तलवार की धार पर नई सरकार

prachand-elected.png-1 कुमार सच्चिदानन्द 
किसी भी देश के लिए इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि साल नहीं लगता मगर सरकारें बदल जातीं हैं और इसके साथ ही दलों की प्रतिबद्धताएँ भी बदल जातीं हैं । कल तक जो सत्ता में होते हैं वे हाशिये पर नजर आते हैं और जो हाशिये पर होते हैं वे केन्द्र में नजर आते हैं । हलाँकि इसे स्वस्थ राजनैतिक अभ्यास माना जा सकता है । लेकिन इस दृष्टि से नेपाल का राजनैतिक स्वास्थ्य इतना बेहतर है कि यहाँ सिर्फ अभ्यास होते हैं, सपने बुने जाते हैं, नीतियाँ बनायी जाती हैं और जब कार्यान्वयन का वक्त आता है तब तक सरकार बदल जाती हैं । विगत ओली सरकार का पतन और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है । विगत सरकार का गिरना महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है कि इसका जो विकल्प होगा वह बहुआयामी और गतिशील होगा बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस सरकार के साथ एक अतिवादी सोच सत्ता में हावी होने लगी थी और हवाई किला बनाते हुए इसने जनता को न केवल सब्जबाग दिखलाया वरन राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसा पाठ पढ़ाया जिससे लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ीं । सामाजिक सामरस्य में कमी आई और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में अपनी घोर अविश्वसनीयता का इसने उद्घोष किया । इस सरकार के अन्त के साथ ही एक राजनैतिक अतिवाद का अन्त हुआ ।
बदली हुई परिस्थितियों में नेकपा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है और संभव है जब आप ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हों तब तक वे प्रधानमंत्री पद की शपथ ले भी चुके हों । लेकिन इस बात का हमें ज्ञान होना ही चाहिए कि प्रचण्ड नेपाली राजनीति के सबसे प्रखर और दबंग व्यक्तित्व तो हैं मगर सबसे अधिक अविश्वसनीय भी । मुद्दा चाहे सीमान्तीकृत वर्ग की माँगों के सम्बोधन का हो, मधेश की समस्याओं को सुलझाने का हो या अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में संतुलन साधने का हो, गिरगिट की तरह उनका रंग बदलना सबने देखा है । इन मुद्दों से जुड़े उनके क्रियाकलाप कभी–कभी इतने सतही स्तर के हुए हैं जिन्हें कम से कम एक राजनेता का कदम नहीं माना जा जा सकता । संविधान निर्माण से लेकर उसके पारित होने तक जो विसंगतियाँ देखीं गईं और इसके सन्दर्भ में जो असंतोष उत्पन्न हुए उससे उनको किसी भी रूप में बरी नहीं किया जा सकता क्योंकि वे ऐसी संख्या का नेतृत्व कर रहे थे जिसकी सहमति के बिना इस संविधान को किसी भी रूप में वैधानिकता नहीं प्राप्त हो सकती थी । इतना ही नहीं विगत सरकार के मुखिया के रूप मे जब केपी शर्मा ओली विभिन्न स्तरों पर नेपाली समाज को विभाजित कर रहे थे, उसे उग्र राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रहे थे, पड़ोसियों को अँगुली दिखला रहे थे उस समय भी प्रचण्ड हनुमान की तरह उन्हें कन्धे पर उठाकर सत्ता के अहंकार के आकाश में विचरण करा रहे थे । इसलिए यह मान लेना कि प्रचण्ड का नेतृत्व सँभालते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा–मुश्किल है ।
ऐसा नहीं है कि प्रचण्ड और उनके दल ने इसलिए विगत सरकार से समर्थन वापस लिया कि वे उनके काम–काज से असन्तुष्ट थे । दरअसल इस बात को समझने के लिए नेपाल के राजनैतिक दलों और आम लोगों के राजनैतिक मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है । दलों की स्थिति यह है कि ये अवसर और सत्तामुखी हैं । यही कारण है कि लोकतांत्रिक अभ्यास में पराजित होने के बावजूद ये नित्य सत्ता की साधना में लीन रहते हैं और सहमति की सरकार के नाम पर सत्ता की चासनी पर मँडराते रहते हैं तथा एक तरह से लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए तैयार दिखते हैं । विगत