तब तो गोर्खा साम्राज्य के विरुद्ध लड़ना ही होगा : गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर,कचोर्वा-१, बारा , मार्च ८, २०१६ 
गोर्खा साम्राज्य ने अपनी राजधानी को नेपाल में तबादला कर अपने साम्राज्य को नेपाल बताना शुरू किया । पृथ्वीनारायण के नेतृत्व में बढ़ा गोर्खा राज्य विस्तार अभियान ने अगस्त २१, १७६२ को मध्यदेशीय रियासत मकवानपुर को जीता । उस दौरान दुनिया को अपना एकक्षत्र साम्राज्य बनानेवाली बेलायती हुकूमत भारतवर्ष पर ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से राज कर रही थी । वे फिरंगी भी भारतीय उपमहाद्वीप के रियासतों को नेश्तानामूद करता हुआ उत्तर की ओर बढ़ रहे थे । स्वाभाविक था, दोनों साम्राज्यों के बीच टकराव हुआ सन १८१४ में । गोर्खालियों के छक्के छूट गये । फिर इनके बीच दोस्ती का प्रयास हुआ और १८१५ में सुगौली में एक संधि का मजबून बनाया गया जिसे गोर्खाली फिरंगियों की ओर से ४ मार्च १८१६ को स्वीकर कर बेलायती फिरंगियों को सौंप दिया गया । इससे किसने कितना पाया, किसने कितना खोया; जोड़-घटाव या खुशी-गम का माहौल होना अस्वाभाविक नहीं है । किंतु इस संधि को मध्यदेश को दो अलग अलग सार्वभौमिकता में स्थायी तौर पर बाँटने की जिम्मेदारी तो लेनी ही होगी । भारतीय सार्वभौमिकता में तो मध्यदेश का कायाकल्प हो गया । सभी के सभी भारतीय हो गये । किंतु गोर्खा साम्राज्य अधिनस्थ मध्यदेश का अपने सहोदरों से बिछड़ने का जो घाव इस संधि ने दिया, कभी भरने का नाम ही नहीं लेता । मधेश और मधेशी के नाम पर अब तक तथाकथित संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र, नेपाल में भी यह राष्ट्र अपनी परतंत्रता को कोस रहा है ।
संयोग है इस साल का ४ मार्च दो शदी के बाद आया । सुगौली संधि को लेकर गोर्खा साम्राज्य और गणतंत्र भारत मे चर्चाएँ-परिचर्चाएँ भी खूब हुई । सुगोली में ही इस संधि का दूसरा शतवार्षिकी समारोह भव्य रूप में मनाया गया । कुछ देर से ही सही, मेरे भारतीय मध्यदेशी मित्र विजय शंकर चतुर्वेदी, अमर आनंद और अनुरंजन झा के जरिए मुझे भी इस समारोह से जुड़ने का अवसर मुहैया कराया गया । इस समारोह का मकसद नेपाल-भारत संबंध सुदृढीकरण और सुगौली का प्रवर्द्धन सभी सहभागियों के समझ में आ रहा था । अपनी बारी में मैंने भी इस संधि के जरिए अपने परिजनों से सदा-सर्वदा के लिए बिछड़ने की पीड़ा को तो रखा ही, इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि इस संधि ने नेपाल को कभी गुलाम न होने का सुअवसर मुहैया कराया । यह इसलिए कि नेपाल अपने आप में गोर्खा साम्राज्य का उपनिवेश है क्योंकि इस देश के कई औपचारिक दस्तावेजों में नेपाल, पहाड़ और मधेश को गोर्खा राज्य का हिस्सा बताया गया है । अतः मधेश गोर्खा साम्राज्य का तो उपनिवेश है ही, अब नेपाल का भी उपनिवेश होता दिखता है । यह इसलिए कि संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र, नेपाल में भी मधेशी राष्ट्रीयताकी धज्जियाँ उड़ाती हुई इसे छ प्रदेशों में बाँट दिया गया है । इन तथ्यों को रखने के बाद भारतीय मित्रों में खासकर भारत के पूर्व प्रहरी महानिर्देशक तथा महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति विभूति नारायण रॉय ने स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की अवधारणा पाश्चात्य है जो राज्य-राष्ट्र (State of Nations) की हमारी धरातल से कतई मेल नहीं खाती ।nidhi3
