तनाव मुक्ति के उपाय ही गीता का परम सन्देश है : जयप्रकाश अग्रवाल

गीता सार : जयप्रकाश अग्रवाल , २७ अगस्त |

१) गीता विज्ञान सम्मत जीवन जीने की कला है । हर प्राणी का सर्वमान्य लक्ष्य सुख और आनन्द होता है पर जिसे वह सुख समझता है प्रायः वह क्षणिक और दुःख देने वाला होता है । जो शारीरिक एवं मानसिक पीडाऐं आज सब भोगते हैं उनका मुख्य कारण तनाव है । गीता तनाव मुक्ति का उपाय बताती है । यह परमानन्द की राह दिखाती है ।
२) तनाव के मुख्य कारण तुरन्त प्रतिक्रिया -instantaneous reaction) और असहनशीलता हैं । इसका एक कारण व्यक्तिवादी और स्वकेंद्रित होना है । न परिवार का अर्थ है न समाज का । राष्ट्र, विश्व और जीवमात्र तक की तो सोचता ही कौन है ? तनाव मुक्ति के उपाय ही गीता का परम सन्देश है ।

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३) मनुष्य के छः शत्रु माने गए हैं– काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर और अहंकार (कर्तापन) । कहने को ये छः हैं परन्तु मूल तो मोह ही है । प्राणी को सबसे बÈा मोह अपने आपसे होता है । अपने तथा अपने चारों ओर अवस्थित प्राणियों एवं पदार्थों से मोह ही छोटे से छोटे और बÈे से बÈे तनाव का मूल कारण है । मोह ही काम को जन्म देता है और अधूरा काम क्रोध का कारक होता है । मद और कर्तापन भी मोह के ही परिणाम होते हैं । जहाँ मैं तथा मेरा होते हैं वहीं मोह होता है । मोह तथा परवाह में अन्तर होता है । परवाह बुरी नहीं बल्कि जरूरी है । मोह को कम और कमजोर करना तनाव मुक्ति का प्रथम उपाय है ।
मोह चाहे धृतराष्ट्र जैसा हो या दुर्योधन जैसा या फिर अर्जुन जैसा, अलग अलग दीखने पर भी मोह का फल तो तनाव ही होता है । अर्जुन ने पहले भी कई युद्ध लडा । भीष्म को भी पराजित किया । कुरुक्षेत्र में भी अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो कर ही आया था पर इस बार मोह होने के कारण ही अर्जुन को अवसाद हुआ जो विषाद के रूप में प्रकट हुआ । यह अवसाद एक मनोरोग है और इसीलिए भगवान ने अर्जुन की मनोचिकित्सा की है । आधुनिक मनोचिकित्सक भी गीता की मनोचिकित्सा पद्धति का प्रयोग करते हैं ।
मोह असहनशीलता और सदा अपने को ठीक समझने के रूप में प्रकट होता है तथा वितृष्णा, पीडा और तनाव बनकर मनुष्य को दुःखी बना देता है ।
४) मोह असुरक्षा तथा असुरक्षा भय के रूप में दुःख देती है । अपने आप से सबसे अधिक मोह होने के कारण सबसे बडा भय मृत्युभय होता है । यहीं गीता बताती है कि मृत्यु क्या है–प्राणी का शरीर जिसका जन्म होता है, केवल उसी का नाश होता है जो विज्ञान के अनुसार भी एक स्वभाविक प्रक्रिया है । केवल उसीका नाश नहीं होता जिसका जन्म नहीं होता । अवश्यम्भावी का डर तो मिथ्या ही हुआ । मृत्यु को समझने के लिए जीवन को भी समझना पडेगा । शरीर से ऐसा क्या निकल जाता है कि वह जीवित न रह मृत हो जाता है । यह चेतनता जीवात्मा या आत्मा है । आत्मा के होने का सबसे बÈा प्रमाण इसके शरीर में होने या नहीं होने की दो अलग अलग स्थितियाँँ है । विज्ञान के सिद्धान्त अनुसार हर पदार्थ एवं उर्जा का एक स्रोत अवश्य होता है परन्तु एक ऐसे स्रोत की स्पष्ट मान्यता विज्ञान ने अब तक नहीं मानी है जिसका