तराई–मधेश समस्या के बारे में सरकार गम्भीर नहीं बन सकी

मधेशवादी केवल, सीमांकन, प्रतिनिधित्व, जनसंख्या के आधार में निर्वाचन प्रणाली और समानुपातिक समावेशी ही तो खोज रहा है । लेकिन अधिकार और सम्मान तथा समानता के मांग को लेकर मधेशवासी अपमानित, अवहेलित तथा क्रुद्ध दमन का शिकार होते हैं ।

डा. शंकरलाल चौधरी :आज तराई–मधेश की समस्या से सारा देश तवाही में है । मधेश आन्दोलन को पाँच महीने से अधिक हो रहे हैं, फिर भी सार्थक निर्णय नहीं हो सका । नेपाल के इतिहास में यह संविधान सबसे अधिक लोकतान्त्रिक संविधान है । इससे अच्छा संविधान संसार में ही नहीं है । लेकिन फिर भी आधी से अधिक जनसंख्या (५१ प्रतिशत) वाले भाग तराई–मधेश के लोगों ने इसको अपनाया नहीं । आखिर क्या बात है ? मधेश के लोग कम पढेÞलिखे है, कम अध्ययनशील, कम कानून के ज्ञाता और संविधान के बारे में ज्ञान नहीं है । जो आज तराई मधेश के लोग नयाँ संविधान से अलग थलग है । मधेश के लोग २५० वर्ष समस्या भोगने के बावजूद भी उनकी समस्या ज्यों की त्यों रही । आखिर क्यों ? इन्जीनियर अपना ही घर में डिफेक्ट पता लगाने पर फिर से तोड़कर नया घर बनाते हैं । यदि वास्तव में संविधान अपूर्ण और अधूरा है तो पुनर्लेखन ओर परिमार्जन होना ही चाहिए । इसका विकल्प नहीं है । घर चूता है तो सूखा मौसम में फिर से मरम्मत अथवा नया बनाना ही पडेÞगा । बरसात में मरम्मत करना ठीक नहीं है ।
हाल में तराई मधेश के मांग के प्रति राज्य पक्ष से अनरगल प्रचार–प्रसार किया जाता रहा है । क्यों ? तराई मधेशवादी अधिकार खोज रहा है, ना कि नयाँ देश ओर न खण्डित देश चाहता है । देश में सम्मानित अधिकार खोज रहा है । जिम्मेवार नेता इस बारे में चुप क्यों हैं ? मधेशवादी केवल, सीमांकन, प्रतिनिधित्व, जनसंख्या के आधार में निर्वाचन प्रणाली और समानुपातिक समावेशी ही तो खोज रहा है । लेकिन अधिकार और सम्मान तथा समानता के मांग को लेकर मधेशवासी अपमानित, अवहेलित तथा क्रुद्ध दमन का शिकार होते हैं ।
नेपाल में विकास के लिए होड़बाजी नहीं है । कुछ खसवादी में पद, शक्ति और सत्ता की स्वार्थ के लिए इगों के रूप में अपना संतुलन खो बैठते है और अन्त में हर समस्या मधेशवादी के ऊपर लादना शुरु करते हैं । आज शक्ति की सीमा नहीं है एक से एक शक्तिशाली पुरुष हैं । लेकिन कुछ समय के बाद वह शक्ति सीमित हो जाती है । विकास के लिए हर समय चिन्ता जरुरी है लेकिन औरो का शोषण, कमजोर वर्ग का दमन करके नहीं होता है ।
