तनाव का आयुर्वेदिकयवस्थापन-रामदेव पंडित

तनाव शब्द को परिभाषित करना कठिन है । तनाव को वस्तु,यक्ति एवं परिस्थितियों के तहत परिभाषित किया जाता है । सामान्य रूप में इसे असहज रिक्तता के रूप में लिया जाता है । हम सब अपनी जीवन को कैसे बनाना चाहते हैं और जीवन कैसे बन रहा है, इस बीच में एक रिक्तता सदा रहती है । अथक प्रयास के बावजूद भी अगर ये रिक्तता स्थाई रूप से रही तो हमारे मन मस्तिष्क में असहजता, अस्थिरता, आन्दोलन, नैराश्यता, उन्माद, दबाब, इत्यादि उत्पन्न होते हैं, इसी को तनाव कहा जाता है ।
पृथ्वी में कोई तनाव नहीं चाहता है, फिर भी कोई तनाव से अलग नहीं रह सका है । तनाव मनुष्य की जीवन में ढेर सारी समस्यायें लाती हैं । इसके साथ ही मानव जीवन को गतिशील रखने के लिए यह जरूरी है । अतः तनाव उतना ही महत्वपूर्ण है और अर्थहीन भी उतना ही है । इसीलिए तनाव को मानव जीवन का आवश्यक कुरीति माना जाता है । तनाव से लड़ने की वजह इसे स्वाभाविक प्रवृत्ति के रूप में स्वीकार करने का विकल्प नहीं है । फलतः तनाव का उन्मूलन नहीं, इसकायवस्थापन के प्रति सचेत रूप से आगे बढ़ना बुद्धिमानी होगी ।
हम सब ऐसे समाज में रहते हैं– जहाँ हताश, जल्दबाजी, तनाव, दबाब की अधिकता है । सुरक्षा की चिन्ता, आर्थिक समस्या और आवेग, यह सब हमारे समाज में सामान्य मनोविज्ञान बनते जा रहे हैं । ये सभी मानव के स्वस्थ्य तथा दीर्घ जीवन को प्रत्यक्ष रूप से तनाव से प्रभावित करता है । मानव के शरीर एवं मन तनाव से प्रभावित होता है ।
तनाव कोयवस्थापन करने के लिए इसके कारक तत्वों को लक्षित करना महत्वपूर्ण होता है । चिकित्सकीय मन और शरीर को सामान्य अवस्था में लाता हैं । इलीलिए हर पल मन और शरीर को असन्तुलन बनाने वाला तत्वों के प्रति सजग रहना चाहिए ।
आयुर्वेद के मतानुसार तनाव के दो प्रमुख कारण माना जाता है । पहला है– दोष (वात, पित्त, कफ) का वैषम्य होना, दूसरा है– अपने आपको गहराई से नहीं जानना ।
अधिकतर तनाव कफ की वैषम्यता से होती है । कहने का आशय यह है कि जब वात ओैर पित्त का सार असन्तुलित होता है तो तनाव होता है । कभी–कभी तनाव पित का वैषम्यता के कारण भी होता है ।
तनाव का कारण ः
तनाव के कारणों को विस्तृत रूप सें निम्न २ भेदों में रखा जा सक्ता है ।
इसके अन्तर्गत असहज शारीरिक अवस्थाएं (दुखाई, ताप, शीत) और दबाबपूर्ण मानसिक वातावरण (कमजोर कार्य वातावरण तथा बिगड़ा हुआ सम्बन्ध), नियम, कानून, समय का चाप । इस अन्तर्गत जीवन की प्रमुख घट्नाएं (परिजन की मृत्यु, नौकरी छूट जाना, बढ़ोत्तरी न होना, अपमान, उपेक्षित होना) आदि ।
२. आन्तरिक कारण ः यह भौतिक व मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है । जीवन में उपभोगः क्याफिन का प्रयोग, पर्याप्त मात्रा में न सोना, तनावपूर्ण जीवन । नकरात्मक सोच ः निराशा, आत्म आलोचना, अत्यधिक मूल्यांकन । मानसिक उलझन ः असीमित चाहत, बिषय वस्तु कोयक्तिगत रूप से लेना, बढ़ा–चढ़ा कर लेना, सोच को दृढ़ रखना । तनावपूर्णयक्तित्व का चरित्रः पूर्णतावादी, अत्याधिक कर्मशील, सुखभोगी (वात, पित्त और कफ के तहत) ।
तनाव को हम अल्पकालीन और दीर्घकालीन रूप से परिभाषित कर सकते है ।
१. अल्पकालीन तनावः यह किसी भी आकस्मिक घटनाओं की प्रतिक्रिया के कारण से होता है । आम तौर पर इसे ‘फाइट या फ्लाइट रेस्पोन्स’ कहा जाता है । घटना कोई अर्धचेत अवस्था से और भ्रमित रूप से अनुभूत परिस्थिति हो सक्ती है । साधारण रूप से तनाव तत्व कोलाहल, भीड़भाड़, अकेलापन, भूख, प्यास, संक्रमण, स्मृति, काल्पनिक दबाब, आदि हैं । अधिकांश परिस्थितियों में जब अल्पकालीन तनाव हट जाता है, तब प्रतिक्रिया निष्क्रिय हो जाती है और तनाव का स्तर सामान्य अवस्था में आ जाता है । इसी स्थिति को ‘रिलैक्सेसन रेस्पोन्स’ कहा जाता है ।
