तराई मधेश में घटस्थापना से ही शुरू है झिझिया नृत्य

कैलास दास, जनकपुर, २७ असोज |

तराई मधेश में दशैं के शुरुवात के साथ ही लोक नृत्य ‘झिझिया’ विधिवत रुप में प्रारम्भ हो जाता है । यह एक प्रकार से जादु टोना के प्रभाव से बचने के लिए ‘झिझिया’ नृत्य किया जाता है । जानकारो के अनुसार ‘डाइन’ भी अपना मन्त्र सिद्धि दशैं में करती है । ‘डाइन’ का जादु टोना का प्रभाव किसी पर न परे इसलिए मध्य रात में यह नृत्य किया जाता है और उसमे ‘डाइन’ को गाली देते हुए नगर डिहबार को विनती करते है ः—

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‘तोहरे भरोसे बरहम बाबा झिझिरी बनेलियै हो

बरहम बाबा झिझिया पर होइयौ ने सवार अबोधबा

बालक तोहर किछियो ने जनैछौं हो‘’

सात बहिनी फूलमती, एकै भैरव भैया

बहिनीए लागि भैया झिझिया बनैली तोरे लागि।

घटस्थापना से शुरु होने वाला ‘झिझिया नृत्य’ की तैयारी अर्थात अभ्यास महिला एक महिना पहले से ही करते है । यह नृत्य बहुत ही जोखिम भी है । इस नृत्य में घैला को श्रृंगार कर उसमें अनगिनित छिद्र कर दिया जाता है, उसके वाद झिझिया के अन्दर दीप जलाकर पहले किसी धामी से मन्त्र द्वारा बाँधते है फिर सर पर रखकर जोगिन–डायन भगानेवाली और गाली करती हुई गीत गाती हुए नृत्य करती है ः—

कोठाके उपर डैनियाँ, खिडकी लगैले ना

खिडकी ओतए डैनियाँ, गुनवा चलैले ना,

आगे किछु होएतो डैनियाँ, गदहापर चढेवौ’।। ।

झिझिया खेलते वक्त महिला डाइन को गोली देते हुए अपना पति एवं भाई बन्धु को सुस्वास्थ्य और दीर्घायृु की कामना करते है ।

र्डाईनके दुनु आँख घोपवे हे ।

झिझिर खेले गईलोमे बाबा चँहुपरिया

झिझिया गईले पहर्राईले हो ।

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झिझिया नृत्य में विशेष कर महिला की ही सहभागिता रहती है वैसा भी नही है, इसमें पुरुष भी होते है । यह नृत्य खासकर तराई मधेश के ग्रामीण क्षेत्र में सबसे ज्यादा होता था । घटस्थापना से शुरु होने वाला यह नृत्य दशमी तिथि तक बहुत ही उत्साह और धुमधाम के साथ मनाया जाता है । लेकिन फिलहाल देखा जाए तो यह लुप्त होने की स्थिति में है ।

महिला और पुरुष का कम से कम १५—३० के समूह में नाचनेवाला झिझिया नृत्य में ढोलक, झाईल, झामर का प्रयोग किया जाता है । महिला पुरुष गीत गाती है और बीच में दो तीन महिला नृत्य करती है । सर पर रखा मिटी की घौला जिनमे अनगिनित छेदा रहता है और उस छेदा से प्रकाश की रौशन आती रहती है यह नृत्य बहुत ही मनमोहक दिखता है । कहते है कि नृत्य करते वक्ता घैला में रहा छेदा को अगर ‘डाइन’ गीन लिया तो उसका मन्त्र का प्रभाव से नृत्य करनेवाली महिला की मौत भी हो सकती है ।

तराई मधेश के लिए लोक नृत्य एवं गीत झिझिया धरोहर है । इसका संरक्षण करना सभी का दायित्व है विद्वानो का कहना है । लोक नृत को बचना ही हमारी पहिचान है । इसे लोपोन्मुख होने से बचाने के लिए इसका संरक्षण आवश्यक है ।

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