उस कार्यक्रम से लौटकर जब पुनः मधेश आया तो नेपाल के कुछ अखबारों में भी सुगौली संधि के बारे में काफी कुछ लिखा-छपा पाया । यह अलग बात है कि वे सभी के सभी उस संधि में नेपाल की शर्मनाक हार होने के तर्क पेश किए हैं । भला मध्यदेश के चिरने की पीड़ा का भला वे उल्लेख कैसे करते ? हाँ, इस बार ४ मार्च हमारे लिए एक और मायने में काफी महत्त्वपूर्ण रहा । वह यह कि इस दिन इस साल की महाशिवरात्रि की करीब पूर्व संध्या में गोर्खा साम्राज्य की ‘नेपाली’ सेना के पृतनापतियों की एक बैठक हुई थी जो बिल्कुल मधेश पर केंद्रित रही । इतना ही नहीं, उस बैठक का निष्कर्ष निकाला गया कि अगर मधेशियों की मांग पूरी की जाती है तो नेपाल में जातीय द्वन्द्व निश्चित है ।
पृतनापतियों के विश्लेषण के मुताबिक अगर मधेश प्रदेश बनता है तो सुदुर पश्चिम में खस-गोर्खाली क्षत्रिय और थारुओं के बीच, मध्य पश्चिम में खस-गोर्खाली क्षत्रिय और मगरों के बीच और पूर्व में लिंबुओं और मधेशियों के बीच द्वन्द्व होगा, अतः अब सीमांकन का पुनरावलोकन करने की धृष्टता न की जाए ।
इतना ही नहीं इस गोर्खाली सेना की बैठक ने अदालत के निर्णय को भी चुनौती दी है । स्वतंत्र मधेश गठबंधन के नेता डॉ. सि. के. राउत पर सरकार द्वारा दायर ‘राज्य विप्लव’ का मुकद्दमा अदालत ने उचित प्रमाण नहीं पहुँचने के कारण खारिज कर दिया है । अदालत के इस फैसले को सेना की इस बैठक ने गंभीर गलती बताया है । सिर्फ इतना ही नहीं, गोर्खाली सेना का यह कहना है कि अगर निहत्थे गाँधी को बेलायती हुकूमत का गिरफ्तार करना और इसरायली हुकूमत का याशर आराफात को हिरासत में लेना वाजिब था तो नेपाल में सि. के. राउत जैसे लोगों को क्यों उन्मुक्ति दी जाती है ? इसके साथ साथ सेना की ओर से यह भी खुलासा किया गया है कि अगर देश विखंडन की गतिविधियाँ हुईं तो सेना स्वतः परिचालित होगी ।
गोर्खा साम्राज्य को संवैधानिक रूप से अभी धर्म निरपेक्ष संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र, नेपाल घोषित कर दिया गया है किंतु सेना दिवस अब भी हिंदू पर्व महाशिवरात्रि ही कायम है । यह बैठक इसी की पूर्व संध्या में आयोजित की गई थी । अतः धर्म निरपेक्ष राज्य की सेना धर्म सापेक्ष क्यों और कब तक रहेगी ? इस प्रश्न का हल भी अभी ढूँढना बाँकी है । किंतु इससे भी अहम् सवाल यह है कि सेना की यह बैठक; गोर्खा साम्राज्य ही सही, राज्य की कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका; तीनों को एक साथ चुनौती देती है । जहाँ तक देश विखंडन का सवाल है, तो आम मधेशी यह कतई नहीं चाहते हैं । लेकिन ये खस-गोर्खाली नश्लवादी जरूर चाहते हैं । इसलिए कि मधेशी लोग तो समग्र मधेश को एक मधेश प्रदेश बनाना चाहते हैं और इसके स्थायित्व के लिए राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का संवैधानिक अधिकार चाहते हैं किंतु खस-गोर्खाली को अखंड सुदूर पश्चिम, अखंड मध्य पश्चिम ही नहीं, अखंड चितवन भी चाहिए । चो भला आप ही बतायें अखंड नेपाल को तोड़ना कौन चाहता है ? क्या यह कथित नेपाली सेना औकात रखती है इन विखंडनकारियों पर कोई सिकंजा कसने की ? जी नहीं, यही इनकी सार्वभौमिकता, अखंडता और स्वाधीनता हैं जहाँ मधेश और मधेशी नहीं अँटते ।
निश्चित रूप में डॉ. सि. के. राउत के विचारों से सहमत होना जरुरी नहीं है, किंतु सि. के. राउत के लिए यह सेना स्वयं खस-गोर्खाली राष्ट्रीयता के उपनिवशकों का औजार के रूप में अगर अपने को केवल खड़ा ही नहीं करती है, वरन् अपने को बेलायती और इसरायली हुकूमत की वैधानिकता का अंग समझती है जहाँ मधेश लगायत कोई भी उत्पीड़ित राष्ट्रीयता अखंडता, सार्वभौमिकता और स्वाधीनता का हिस्सा नहीं बन सकती, तब तो इसका स्वामी गोर्खा साम्राज्य के विरुद्ध लड़ना ही होगा ।

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