संविधान में जो विभेद, असमानता और अन्याय का पक्ष उभरकर सामने आया उसका एक मात्र कारण बड़े दलों की आम सहमति ही थी क्योंकि छोटे दलों की आवाजें उन्होंने सुनी नहीं और एक तरह से उन्हें पराजित मान कर उनकी माँगों की घोर उपेक्षा की गई । संविधान जारी करने के नाम पर दलों का ऐसा ध्रुवीकरण यहाँ संभव हुआ कि सिद्धान्त और विचारधारा इनके अवसर की नदी में बहते नजर आए । संख्या और शक्ति के मद में ये इतने बेकाबू हुए कि इतना भी नहीं समझ पाए कि जो माँगें माँगी जा रही हैं वे एक क्षेत्र विशेष की माँगें हैं । इस क्षेत्र में निश्चय ही क्षेत्रीय दलों को पराजय का मुँह देखना पड़ा है लेकिन जनता की संवेदना पराजित नहीं हुई है । यह सच है विगत चुनावों में आम लोगों ने राष्ट्रीय दलों में अपना विश्वास व्यक्त किया था लेकिन इन दलों ने ऐसा संविधान दिया कि उनकी ही समर्थक–जनता यह सोचने के लिए विवश हो गई कि वास्तव में राष्ट्रीय दलों के प्रतिनिधियों को विजय दिलाकर उसने गलती की है । यही कारण बना कि अपने द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का भी उन्होंने कड़ा प्रतिकार किया । इसलिए संविधान जारी होने के साथ ही एक तरह से पूरा देश विभाजित नजर आया । एक वर्ग ऐसा था जो दीवाली मना रहा था, दूसरा वर्ग ऐसा था जो काला दिवस मना रहा था । इतने कड़े विरोध के बाबजूद किसी भी संविधान के कार्यान्वयन का सपना तो बाल–हठ के समान है ।
दूसरी ओर जनता का राजनैतिक मनोविज्ञान यह है कि वे स्पष्ट रूप से तीन खेमे में बँटे हैं जिसे मध्यम, वाम और दक्षिणपंथ में हम विभाजित कर सकते हैं । लेकिन अन्य राजनैतिक शक्ति के रूप में आज क्षेत्रीय दल प्रबल हुए हैं । उनका जनाधार इन्हीं शक्तियों से अलग होकर आकार ग्रहण किया है । इसलिए एक अज्ञात आशंका और अस्तित्व का संकट सभी दलों में है । इस पर ओली के प्रधानमंत्री बनने का एक नकारात्मक पक्ष यह हुआ कि इन्होंने उग्र राष्ट्रवाद की भावना को हवा दी और नेपाल की राजनीति पर भारतीय प्रभाव को कम करने के नाम पर स्वयं को भारत का अतिविरोधी प्रधानमंत्री के रूप में सिद्ध किया । नेपाल की मीडिया भी यहाँ की जमीनी हकीकत से अनजान रहते हुए उनकी नकारात्मक भावनाओं को घर–घर में प्रचारित किया । इसका परिणाम यह हुआ कि वामपंथी विचारधारा का आदर्श ओली बनने लगे और हर विचारधारा से उनके समर्थक बनने लगे । नेपाली काँग्रेस ने इस खतरे को पहले ही समझ लिया और इस सरकार से तौबा की तथा मधेश के प्रति थोड़ा नर्म रूखÞ अख्तियार किया । माओवादी का एक घड़ा बाबुराम भट्टराई के नेतृत्व में संविधान निर्माण के बाद वामपंथी आंदोलन के लक्ष्य की समाप्ति की घोषणा कर इससे बाहर निकल गया । अब प्रचण्डको लगा कि अगर अब भी वे सरकार के साथ रहे तो संभव है उनका जनाधार खिसक कर फिर से ओली को हीरो न बना दे । उनके भय का यही मनोविज्ञान समर्थन वापसी का आधार बना ।
आज प्रचण्ड प्रधानमंत्री बनने के कगार पर हैं । लेकिन इनसे बहुत अधिक आशा इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि आज जो भी अव्यवस्था देखी जा रही है उन सभी का वे द्रष्टा मात्र नहीं बल्कि समर्थक भी रहे हैं । लेकिन यह भी माना जा सकता है कि उनका राजनैतिक जीवन महज दस वर्षों का रहा है । इससे पूर्व तो वे विद्रोही रहे हैं । संभव है कि राजनीति का पक्का मिजाज समझने में उन्हें देर लगे । यह सच है कि आदमी समझता है और बदलता भी है । समय और परिस्थितियों की रगड़ से व्यक्ति के चिंतन को आकार मिलता है । इससे पूर्व भी वे प्रधानमंत्री रह चुके हैं और विपक्ष का भी नेतृत्व कर चुके हैं । राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कूटनैतिक क्रियाशीलता को भी वे निश्चय ही समझ रहे होंगे और उनके समर्थन और दबाब का भी एहसास उन्हें अवश्य होगा । इसलिए यह अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि इनका आगामी कार्यकाल अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व होगा । आज समय के ऐसे दहलीज पर राष्ट्र खड़ा है जहाँ तीव्र विकास की अपेक्षा की जाती है लेकिन हमारा यथार्थ यह कि हम राजनैतिक समस्याओं को ही सुलझा नहीं पा रहे । परिणामतः शांति असंभव है और इसके बिना विकास और व्यवस्था की बातें बेमानी हैं ।
