तमलोपा और सद्भावना का एकीकरण एकसुूत्रीय अभियान चलना चाहिए: बी पी यादव

बी पी यादव, काठमांडू , १५ अगस्त | कवि दिनकर का कहना है कि सुख, दुःख पल भर की माया हैं ,रोने वाला ही गीत गाता हैं ,गाने वाला ही रोता हैं। 
bp yadavतराई मधेश के राजनीतिक दलों , में खुशियाली के साथ साथ असन्तुष्टी भी उतनी ही दिखाई दे रही है ।  मधेसी पाटिर्यों में केन्द्रीय सदस्य की तो वात छोड दीजिए पदाधिकारी बन्ने के लिए बहुत लोग प्रयासरत  हैं, लेकिन पदाधिकारी लोग भी दलों को छोडकर दूसरे पाटिर्यों में जा रहे हैं  पहाडी समुदाय के नेतृत्व वाले दलों में शामिल हो रहे हैं , तो क्या हम यह मानने लगे कि मधेस में मधेसी दलों के प्रति लोगों का आर्कषण कम होता जा रहा है ? या इसका कोई और भी कारण हो सकता है ।
रात में एक समाचार देखा सहअध्यक्ष पद भी छोडकर दूसरे दल में शामिल होने जा रहे हैं । मधेसी दल के प्रति लोगों का लगाव, सिर्फ दो  ही समय में रहता है । एक आन्दोलन, और दूसरा जब  सरकार में रहेंगें तब ,अन्य समय भी रहता है लेकिन कम रहता है ं। आनेवाला समय मधेसी दल के लिए बहुत भारी होगा क्योंकी प्रचण्ड के नेतृत्व की सरकार स्थानीय निर्वाचन जैसे भी  हो कराना चाहते हैं ।  इस अवस्था में अगर मधेसी दल चुनावी मैदान में जाते है तो हाथ में शुन्य वाहेक कुछ नही आएगा । चिन्ता इस वात की हैं कि स्थानीय स्तर के चुनाव में एक बडे जन घनत्व वाला क्षेत्र होगा साथ ही साथ निवेश भी अच्छा खासा चाहिए, तब चुनाव लडने वाले लोग जो जीतने के लिए लडना चाहते हैं , उन्होंनें देखा कि  कौन सी पार्टी जीत सकती है  । उधर उसका आर्कषण बढेगा और पहाडी पार्टी भी उसी को सपोर्ट करेगी ।
उपेन्द्र यादव के नेतृत्व का फोरम नेपाल, अन्य मधेसी  दल से किसी प्रकार का तालमेंल नहीं करेगा ।  विजय कुमार गच्छेदार के नेतृत्व का फोरम लोकतान्त्रिक के साथ महन्थ ठाकुर ,राजेन्द्र महतो और महेन्द्र प्रसाद यादव के चुनावी एकीकरण में नहीं जाने की सम्भावना देखी गयी है । तो एक विकल्प वाकी  है राजेन्द्र महतो और महन्थ ठाकुर की एकता । तब चुनाव में कुछ आशा सब में जगेगी ।  ,स्थानीय स्तर पर, केन्द्रीय स्तर पर संख्या बढाने की वातों की चर्चा मधेसी पार्टी में बहुत कम हो रही है , दलों में सब आन्तरिक कलह में उलझे हुए हैं ।
पहाडी दलों के नेतृत्व को हमेशा गलत ठहराते हैं,  ठिक हैं हमारे साथ विभेदकी श्रृखंला उन्हीं लोगों ने शुरु की ,लेकिन दलों के एकीकरण की जो एक वर्ष तक गृहकार्य हुआ उस को सफल न होने देने का विरोधितत्व  पहाडी नहिं है मधेसी ही है ,इसका मतलब मधेस के हित से व्यक्तिगत हित की वात को लेकर मधेसी दलों  का भविष्य कहाँ तक और कब तक है ? मधेसी दलों में कुछ नेता सिर्फ अपनी जिन्दगी के लिए जीते हैं पर अब जीना है दल में लगे युवा , विद्याथिर्यों को अगर जीना हैं तो मजबूति के साथ साथ संगठन के साथ जीने के लिए ा । आप अगर अध्यक्ष,सह अधयक्ष, बरिष्ट नेता, बरिष्ट उपाधयक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष और बडे बडे पद के साथ है लेकिन संसद में सांसद की संख्या नहीं है तो पद का कोईभी  महत्व नही हैं स्थानीय निर्वाचन में अपने गाँव में प्रतिनिधी को निर्वाचित नहीं करवा सके तो केन्द्र में बडे से बडा पद लेकर क्या मतलव हुआ ? तमलोपा और सद्भावना का एकीकरण एकसुूत्रीय अभियान चलना चाहिए । इस अभियान में लगने वाले साधारण से साधारण कार्यकर्ता नेता बनेगें इस अभियान के विरोध करने वाले चाहे जितना बडा नेता क्यों न हो वह अपनी हैसियत में आ जाएगें ।
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