२. दीर्घकालीन तनाव ः आज कीयस्त जीवन शैली में आने वाले सभी तनाव को दबा–दबा कर उसी में अभ्यस्त बनते जाने से यह दीर्घकालीन तनाव में रूपान्तरण हो जाता है । जैसे, अत्यधिक तनाव का काम, लम्बे समय तक सम्बन्ध में दरार, अकेलापन, स्थायी रूप से आर्थिक चिन्ता में डूबे रहना ।
तनाव का सामान्य प्रकटीकरण
पाचन प्रणाली ः तनाव होते समय सामान्यतः पेट में दर्द और पखाना लगता है । यह इसलिए होता है कि तनाव का हर्मन पेट में अम्ल के उत्पादन को धिमी करता है । वही हर्मन आन्द्रा के कोलोन को उत्तेजित करता है जिस से पखाना लगता है । दीर्घकालीन तनाव शरीर में लम्बे समय तक कोर्टीसोल की मात्रा को बढ़ा देती है । कोर्टीसोल भूख बढ़ाती है । फलतः वजन बढ़ता है और मोटापा आता है ।
इम्युन प्रणाली ः दीर्घकालिक तनाव इस प्रणाली को असंवेदनशील बनाता है जिससेयक्ति को संक्रमण और ठण्डा से प्रभावित करता है ।
स्नायु प्रणाली ः अगर ‘फाइट या फ्लाइट रेस्पोन्स’ बन्द न हो तो तनाव का हर्मन स्थायी रूप से निराशा, अकेलापन, असुरक्षित महसूस कराता है । कर्टीसोल का नकरात्मक प्रभाव से अति संवेदनशीलता के कारण चरम डिप्रेसन होती है । कोर्टीसोल का बाइप्रोडक्ट निद्राजनन् होता है जिससे सम्पूर्ण रूपसे डिप्रेसन का अनुभूति होती है ।
कार्डयोभास्कुलर प्रणाली ः कर्टीसोल की बढ़ोतरी से हृदय की गति को बढ़ाती है, जिससे रक्तचाप और लिपिड़ (कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लीस्राइड) बढ़ती है । ये सभी हृदय घात और मस्तिष्क घात का घातक कारण है ।
व्यवस्थापन
तनाव का आयुर्वेदिकयवस्थापन सहज, प्राकृतिक, प्रभावकारी और शरीर के दोष को सन्तुलन करके दीर्घकालीन रूप से किया जाता है । साथ ही दुबारा होने का न्यून मौका रहता है । आयुर्वेद में तनाव कायवस्थापन दो तरह से किया जाता है ।
१. जीवनशैलीयवस्थापन (दिनचर्या एवं ऋतुचर्या अभ्यास)
२. पञ्चकर्म का प्रयोग
प्रथमतःयक्ति के शरीर का प्रकृति (वता, पित्त, कफ) को पहचान करना जरूरी होता है । इसके वाद पञ्चकर्म का उपयुक्त विधि का प्रयोग करना चाहिए । तनाव के चिकित्सा के लिए मेध्य औषध और मेध्य रसायन का प्रयोग किया जाता है । ये दोनों मस्तिष्क के लिए ‘स्पेसिफक मॉलिकुलर न्यूट्रियन्स’ माना जाता है, जो दैनिक रूप से होने वाला तनाव को छिचोल कर मानसिक स्वास्थ्य को कायम रखता है । स्वभावतः विकृति को सन्तुलन करता है । तनावयवस्थापन के लिए प्रयुक्त आयुर्वेदीय द्रव्य है– अस्वगन्धा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वता, यष्ठीमधु, गुडुची, आम्लकी आदि । ५–१० ग्राम बाह्मीघृत गरम दूध के साथ और नश्य बहुत ही फलदायी होता है । दैनिक रूप से स्नान करना, प्रातः भ्रमण में जाना, पर्याप्त मात्रा में शुद्ध जल पीना भी प्रभावकारी होता है ।
योग सेयवस्थापन
क्रमिक रूप से बढ़ने वाला गहरा आराम जैसे शवासन, योगनिन्द्रा आदि का प्रयोग से तनाव से सहज मुक्ति मिलती है । ध्यान (माइन्डफुलनेस्, आनापान, विपश्यना, आदि) तनावयवस्थापन का एक अचुक उपाय है । ध्यान की प्रक्रिया से मन के विचारों का अन्त होता है, शान्ति की उपलब्धि होती है । मन स्थिर और स्वाभाविक अवस्था में आता है । फलतः तनाव से मुक्ति मिलती है ।

 

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