ भी शामिल हैं । आज स्थिति यह है कि चीन की कंपनियाँ राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर लाहौर की मेट्रो रेल तक पाकिस्तान के प्रमुख परिवहन तंत्रों का निर्माण और प्रबंधन कर रही है । चीन ने पाकिस्तान के स्टॉक एक्सेंज में हिस्सेदारी खरीद ली है । वह पाकिस्तान के पावर सेक्टर का निर्माण कर रहा है तथा एक के बाद एक कोयला प्लांट बना रहा है । और कई जानकारों का मानना है कि आखिरकार स्थिति यह आ जाएगी कि पाकिस्तान के नागरिकों को अपनी सरकार को कितना बिजली बिल चुकाना है, उसमें ही चीन की ही मर्जी चलेगी ।
इतना ही नहीं सीपीइसी पाकिस्तान की अर्थव्यवसथा में कब्जे को भविष्य में व्यापक रंग देगा । इसके मास्टर प्लान का मसौदा कहता है कि पाकिस्तान की हजारों एकड़ जमीन चीन के दे दी जाएगी । चीन के कपड़ा कारखानों को एकमुश्त पाकिस्तान भेज दिया जाएगा । मांस प्रसंस्करण प्लांट बैठाया जाएगा और मुक्त व्यापार क्षेत्र की स्थापना की जाएगी । चीन के दक्षिणी तट पर पर्यटन परियोजनाओं और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों का परिचालन किया जाएगा । यहाँ तक कि बलूचिस्तान में पर्यटन केन्द्रों के विकास की भी योजनाएँ हैं । पाकिस्तान के एक अग्रणी राजनैतिक अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल और पब्लिक एफेयर्स में प्रोफेसर एस. अकबर जैदी ने लिखा है कि ‘इस बात का डर है कि पाकिस्तान कहीं चीन का दूसरा प्रान्त न बन जाए या कहीं ‘जागीर’ न बन जाए ।’ चीनी विशेषज्ञों का भी मानना है पाकिस्तान में चीन का बहुत कुछ दाँव पर लगा हुआ है । लेकिन सियासी सिर–फुटौव्वल से लेकर आतंकवाद तक की जो स्थिति पाकिस्तान में है उसे देखते हुए चीन कामयाबी की ग्यारेण्टी तभी दे सकता है जब वह और ज्यादा नियंत्रण कर ले । (इंडिया टुडे) इसी नियंत्रण के लिए वह धीरे–धीरे पाकिस्तान की चीन पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है ।
डोकलाम का ताजा विवाद और चीन के सड़क–निर्माण का भारत द्वारा अवरोध एक तरह से दक्षिण एशिया में चीनी महत्वाकांक्षा के अश्वमेध का घोड़ा का लगाम भारत द्वारा पकड़ा जाना है । वस्तुतः एशिया का व्यावसायिक साम्राज्य को वह इस कदम से ध्वस्त होता देख रहा है । यही कारण है कि विगत दो महीनों के तनाव में वह बार–बार धमकियाँ देता है, खुली चुनौती देता है लेकिन भारत भी बिना किसी प्रतिक्रिया मोर्चा पर डटा है । अब समाधान एक ही दिखलाई दे रहा है कि या तो चीन वहाँ सड़क निर्माण की योजना से पीछे हटे अन्यथा युद्ध । लेकिन अगर इन दोनों क्षेत्रीय महाशक्तियों के बीच व्यापक पैमाने पर युद्ध की स्थिति आती है तो इस युद्ध के महाविनाशक परिणाम सामने आने की संभावना है और अपने प्रसार में सम्पूर्ण विश्व को ले लेने की संभावना भी दिखलाई देती है । निश्चित है कि वर्तमान समय में जो भू–राजनैतिक परिस्थिति है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि चीनी कूटनीति और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में उसके कदमों से विश्व की अनेक महाशक्तियाँ असंतुष्ट है । उत्तरी पड़ोसियों से भी उसके रिश्ते सहज नहीं हैं, चीनसागर में वह उलझा हुआ है, आतंकवाद के मुद्दे पर उसकी संवेदना पाकिस्तान से जुड़ी है, आन्तरिक स्तर पर लोकतंत्रवादियों से भी उसे संघर्ष करना पड़ रहा है । इसलिए यह युद्ध सबको अपना–अपना मौका साधने का अवसर देगा । इसके बाद चीन की आन्तरिक व्यवस्था में भी खलल पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । इसलिए नेपाल जैसे देश के लिए आवश्यक है कि वह सुविचारित रूप में अपने पक्ष को स्पष्ट करे और चीनी निवेश को भी प्रतिक्रियात्मक रूप में नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप में नेपाल में आमंत्रित करे । इस बात के लिए भी उसे सावधान रहने की जरूरत है कि उसकी स्थिति पाकिस्तान, लंका या बंगलादेश की तरह न हो । 

 

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