स्रोत नहीं हो या यूँ कहें कि मूल स्रोत स्वयं हो, पर यह अपरिहार्य है क्योंकि इस के बिना विज्ञान के स्रोत का सिद्धान्त ही अप्रमाणिक हो जाएगा । गीता में इस आदि स्रोत का नाम परमेश्वर है और यही सभी आत्माओं का स्रोत है । परमात्मा का अनादि होने का अर्थ ही अजन्मा होना है । विज्ञान के सिद्धान्त अनुसार जन्म के साथ जैसे मृत्यु अभिन्न है वैसे ही अजन्मा का अमर होना स्वतः सत्य हुआ । परमात्मा का अंश होने के कारण आत्मा का भी अजन्मा और अमर होना स्वतः सिद्ध हो गया । हर प्राणी में जब तक वह जीवित रहता है, आत्मा के रूप में परमात्मा स्थित रहते हैं । ईश्वर की तरह यह आत्मा भी निर्विकार और निराकार है, फिर भी यह देह परिवर्तन तो करती ही है ।
इस वैज्ञानिक पहलु को थोडा विस्तार में देखें तो विज्ञान के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है वह या तो पदार्थ है या फिर उर्जा । उर्जा का स्रोत होता है । यह स्रोत कोई पदार्थ या फिर उर्जा हो सकते हैं । जब किसी उर्जा या पदार्थ का रूपपरिवर्तन होता है तो केवल उर्जा या उर्जा और पदार्थ प्राप्त होते हैं । इस सिद्धान्त की मूल मान्यता है कि कुल जितना इनपुट (स्रोत) होता है उतना ही आउटपुट (प्रतिफल) होता है । कुल में न कुछ बÉता है, न कुछ घटता है और बिना इनपुट (स्रोत) के आउटपुट (प्रतिफल) नहीं हो सकता । विद्युत को प्रकाश या उष्मा में बदला जा सकता है या कोयला जलाकर उष्मा पैदा की जा सकती है परन्तु बिना स्रोत उर्जा का उत्पादन नहीं हो सकता चाहे वह सौर्य उर्जा ही क्यों न हो । दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उर्जा निराकार, गन्धहीन, रंगहीन होती है इसलिए इसे देखा नहीं जा सकता, सूँघा नहीं जा सकता । न हम विद्युत को देख सकते हैं न ही उष्मा को । पर उर्जा के अस्तित्व को अनुभव किया जा सकता है । हर कार्य का कारण उर्जा ही होती है । चाहे कोई पहिया घूमता हो या हम हाथ उठाते हों, उर्जा तो चाहिए ही । चाहे बल्ब जले या फिर हम हँसे या बोलें, सब उर्जा का खेल है । भौतिक शास्त्र का एक मूल सिद्धान्त है कि किसी भी कार्य को करने के लिए एक बल की आवश्यकता होती है और यह बल उर्जा से ही प्रप्त होता है ।
एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर नहीं है । मुर्गी पहले हुई या अण्डा । इसी प्रकार एक उर्जा के स्रोत और उस स्रोत के स्रोत को निर्धारित करने के क्रम को कहीं तो रोकना ही पÈेगा और यह मानना पÈेगा कि यह मूल उर्जा है और इसका स्रोत यह स्वयं है । इसी उर्जा के आदि स्रोत को एक वैज्ञानिक धरातल पर नाम दें तो परमात्मा कहेंगे । इसी परमात्मा से ही सारी उर्जाओं तथा सारे पदार्थों की उत्पत्ति हुई है । प्रकृति में जो भी जÈ या चेतन हैं, वे सभी इन्हीं पदार्थों तथा उर्जाओं से बने हैं । जैसे एक स्रोत से आती हुई बिजली विभिन्न बल्बों में जाकर (बँटकर) सबसे प्रकाश देती है वैसे ही परमात्मा आत्मा के रूप में बँटकर हर जीव में स्थित होकर उसे चेतन करता है । अगर इतना मान लें तो चेतन तत्व का होना जीवन तथा चेतन तत्व का छूटना ही मृत्यु है ।