आश्चर्य इस बात का है कि २१वें शताब्दी में भी एक जाति वर्ग समूह के नेता को तराई–मधेश की उपजाउ भूमि, जल, जंगल स्रोत साधन चाहिए लेकिन बासिन्दा नहीं, मधेशवासी नहीं । मधेशवादी खस की दृष्टि में सदा से घृणा के रूप में देखा जाता है । खस समूह के लोग जब तक मधेश में सम्पन्न नहीं होते है तब तक के ही लिए मधेशवादी उनकी नजर में ठीक है मगर सम्पन्न, धनाढ्य हो जाने पर मधेशी प्रति घृणा और अनरगल प्रचार करते है । मधेश में धुआँ है, धूल है, कीचड़ है, मच्छर है, सर्प है रास्ता नहीं , अनपढ है आदि आदि भ्रमित करते हैं । आखिर कब तक ? खस बड़े नेता मधेश को अपना जमीनदारी बनाये हुए हंै । चाहे पूर्व में हो या पश्चिम में । अपना–अना वर्चस्व कायम रखने में अहोरात चिन्ता करते हैं । लेकिन मधेश के शोषित पीडि़त पीछे पड़े हुए हैं । दाङ–कञ्चनपुर तक की समस्या के बारे में सोचा जाय तो दृश्य बहुत विकराल और भयावह है । कमैया, कमलरी, मजदूर आदि में दास–दासी और शोषण की जड़ बहुत नीचे और गहरे धरातल तक पहुँच गयी है । ये लोग सदा से कमजोर रहे । इसलिए थारु कमलरी को तोड़कर छिन्न भिन्न कर चुका है । सामाजिक न्याय और संघीयता के सर्वमान्य सिद्धान्त को भी कुचल दिया गया है । आज थारु–मधेशी अपना अधिकार मांगते तो विखण्डनकारी, देश टुकराना, देश विभाजन करना आदि गलत प्रचार करने में खस अहंकारवादी पीछे नहीं हंटते है ।
एक खस विद्वान के द्वारा २०२५ वि.सं. में खस समुदाय के क्रुर दमन के कारण कञ्चनपुर ने राणा थारु लोग को जबर्दस्ती भगाया है । यह कहकर कि तुम लोगों के पास नागरिकता नहीं है । और सैकड़ों बिघा जमीन तरकारी से सस्ता दाम में खरीद कर के राणा थारु लोगों को घरवार विहीन बना कर भगा दिया है । अन्त में आज भारत के उत्तर प्रदेश और उत्तराञ्चल में लखमीपुर, खेरी बहराइज, गोन्डा, बनबासा, नैनीताल, खतीमा आदि जगह रिक्सा, ठेला और मजदूरी का काम कर रहे है । वे लोग अभी भी कहते है– हम फलाना गाँव के जमीदार थे, इनारावागीया, पोखरी, बांस आदि सांक्षी है । हम फलाने गाँव के बडे भूमिपति थे लेकिन यह आज सिनेमा का कथा बन गया है । लेकिन समाजशास्त्री, मानवशास्त्री, इतिहासकार, विद्वान लोगों को यह बात पता है । यह जग जाहिर है । और यह वास्तविकता है । इतना होने पर भी आज शोषक वर्ग तराई–मधेशवासी से खुशी नहीं है । यदि इस धरातल पर विचार किया जाए तो मुझे नहीं लगता कि थारु मधेशी लोग संघीयता अथवा अपना अधिकार आसानी से ले पाएगा । तराई मधेश, देश का अन्न का भण्डार, स्रोत साधन का खजाना है । लेकिन देश का एक सक्षम वर्ग का नेता मौन है । चुप्पी लादे है । सैकड़ो वर्ष से अपनाया हुआ पद, प्रतिष्ठा और अधिकार तराइ–मधेशवासी को देना नहीं चाहता है ।
विश्व में बहुत शक्तिशाली नेता हुए जैसे नेपालियन, सिकन्दर, आदि । अध्यात्मिक गुरु श्री बापू बोसबानी ने कहा था नेपोलियन के कब्र में जाकर, ये तूने क्या किया, विश्व बिजेता हो । बोसबानी ने नेपोलियन को धिक्कार था । तुम कायर हो । जो जितना कमजोर होता है, उसको उतना ही अधिक शक्ति चाहिए । जो गलत तरीके से शक्ति जमा करता है, उनको उतनी ही अधिक शक्ति चाहिए अभी नेपाल में एक वर्ग जाति समूह एकलौते तरीके से शासन, प्रशासन और राज्य के हरेक अंग में अपना बर्चस्व जमा चुके हैं । और जब कमजोर पक्ष अधिकार समान और बराबरी हक मांगते हैं तो अनेक तरह का प्रपंच, जालझेल, मुद्दा मुकदमा, झूठ का इलजाम लगाकर तवाह कर देते हैं । आज तराई मधेश कमजोर हो जाय तो देश की क्या हालत होगी ।
