तलाक,तलाक,तलाक’ अब हो गया खेल ख़तम : बिनोद पासवान

बिनोद पासवान । हम अपनेको सामाजिक प्राणी मानते है, उसी हिसाबसे हमने सामाजिक निति-नियम बनाये हुए हैं। सामाजिक नियम सामाजिक बिकृतिको रोकनेके लिए बनाया गया है, न की किसीको उसका गलत फ़ायदा उठानेके लिए । हम सब जानते है की अब तीन तलाक का गलत फ़ायदा लोग कैसे अपने हिसाबसे करने लगे है, के मानो जब किसीको अपना एक बीबी से दिल भर गया हो, या मनचाहा जहेज न-मिला हो, या फिर जब यूं ही अपनी बीबी पर बस एक शक के बेनाह पर टेलीफोनमे या चिट्ठीसे तीनबार बस बोलदिया/लिखदिया ‘तलाक,तलाक,तलाक‘ अब हो गया खेल ख़तम !
मेरे हिसाब से जो कोई अगर इसके पक्षमे सोचते है, उन लोगोको उस पीड़ित परिवार या महिलाका दर्द का एहसास तब हो जब उनके ही घरके किसी माँ-बहन पर आप-बीती पड़े, तब पता चले की ये तीन तालाक का बिधान कितना गैर सामाजिक और मानवता बिरोधी है। हम सब जानते है १०००-१४०० साल पहले लोग उतने सभ्य नहीं थे, सिर्फ लड़ना जानते थे, उस वक़्त कोई लिखत संबिधान भी नहीं था। वही काल में भारतवर्ष में मनु महाराज ने भी उस समय के हिसाबसे जो मनुबाद का निति-नियम बनाया, हो सकता है उस समयके हिसाबसे सही भी हो। पर क्या अब वही पुरानी कुरीति वाली बातें आज के समय पर भी सन्दर्भिक हो सकता है ? जवाफ:नहीं, ये हम अपनी सामान्य बुद्धि से भी सोच-समझ सकते है। अब के जमाने में सामाजिक नियम-कानून के लिए, मानवीय मूल्य-मान्यता के रक्छाके लिए बहोत सारे नियम क़ानून बनाए गए हैं, आज के दौर में सम्बन्ध बिच्छेद के भी कुछ कायदे-क़ानून बना हुआ हैं, सभीको समानताका एहसास करानेके लिए समयानुसार नियम-क़ानून परिमार्जन किये जा रहे हैं।
हमें तो जितना हो सके सम्बन्ध जोड़नेकी बात पर जोड़ देना चाहिए न की तोड़नेपर। और, हम सबको मिलकर हर सामाजिक बिकृति के खिलाफ एकसाथ लड़ना होगा ।
तलाक के सम्बन्धमे “विकिपीडिया में मिले सन्दर्भ से कहा जाय तो :कुछ आधुनिक शिक्षा से प्रभावित व्यक्तियों का दावा है कि पवित्र कुरान में तलाक को न करने लायक काम का दर्जा दिया गया है। यही वजह है कि इसको खूब कठिन बनाया गया है। तलाक देने की एक विस्तृत प्रक्रिया दर्शाई गई है। परिवार में बातचीत, पति-पत्नी के बीच संवाद और सुलह पर जोर दिया गया है। पवित्र कुरान में कहा गया है कि जहां तक संभव हो, तलाक न दिया जाए और यदि तलाक देना जरूरी और अनिवार्य हो जाए तो कम से कम यह प्रक्रिया न्यायिक हो। इसके चलते पवित्र कुरान में एकतरफा या सुलह का प्रयास किए बिना दिए गए तलाक का जिक्र कहीं भी नहीं मिलता। इसी तरह पवित्र कुरान में तलाक प्रक्रिया की समय अवधि भी स्पष्ट रूप से बताई गई है। एक ही क्षण में तलाक का सवाल ही नहीं उठता। खत लिखकर या टेलीफोन पर एकतरफा और जुबानी तलाक की इजाजत इस्लाम कतई नहीं देता। एक बैठक में या एक ही वक्त में तलाक दे देना गैर-इस्लामी है। ”
अगर अब भी यह सरल सीधी बात जिनको समझमे नहीं आ रहा हो, तो उनसे तीन तालाक के बारेमे बस इतना पूछना चाहूँगा की, जब निकाहके वक़्त १० लोग के सामने गवाहके साथ निकाह होता है तो तलाक के वक़्त क्यों किसी गवाहका जरुरत नहीं समझते ? क्या यही सही इन्साफ है ? यह तो खुदाका इन्साफ नहीं हो सकता, कभी भी नहीं ।
इसीलिए मै मानता हूँ यह बिकृत तीन-तलाक का बात महज हमारी पितृसत्तात्मक समाजका उपज हो सकता है, बस

(तीन तलाकके मुद्देपर भारतके सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपना बिचार :”)

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