शाश्वत ‘‘मैं’’ तो आत्मा है देह नहीं और जन्म तथा मरण तो शरीर का होता है क्योंकि चेतन तत्व तो अमर है, उर्जा की तरह । जब चेतन का नाश नहीं होता तो मृत्यु भय कैसा ? जैसे एक रस्सी को साँप समझ कर हम डरते हैं पर यह जानते ही कि यह रस्सी है, डर मिट जाता है वैसे ही जब हमें विश्वास हो जाएगा कि हम आत्मा हैं शरीर नहीं तो मृत्युभय मिट ही जाएगा । अगर मृत्यु का भय मिट जाए तो अन्य भय तो उसके सामने बहुत छोटे हैं ।
५) यह अमर आत्मा न जन्म पूर्व दिखती है और न ही मृत्यु पश्चात् । केवल जीवन काल में शरीर के रूप में दिखती है परन्तु रहती सदा है । यही गीता के साँख्य योग का मर्म है । परमात्मा तथा आत्मा के अमर और अजन्मा स्वरूप को समझने के बाद दूसरा मुख्य सन्देश समभाव का है । पदार्थ, प्राणी तथा परिस्थितियों में विपरीत दिखने पर भी समभाव रक्खे तो तनाव रहेगा ही नहीं क्योंकि समभाव तथा तनाव साथ साथ रह ही नहीं सकते । दिखावे तथा नकारात्मक प्रतिस्पर्धा को हमने अपना स्वभाव बना लिया है । भूmठी तथा अन्धी दौÈ तो अन्ततः तनाव ही दे सकती है ।
अब यों कहें कि सब जीवाें में एक ही परमात्मा हैं तो सारे जीवात्मा एक ही हुए, वाह्य भेद मात्र है । यही समझकर अगर व्यवहार किया जाए तो न कोई किसीके लिए बुरा सोचेगा न ही कोई किसी का बुरा करेगा । परिणाम होगा सौहाद्र्र तथा शान्ति । प्राणियों के अतिरिक्त पदार्थ और परिस्थितियाँ भी हमें अनुकूल तथा प्रतिकूल लगती हैं और तनाव का कारण बनती हैं । विभिन्न उपायों से अगर समभाव का अभ्यास किया जाए तो तनाव का कम होना एक स्वभाविक परिणाम होगा ।
यह एक साधारण उदाहरण है । हम चाहते हैं कि सब हमारी सोच के अनुसार चलें, चाहे हमसे बÈे हों या छोटे, मित्र हों या शत्रु, हमारी इच्छा तो सबको अपनी इच्छानुसार चलाकर ही पूरी होती है और ऐसा न होने पर हम तनावग्रस्त हो जाते हैं । अगर हम यदि एक पल के लिए यह सोचें कि दूसरे भी यही चाहते हैं कि हम उनकी इच्छानुसार चलें तथा समभाव से सोच अगर हम अहम भाव को छोÈ दूसरों को भी अपने जैसा समझ उनकी भावना का भी सम्मान करें तो तनाव घटेगा ही, वह तनाव जिसका कारण हम स्वयं हैं । यह हम सभी कर के देख सकते हैं ।
समभाव मन के उद्वेग को शान्त करता है, कम करता है और मन का उद्वेग ही तनाव है जो मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों के रूप में प्रकट होता है । गीता में इसी समभाव को समत्व योग नाम दिया गया है और इसे जन्म मृत्यु के बन्धन से छुटकारा देने वाला कहा गया है क्योंकि समभाव आत्मा ही परमात्मा है ।
६) मन तथा इन्द्रियाँ ही विषमता का पोषण करते हैं जोकि बुद्धि में होती है । इनको वश में करके ही समभाव प्राप्त हो सकता है । समभाव प्राप्त जितेन्द्रिय ही मोह का नाश कर तनाव रहित हो सकता है । अगर कोई बलपूर्वक इन्द्रियों को तो रोक ले पर मन से इन्द्रिय विषयों के बारे में ही सोचता रहे तो वह जितेन्द्रिय नहीं हो पाता और उसकी विषमता भी बनी रहती है ।
मन ही मनुष्य का सबसे बÈा मित्र और सबसे बÈा शत्रु होता है । मन जब वश में हो तब वह सबसे बÈा मित्र और जब वश में न हो तब सबसे बÈा शत्रु होता है । इसलिए समता को पाने के लिए जितेन्द्रिय होना आवश्यक है और बुद्धि ही मन को वश में कर सकती है । इसके लिए बुद्धि का सात्विक होना आवश्यक है ।