वर्तमान समय में सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह हैै कि इस बात को हमारे नेतागण सही ढंग से नहीं समझ पाए हैं कि ‘राष्ट्र मूलतः जनता और समाज का चरित्रबोध कराता है । नए संविधान में नेपाल को बहुजातीय, बहुधार्मिक तथा बहुसांस्कृतिक कहा गया है । राज्य प्रधानतः राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक आदि शक्तियों के स्रोत एवं प्रयोग से सम्बन्धित होता है । इसलिए समाज और राष्ट्र की विविधता राज्य के चरित्र में प्रतिबिम्बित होना आवश्यक है । लेकिन दुर्भाग्यवश पहले मसौदा में उल्लेखित नेपाल ‘एक बहुजातीय राज्य’ जैसी शब्दावली को नए संविधान में राज्य की परिभाषा से हटा दिया गया । अर्थात यह स्वीकार कर लिया गया कि राज्य का चरित्र अगर बहुजातीय नहीं भी हुआ तो वह संविधान विपरीत नहीं है । इसलिए ढाई सौ वर्ष पूर्व एकीकृत नेपाल के निर्माण के साथ–साथ निरन्तर बहिष्कृत हुए आदिवासी, जनजाति, मधेशी आदि में व्याप्त सामाजिक विविधता को राज्य के चरित्र में देखने की जो इच्छा है उसे नया संविधान प्रारम्भ में ही खारिज करता है । इसलिए इस संविधान को स्वीकार करने में ये न केवल हिचक रहे हैं बल्कि इसका व्यापक विरोध भी कर रहे हैं । इसके अतिरिक्त राज्य पुनर्संरचना का प्रमुख हथियार जातीय–क्षेत्रीय पहचान की संववैधानिक मान्यता है । इसलिए पहचानजनित संघीयता की इनकी माँग रही है लेकिन इन्हें राज्य के निर्देशक सिद्धान्त के अन्तर्गत रखकर यह संदेश स्पष्ट रूप से दे दिया गया है कि इसके कार्यान्वयन के संदर्भ में किसी भी अदालत में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता (डॉ. कृष्ण हाछेथु) ।’ फिर यह संविधान समावेशी की बात तो करता है मगर समानुपातिक समावेशी के मुद्दे पर अनेक बिन्दु अपारिभाषित हैं और नागरिकता की समस्या भी जटिल रूप में उलझी हुई है ।
बात साफ है कि इन समस्याओं के समाधान के बिना इस संविधान का कार्यान्वयन संभव नहीं और यह बिना संविधान के संशोधन के संभव नहीं । संविधान के संशोधन के लिए प्रतिनिधि सभा में जिस बहुमत की अपेक्षा है वह नए सत्ता समीकरण में सहभागी दलों के पास नहीं । इसलिए प्रधानमंत्री प्रचण्ड को इन समस्याओं के समाधान के लिए एड़ी–चोटी का परिश्रम करना होगा और अनेक दलों को विश्वास में लेने के साथ तोड़–मरोड़ की राजनीति का भी आश्रय लेना होगा । इस संदर्भ में यह बात उनके पक्ष में है कि वे ऐसे देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं जहाँ के राजनैतिक दलों और नेताओं ने सत्ता की गलियों में सिद्धान्तों को अर्पित किया है । यहाँ की राजनीति की यही विशेषता उन्हें सफल भी बना सकती है और यही उनकी परेशानियों का कारण भी बन सकती है । क्योंकि सबकी इच्छाओं को पूरी करना और सबकी अपेक्षाओं की कसौटी पर खड़ा उतरना सहज नहीं है, खासकर वहाँ जहाँ अन्धमहत्वाकांक्षाएँ अधिक गहरी जड़ें जमा चुकी हैं । इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के श्री विजय गच्छेदार और राप्रपा नेपाल के श्री कमल थापा हैं जो अब तक ओली सरकार के हवाई अभियान में हवा दे रहे थे, लेकिन उनके अल्पमत में आने के बाद उनकी सरकार को छोड़नेवालों में भी वे आगे हैं और यह भी माना ही जा सकता है कि आगामी सरकार में बिना शर्त समर्थन की थाल लेकर भी जाने वालों में ये पीछे नहीं होंगे ।