तराई–मधेश में यहाँ के वासी, यहाँ के लोग मुगल और अँग्रेज शासक से लडकर शहादत हुए है और देश के दक्षिण दीवार सुरक्षा कवच का काम किया है । मधेशवादी सच्चा देशभक्त बनकर काम किया । लेकिन अभी के संविधान और संघीयता में उनके योगदान को नकार दिया गया है । संविधान में झापा–कञ्चनपुर, टुकड़ा–टुकड़ा में बाँट दिया गया है । थारु मधेशी के कलस्टर को कुचल दिया गया है । केवल सप्तरी–पर्सा तक को एक प्रदेश मान कर सहानुभूति प्रदान कर रहे । बाँकी छह प्रदेश खसवादी के पक्ष में दिया गया है । यही पर तराई मधेशवादी, थारु मधेशी का अपमान किया है । तराई–मधेश में तो तराई–मधेश का ही स्वायत्त प्रदेश होना चाहिए । इसी से देश मजबूत, अर्थतन्त्र संतुलित और पर्यावरण स्वस्थकर होगा । भूगोल और प्रकृति की देन वो बिगाड़ कर देश अस्वस्थ और कमजोर होगा यह ज्ञान होना चाहिए । आजतक मधेशवासी का दुधबोली भाषा को राज्य के तरफ से सरकारी भाषा, ना कामकाज की भाषा की मान्यता दी गई है । अभी भी महेन्द्रवादी चिन्तन एक भाषा, एक जाति, एक भेष, एक संस्कृति देश में लादा हुआ है । खस समूह के लोग तराई मधेश से चुनाव जीत जाते हैं और मधेशी से घृणा करते है । उनको मधेश मात्र चाहिए मधेशी नहीं ।
पुरानी कहावत है । भेल विवाह मरकरबकि । नदी पार किया और लाठी भूल गए । तराई–मधेश के लोग इतना इमानदार हैं कि मधेश में जिस किसी भी समूह, पहाडे हो, मधेशी हो, सब को जिताते है मगर खस समूह लोग मधेश से जीतने पर मधेशी से के ही घृणा करते है । यही कारण है कि आज तराई मधेश में संविधान लेकर लड़ रहे है । मधेश के जितना भी पकीया, ढोका हुआ नेता क्यों न हो चुनाव पहाड़ से नहीं जीत सकते हैं । यही धरातलीय पहचान है ।
तराई–मधेश देश का बहुत बडा अन्न का भण्डार स्रोत साधन का खजाना, प्रकृति का भण्डार है, जल का भण्डार है । अतः अत्याधिक चिन्तन करके यहाँ के निर्णायक और राज्य पक्ष के विद्वान और चतुर लोग तराई मधेश के समस्या को जल्द से जल्द हल करना चाहिए । आखिर तराई–मधेश भी तो देश का अभिन्न अंग है । देश का पूरा अर्थतन्त्र तराई मधेश पर ही तो निर्भर होता है । यह आज की बात नहीं है । अनादि काल से चल रहा है । संविधान की समस्या को लेकर केवल मधेशवासी ही नहीं तबाह है बल्कि सारा देश संकट में है । इसलिए निर्णायक पक्ष संवेदनशील होकर अपना घर का समस्या समझ कर अविलम्ब समस्या हल किया जाए । इसी में राज्य का, देश का और स्वायत्त प्रदेश का भलाई होगा । देश के सभी लोगों और वर्गों की भलाई होगी ।

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