७) मनुष्य को कुछ करने से उतना तनाव नहीं होता जितना कर्म के फल के कारण होता है, वह फल जिसके आने से पहले ही उसकी चिन्ता कर या आने के बाद उसे देख कर हम तनावग्रस्त हो जाते हैं । गीता की विशेषता हैै कि यह पलायनवाद का सन्देश नहीं देती अपितु अपने कर्म को धर्म समझ कर करने की सीख देती है क्योंकि यह शरीर कर्म करने के लिए ही बना है और कर्म करने पर मनुष्य का अधिकार है । समस्या कर्म का फल है क्योंकि इस पर कर्म करने वाले का कोई नियन्त्रण नहीं होता । हमारी चिन्ता का कारण भी यही है कि हम जानते हैं कि परिणाम हमारे वश में नहीं है । इसी लिए गीता ने निष्काम कर्म को योग कहा है । योग का अर्थ होता है जुÈना या फिर मिलन । यहाँ मिलन परमात्मा से आत्मा का मिलन है । यह तभी सम्भव है जब हम कर्म फल का चिन्तन छोÈ दें । कर्मफल तो होना ही है, इसलिए उसे क्या छोÈना, छोÈना है तो उसके विचार को । कर्मफल को यथारूप में स्वीकार कर लेने के अभ्यास से जीवन में तनाव कम होता जाएगा । संन्यास भी पलायन नहीं है परन्तु सच्चा संन्यासी होना बहुत कठिन है और इसीलिये कर्मयोगी होना श्रेष्ठ है । कर्म करते हुए अगर इन्द्रियों में आसक्ति न हो तो यह संन्यास ही है ।
स्वभावजन्य कर्म नहीं चाहकर भी करना पÈता है । अर्जुन को यह कहना कि उसके न चाहने पर भी अपने स्वभाव के कारण उसे युद्ध करना ही पÈेगा, एक ऐसा सत्य है जिसे हम सभी बार बार अनुभव करते हैं । कर्म उचित होना चाहिए अर्थात् करने वाले की प्रकृति के अनुरूप तथा स्वधर्मसम्मत होना चाहिए । विकर्म यानि बुरे कर्म तथा अकरणीय कर्म करने के योग्य नहीं होते । अकर्म अर्थात् कर्म न करने को गीता में प्रतिपादित ही नहीं किया गया है । सार में निष्काम धर्मसम्मत कर्म ही मनुष्य का स्वधर्म है । स्वभाविक कर्म जिसे गीता में स्वधर्म का नाम दिया है, वह जन्म के साथ ही अस्तित्व में आ जाता है परन्तु समय, काल तथा परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ स्वधर्म में भी परिवर्तन हो जाता है । यों समभेंm कि पुत्र का एक स्वधर्म होता है और पिता बनने के बाद पिता के रूप में उसका एक दूसरा स्वधर्म हो जाता है । एक ही समय में हर एक मनुष्य के अनेक स्वधर्म होते हैं । देश के लिए एक, परिवार के लिए एक, मित्र के लिए एक, किसी भी दुःखी के लिए एक और इसी प्रकार अन्य अनेक स्वधर्म होते हैं । स्वधर्म भी पूर्व निर्धारित होता है क्योंकि स्वधर्म निश्चित करने का कोई भी साधन हमारे पास नहीं होता । या यूँ कहें कि न कर्म पर ही अधिकार है और न ही कर्मफल पर, अधिकार है तो केवल कर्म के करने पर । इसलिए इन सारे स्वधर्म का पालन ही योग का साधन है ।
८) यह संसार पुरुष तथा प्रकृति के संयोग से बना है । प्रकृति परमात्मा का दृश्य रूप है । जिसे भी ईश्वर के दर्शन करने हों, वह प्रकृति में ही ब्रह्म दर्शन कर सकता है । प्रकृति ही हमारा लालन पालन करती है, बिना प्राकृतिक सम्पदा या सहयोग के हम एक पल भी नहीं जी सकते । बिना वायु या बिना सूर्य के क्या जीवन की कल्पना भी की जा सकती है ? जल, हवा, सूर्य, मेघ, ऋतुऐं, पहाÈ, नदी, सागर, खनिज, वनस्पति आदि से ही इस सृष्टि का सृजन तथा भरण पोषण हो रहा है । परन्तु यह प्रकृति त्रिगुणी है । यह सात्विक, राजसी तथा तामसी स्वभाव की है और प्रकृति के त्रिगुणी होने के कारण जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो त्रिगुणी न हो सिवाय परब्रह्म के । पुरुष तथा प्रकृति में अंतर इतना ही है कि पुरुष गुणातीत है और प्रकृति त्रिगुणी ।