एक बात निश्चित है कि नेकपा माओवादी केन्द्र के नेतृत्व में नेपाली काँग्रेस के समर्थन से आगामी सरकार बनेगी । लेकिन अभी देश के लिए सरकार जितना महत्वपूर्ण है उससे अधिक महत्वपूर्ण नवसंविधान के आने से उत्पन्न समस्याओं को संबोधन है । क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो इस संविधान का कार्यान्वयन संभव नहीं और अन्ततः यह अपनी विफलता की ओर यह अग्रसर हो जाएगा । लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है संविधान की धाराओं में संशोधन या परिवर्तन के लिए आवश्यक संख्याबल इस सत्ता समीकरण के पास नहीं । चूँकि नेकपा एमाले के नेतृत्व की सरकार को गिराकर प्रचण्ड सत्ता की कमान सँभाल रहे हैं इसलिए सरकार के समर्थन में इतनी सहजता से उनका आना संभव नहीं है और उनके बिना अपेक्षित बहुमत का मिलना संभव नहीं । महत्व के आधार पर मुद्दों को संबोधित करने के लिए संविधान संशोधन जैसे विषयों पर समर्थन देने का हमारा राजनैतिक संस्कार विकसित नहीं हो पाया है । लेकिन यह भी सच है कि समयक्रम में सत्ता के समीकरण बदलेंगे । मधेश का नेतृत्व करने बाले छोटे–बड़े दल चाहे सरकार के भीतर हो या बाहर वे विवादास्पद मुद्दों को संशोधित करने के निमित्त सरकार का समर्थन करेंगे ही । इसके साथ ही आगामी सरकार के लिए यह भी एक सकारात्मक पक्ष है कि राप्रपा के दोनों दलों में एकीकरण की संभावना बन रही है । अगर यह संभव हो जाता तो देश के संवैधानिक समस्याओं के समाधान में इनका सकारात्मक योगदान हो सकता है । इसके बावजूद अगर संविधान संशोधन के लिए उचित संख्याबल नहीं होता तो किसी बड़े राजनैतिक टूट–फूट की संभावना हो सकती है और इसका शिकार कहीं नेकपा एमाले ही न हो जाए क्योंकि अपने बड़बोलेपन से इसके अध्यक्ष के रूप में केपी शर्मा ओली ने अपने प्रखर विरोधियों की एक जमात खड़ी कर ली है ।
इन आन्तरिक मुद्दों के अतिरिक्त नए प्रधानमंत्री के रूप में प्रचण्ड को अपनी विदेशनीति को भी फूँक–फूँक कर सँवारना होगा क्योंकि ओली ने नेपाल में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा को निमंत्रण देकर उनके लिए तलवार की धार खड़ी कर दी है । गौरतलब है कि नेपाल के वैदेशिक सम्बन्ध अनेक देशों से हैं किन्तु भारत और चीन के अतिरिक्त अन्य की सक्रियता यहाँ बहुत अधिक नहीं । लेकिन पिछले कुछ दिनों से चीनी कूटनीति की सक्रियता यहाँ बढ़ी है । विगत सरकार की विदेशनीति के मोर्चे पर सबसे अधिक विफलता यह रही है कि मोदी जैसे नेपाल समर्थक भारतीय प्रधानमंत्री को भी इसने खुरचकर घाव दिए हैं और उस पर नमक छिड़कने वालों में आगामी प्रधानमंत्री श्री प्रचण्ड की भी भूमिका कमजोर नहीं रही है । जबकि आज का यथार्थ है कि वैश्विक राजनैतिक परिवेश में चीन और भारत के सम्बन्ध सतह पर हैं और दोनों दो–दो हाथ करने के लिए तैयार हैं । कूटनैतिक शीतयुद्ध तो दोनों में चल ही रहा है । नेपाल की विवशता यह है कि दोनों इसके निकटस्थ पड़ोसी हैं । इसलिए इनके साथ सम्बन्धों को संतुलित रखना आगामी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होगी ।
हालात कठिन है और प्रचण्ड आगामी सरकार के प्रधानमंत्री हो सकते हैं लेकिन ‘प्रतापी भूपति’ बनने का ख्वाब वे निश्चय ही नहीं देख सकते । यह सच है कि वे एक वामपंथी दल के प्रमुख हैं लेकिन तानाशाह बनने की बात भी नहीं सोच सकते क्योंकि वे एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होंगे और लोकतंत्र में जनता की भावनाओं का सम्मान करना ही धर्म है, यह बात कहने की जरूरत नहीं । जो वर्ग आज संविधान का विरोध कर रहे है,. वे इसी देश के नागरिक हैं और सदियों से उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं । इस बात को समय–समय पर उन्होंने स्वीकार भी किया है । २१ वीं शताब्दी में जहाँ संचार और शिक्षा तक आमलोगों की पहुँच है वहाँ शब्दों की पहेलियों से काम नहीं चल सकता, शोषण और विभेद का जाल लम्बे समय तक नहीं रह सकता । आमलोगों की अपेक्षा है कि वे अपने इस कार्यकाल में राजनेता से जननेता बनें । नेपाल में यह जगह अभी खाली है । इतिहास उनका स्वागत करने के लिए तैयार है ।

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