ये त्रिगुण ही कर्म, स्वभाव, मोहादि शत्रु सहित को शक्ति देते हैं । आत्मा भी परमात्मा का अंश होने के कारण गुणातीत है परन्तु प्रकृति प्रदत्त त्रिगुणों के कारण देह से बँध कर त्रिगुणमय हो जाती है या यों कहें कि स्वभाववश आत्मा भी त्रिगुण में रंग जाती है ।
तामसी स्वभाव प्राणी को नीचे गिराता है । तामसी वृत्ति विशेष कर मनुष्य के आहार, विहार और विचार को राक्षसी बना कर उसे प्रमाद तथा पीÈा देती है जिसमें दुःख, असन्तुष्टि और अशान्ति ही होती है ।
राजसी वृत्ति भी लोभ तथा फल से बाँध कर मनुष्य को कोल्हु के बैल की तरह मोह के चक्कर कटवाती रहती है और फल तो अशान्ति तथा तनाव ही देता है । सात्विक वृत्ति में अशान्ति तथा तनाव कम तो होते हैं परन्तु सर्वथा समाप्त नहीं होते क्योंकि यह भी सुख से बाँधती है । लक्ष्य शान्ति नहीं परम शान्ति है और इसके लिए तो त्रिगुणातीत अर्थात् आत्मा के सारे रंग उतार कर उसे फिर से परमात्मा ही बनाना पÈता है । दूसरे शब्दों में सोई आत्मा को जगा कर आत्मा का परमात्मा से योग कराना होता है परन्तु यह एक झटके में सम्भव नहीं । शनैः शनैः अभ्यास से ही सम्भव हो पाता है । अगर वृत्ति तामसी है तो उसे कम से कम राजसी बनाने का अभ्यास और फिर सात्विक बनाने का प्रयास करना पÈता है । थोÈा सुधार भी जीवन को बदला बदला बना देता है ।
वैसे तो त्रिगुण बिना कुछ भी नहीं होता परन्तु जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं त्रिगुणमय आहार, विहार और विचार । इन तीनों का प्रभाव एक दूसरे पर पÈता है, जैसा आहार वैसे विचार, जैसे विचार वैसा विहार और जैसा विहार वैसा आहार । इसलिए इनकी चर्चा करना सांदर्भिक है क्योंकि किसी एक में भी सुधार होने से अन्य दोनों में भी सुधार अवश्यम्भावी है ।
९) चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से सात्विक आहार वह आहार है जो उस व्यक्ति के लिए युक्त हो । जैसे मधुमेह के रोगी के लिए तो मिठाई को तामस ही कहा जाएगा और रक्तचाप वाले के लिए नमक को । वैसे ही एक नीरोगी के लिए वह भोजन सात्विक है जिसके लिए वह व्यक्ति बना है । यों समभेंm कि डीजल गाÈी का इन्धन डीजल और पेट्रोल गाÈी का पेट्रोल होता है क्योंकि उनका निर्माण उसी प्रकार हुआ है । डीजल गाÈी में पेट्रोल और पेट्रोल गाÈी में डीजल डालने का दुष्परिणाम हमें मालुम ही है ।
सारे जीवों के भोजन के आधार पर अगर समूह बनायें तो पहला आधार शाकाहारी और मांसाहारी होगा । निश्चित रूप से हर जीव का निर्माण शाकाहारी या मांसाहारी के रूप में हुआ है । अब हम विवेचन करें कि मनुष्य का निर्माण शाकाहारी के रूप में हुआ या मांसाहारी के रूप में । सबसे पहले इस तथ्य पर ध्यान रक्खें कि शाकाहारी मांसाहार नहीं करते और मांसाहारी शाकाहार नहीं करते, यही प्रकृति का नियम है । गाय, घोÈा, बन्दर, कबुतर आदि मांसाहार नहीं करते और वैसे ही बाघ, भेÈिया, चील आदि शाकाहार नहीं करते ठीक उसी तरह जैसे डीजल गाÈी पेट्रोल से नहीं चलती । अब अगर मनुष्य की बात करें तो निम्न तथ्य हैंः
क) डारविन के विकास के मान्य सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य का विकास बन्दर प्रजाति से हुआ है और सभी जानते हैं कि बन्दर प्रजाति पूर्णतया शाकाहारी है और इस अवधारणा के अनुसार मूलतः मनुष्य भी शाकाहारी ही हुआ ।
ख) दूसरा वैज्ञानिक तथ्य यह है कि शाकाहारियों में छोटी अाँत की लम्बाई मांसाहारियों से बहुत अधिक होती है । मनुष्य की छोटी अाँत भी बहुत लम्बी होती है । यह भी सिद्ध करता है कि मनुष्य को शाकाहारी भोजन के लिए बनाया गया है ।
ग) बिल्ली, कुत्ता अपनी जीभ का प्रयोग कर पानी पीते हैं जबकि बन्दर और गाय पानी को मँुह में भरते हैं जोकि मनुष्य के पानी पीने के तरीके से मिलता है । वैसे ही अगर जीव के शरीर के कुछ अंगों की बनावट को देखें, जैसे दाँत, पन्जे, मँुह आदि तो शाकाहारी और मांसाहारी जीवों का फर्क स्पष्ट दिखता है और ये भी मनुष्य को मूलतः शाकाहारी सिद्ध करते हैं ।
घ) एक बात हमें और ध्यान में रखनी चाहिए कि आजकल विश्व के अधिकांश चोटी के चिकित्सक मनुष्य के लिए शाकाहार को मांसाहार को अच्छा बतला रहे हैं और पश्चिम में शाकाहार लोकप्रिय हो रहा है ।
मनुष्य ने मांसाहारी जीवों को देख कर मांसाहार शुरु किया होगा और जंगल में लगी आग में पके हुए पशुओं को देख कर पकाना सीखा होगा । पकने के बाद ही कुत्ता या बिल्ली रोटी या चावल खाते हैं, कच्चा चावल या गेहूँ नहीं खाते और वे भी पालतु मात्र । जंगल में तो उन्हें अपना स्वभाविक भोजन ही चाहिए । स्वभाविक भोजन के कारण ही पशु पक्षी बिना डाक्टर या दवाई के मनुष्य से बहुत कम रोगों के साथ जीते हैं । इस में कोई संशय नहीं है कि मनुष्य के रोगों का मूल कारण अस्वाभाविक आहार ही है । स्वाभाविक आहार ही सात्विक आहार है और यही तन तथा मन को स्वस्थ एवं शान्त रख सकता है ।
इसके अतिरिक्त अत्यधिक तैलीय, चटपटे, बासी, डिब्बा बंद भोजन आदि भी अखाद्य होते हैं । ऐसा आज के चिकित्सक भी कहते हैं । ये अखाद्य ही राजसी और तामसी हैं जिन्हें छोÈना ही श्रेयस्कर है । साथ ही तम्बाकु, शराब आदि के बारे में तो सभी जानते हैं । दवाइयाँ भी शरीर को लाभ कम पहँुचाती, नुक्सान अधिक । ये शरीर की अपनी रोग निरोधी शक्ति को कम करती हैं । ये अखाद्य पदार्थ तन और मन को ही नहीं बुद्धि को भी बिगाÈ देते हैं ।
इसके आलावा भोजन की मात्रा, भूख लगने पर ही खाना, निश्चित समय पर खाना, बैैठ कर या खÈे खÈे खाना आदि विषयों पर भी चिकित्साशास्त्र में काफी अनुसन्धान हो चुका है । सही मात्रा, सही समय पर, सही तरीके से खाना भी युक्त आहार का भाग हैं । अगर सात्विक भोजन भी ठूँस ठूँस कर खाया जाए तो वह असात्विक हो जाता है ।
१०) विहार का भी जीवनशैली से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है । जिस तरह की जीवन शैली है वैसा ही विहार हम करते हैं । उठना बैठना, सोना, मनोरंजन से लेकर जीवन की अधिकांश गतिविधियाँ विहार ही हैं । विहार व्यवहार का ही रूप है । विहार भी सात्विक न हो तो केवल आहार के सात्विक होने सारी समस्याऐं नहीं मिटतीं । विहार निर्भर करता है उस वातावरण पर जिसमें हम रहते हैं । किन लोगों के बीच, किन पदार्थों तथा परिस्थितियों के साथ हम रहते हैं, वे ही अपने प्रभाव से अपने अनुसार व्यवहार हम से करवाते हैं । अश्रद्धापूर्ण वातावरण, अशुद्ध मानसिकता तो तामसी गुण का ही पोषण करेगी । दुनिया के सभी महान विचारकों ने जीवनशैली को आदर्श बनाने के लिए सात्विक विहार के महत्व के बारे में बताया है । सात्विक वातावरण में रहना ही सत्संग है ।
११) आहार विहार के साथ विचार का भी सात्विक होना उतना ही महत्वपूर्ण है । संस्कारों से लेकर शिक्षा दीक्षा का विचारों पर असर पÈता है । माता पिता तथा शिक्षकों की भूमिका के साथ कैसी पुस्तकें पÉते हैं, कैसे विचार सुनते हैं और किनके साथ कैसे वातावरण में रहते हैं, इन सबका बुद्धि तथा विचार पर सीधा प्रभाव पÈता है । जैसे विचार वैसी वृत्ति । साथ ही आहार विहार का विचारों पर तथा विचारों का आहार या विहार पर असर पÈता ही है । ये तीनों ही एक दूसरे से प्रभावित होते हैं । दुनिया बहुत छोटी हो गई है और सूचना प्रद्यौगिकी सूचना आदान प्रदान के द्वारा हर एक के विचारों को हर पल प्रभावित कर रही है । मनुष्य के स्वभाव के कारण वह नकारात्मक विचारों से जल्दी आकर्षित होता है जो अन्ततः जीवन में दुःख ही भरते हें । इलेक्ट्रौनिक मीडिया एक वरदान भी है, एक अभिशाप भी । अनावश्यक और अत्यधिक सूचना लाभ कम देती हैं और हानि अधिक । उदाहरण के रूप में दो देशों के बीच कोई खेल प्रतियोगिता हो जैसे इंग्लैंड और जर्मनी । हमारा न तो उन देशों से विशेष लगाव है न उन टीमों से । उस खेल के बारे में जानते ही हम उसके परिणाम के प्रति चिन्तित हो जाते हैं, किसी एक के साथ अपने को जोÈ लेते हैं । यह तनाव अनावश्यक सूचना का फल ही है और वृथा है क्योंकि उस फल में हमारी कोई भूमिका ही नहीं । अगर हम अपने तनावों को समभेंm तो अधिकतर ऐसे ही व्यर्थ के तनाव से ही अपने को घिरा पायेंगे । विचारों को तामसिक होने से बचाना है तो वाह्य से सम्पर्क कम । अपने आप के साथ अधिक समय देना चाहिए ।
१२) आहार, विहार तथा विचार से ही हमारा तथा हमारे समक्ष जो होता है, उन दोनों का व्यवहार निर्देशित होता है । यही व्यवहार तनाव बÉाता है या घटाता है । जब व्यवहार होना ही बन्द हो जाए या यूँ कहें कि हर व्यवहार ईश्वर के लिए किया जाए तो करने वाला गुणातीत हो जाता है और गुणातीत ईश्वर से मिल जाता है । यही परमानन्द की स्थिति होती है ।
१३) इन तीनों के अतिरिक्त जीवन शैली को प्रभावित करने में संस्कारों की भूमिका होती है । संस्कार हमारे पूर्व जन्म तथा इस जन्म के कर्मानुसार बनते हैं । इन्हें हमारे चारों ओर जो वातावरण है वह भी प्रभावित करता है ।
१४) गीता का सूत्र समर्पण है । जब बिना किसी आशा या उद्देश्य के अपने सब कर्म ईश्वर को पूर्ण आस्था के साथ समर्पित कर दें तभी समर्पण पूर्ण होता है और पूर्ण समर्पण के बाद ही चिन्ता के लिए स्थान नहीं रहता । संशय तथा अविश्वास समर्पण की पूर्णता के सबसे बÈे बाधक हैं । पूर्ण समर्पण समभाव देकर इन्द्रियों की आसक्ति को मिटाता है । एक बच्चा अपने को अपनी माता के हाथों में पूर्ण सुरक्षित महसूस करता है और माँ भी उसका पूरा ध्यान रखती है । वैसे ही भगवान के शरणापन्न हो जाने पर सर्वशक्तिमान करुणासागर अगर हमारी रक्षा करें तो इसमें आश्चर्य की कौनसी बात होगी ?
जीवन में आत्म विश्वास की भूमिका विज्ञान मानता है । बिना आत्म विश्वास के कोई भी उपलब्धि नहीं होती । आत्म विश्वास अगर आत्मा विश्वास और फिर परमात्मा विश्वास बन जाए तो हमारी शक्ति स्वभाविक रूप से अपार हो जाएगी और उसके बाद कुछ भी असम्भव नहीं रह जाएगा । साथ ही तनाव का एक बÈा कारण, असफलता का भय, नष्ट हो जाएगा । शरणापन्न के भाव का फल भगवद्कृपा के रूप में होता है । भगवद्कृपा से होने वाले चमत्कार को चमत्कार क्या कहें । भगवद्कृपा ही अपने आप में सबसे बÈा चमत्कार है क्योंकि यह कृपा भी भगवान की कृपा से ही मिलती है । भाव होने से बिना प्रयास ही मिल जाती है । भाव होना चाहिए, सत् का अभाव नहीं है, सत् ही ईश्वर है और ईश्वर की उपस्थिति सर्वस्थान एवं सर्वकालिक है । भक्ति अर्थात् इस सत् का सतत स्मरण इस कृपा को पाने का भाव भी है और प्रयास भी । इसलिए नाम जप ही सबसे बÈी औषधि है, सबसे बÈा यज्ञ है । भगवान का सन्देश है कि सब धर्मों को छोÈ कर मेरी शरण में आजाओ, योग तथा क्षेम दोनों की रक्षा मैं सम्भाल लुंगा । भगवान का यह आश्वासन ही तनाव मुक्ति का, परमानन्द प्राप्ति का अमोघ उपाय है । इसमें शंका या संशय के लिए कोई स्थान नहीं । यहाँ सब धर्म का अर्थ हम अपने सारे स्वधर्मों से भी ले सकते हैं और उनको छोÈने का अर्थ अपने स्वधर्म को ब्रह्म के निमित्त कर देना है ।

१५) गीता में एक और बÈे सत्य का उल्लेख हुआ है कि जब जब अधर्म की वृद्धि होती है तब तब हर युग में श्रीहरि अवतार लेते हैं, अधर्म तथा अधर्मियों का नाश करते हैं । पूरी मानवता का इतिहास इस सच्चाई का गवाह है । जब जब भी विश्व में कहीं भी सामाजिक या राजनैतिक या धार्मिक विकराल समस्याऐं जनसाधारण के वश में नहीं रहीं तब तब समाधान हेतु एक महात्मा का धरा पर जन्म हुआ है और यही अवतार है । जब अवतार होते ही हैं तो हम अनावश्यक तनाव क्यों लेते हैं ?

१६) गीता में कहीं भगवान ने स्वयं को कर्ता कहा है और कहीं कहा है कि भगवान कर्ता नहीं बल्कि प्रकृति (स्वभाव) कर्ता है । दिखने में विरोधाभास होते हुए भी यह इंगित करता है कि दो होते हुए भी पुरुष और प्रकृति एक हैं । फलदाता भी प्रकृति ही है और यही कारण है एक स्वभावजन्य कर्म के अलग अलग फल होनेका ।

१७) अन्त में अठारहवें अध्याय में एक ही श्लोक में पूरी गीता का सार है कि सब धर्मों को छोÈकर अनन्य श्रीकृष्णाश्रय से जीवन के सब तनाव मिट जाऐंगे, परम शान्ति अर्थात् मुक्ति निश्चित मिल जाएगी । कितना सरल और अचूक उपाय है । जब भी हम मान लेते हैं कि इसका फल अपने बस में नहीं है, जो भी होगा हरि इच्छा तो हमें तत्क्षण तनाव से मुक्ति मिल जाती है और सब तनावों से पूर्ण मुक्ति ही परम मुक्ति है ।

१८) पÉ कर ऐसा लगता है कि उपरोक्त बातों में से अधिकाँश हम जानते हैं परन्तु फिर भी तनाव तो जीवन का भाग ही है । गीता का मूल मंत्र है कि केवल जानने से कुछ नहीं होता, ज्ञान को जीवन में उतारना आवश्यक है, आत्मसात् करना आवश्यक है । थोÈे प्रयास और थोÈे विश्वास से मन चाहा फल तो मिलना ही है । परम में पूर्ण विश्वास से परम की प्राप्ति ही गीता का सार है । अपने में आत्म विश्वास और परमात्मा में आस्था, अंग्रेजी में क्भाि अयलाष्मभलअभ और ँबष्तज ष्ल एचयखष्मभलअभ, मिलकर जीवन को पूर्ण सार्थकता देते हैं, यही गीता का संदेश सूत्र है ।

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