ताजे तजुर्बे तिर्थ यात्रा कि

मुकुन्द आचार्य :खुदा खुद एक खिलाडÞी है । अजीवोगरीब खेल तमाशे करता रहता है । कहते हैं न, खुदा देता है तो छप्पडÞ फाडÞकर देता है । मुझे भी छप्पडÞ फाडÞ कर दिया । घर का छत -छप्पडÞ) चूने लगा । मैंने पूछा, ये कैसा मजाक है – सारा घर बारिश के पानी में धुल धुल कर चमकने लगा । घर को बचाने के लिए घर को बैंक में गिरबी रखना पडÞा । घर को लगी आग, घर के चराग से । खैर … ! अपना-अपना नसीब !
खुदा ने फरमाया, जा बन्दे तीरथ घूम आ । कुछ अकल तो आएगी । समझ लेना, मैने तुझे यही दिया, छप्पडÞ फाडÞ कर ! मैंने भी कुबूल कर लिया, खुदायी फरमान जो ठहरा । इसे आप मेरी बुजदिली भी कह सकते हैं । आज के इस खुले दौर में किसी को भी कुछ भी कहा जा सकता है । मैंने भी सोचा, चलो यह सौदा भी बुरा नहीं । इसी बहाने भारत भूमि को अपने चरणरज से पवित्र कर दें ।
चौदह बन्दों का एक कुनवा ले कर मैं चल पडÞा- काठमांडू से कन्याकुमारी तक की दूरी तय करने । उस समय मुझे अपने सामने कोलम्बस भी बौना लगा ।
सब से पहले मैं उस बस वाले को धन्यवाद देता हूँ, जिसने रातभर घटिया गीतों का कैसेट बजा कर हमें सोने न दिया, चौकन्ना और र्सतर्क रखा । रक्सौल से सीधे हावडा पहुँचे । गुरुद्वारा में ठहरे । सोचा था, गुरुद्वारा में ठहरेंगे तो कुछ सस्ता पडÞेगा । मगर होटल से भी महंगा पडÞा गुरुद्वारा में ठहरना । ये तो अच्छा हुआ कि वहाँ से चलते वक्त ‘टिप’ चाहने वालों की अनसुनी, अनदेखी कर हम लोग चलते बने । मछली प्रेमी बंगालियों के प्राचीन शहर कलकत्ते में एक चिडिÞयाखाने को नजदीक से निहारा । लेकिन मैसूर में चिडिÞयाखाना देखने पर लगा, इसके सामने तो कलकता वाला विल्कुल फीका है । हाँ कलकत्ते ने दिन में तारे दिखा दिए, तारा मंडल में । भीखमंगो से भरे मन्दिरों से तो शान्त, साफ-सुथरा चर्च और विक्टोरिया मेमोरियल अच्छा लगा । बैंगलोर को लोग बैंगलुरु बोलने लगे हैं । साफ सुथरा, आई-टी के लिए मशहूर बडÞे-भव्य आलिशान मँल । लेकिन ‘इस्काँन’ ने सारी थकान दूर कर दी । लगा जैसे कृष्ण भगवान धरती पर खुद उतर आए हैं । बैंगलोर के होटल में आसाम से आए नेपाली मिले । दिल को कुछ सकून मिला, राहत मिली । लेकिन होटल के महंगेपन ने कमर तोडÞ दी । सचमुच महंगाई बेवफा औरत की तरह होती है । वैसे मर्द भी कम बेवफा नहीं होते ।
चन्दन और सुगंध के लिए मशहूर मैसूर में पता चला-महिषासुर से ही ‘मैसूर’ बन गया है । तो क्या वहाँ के राजा महाराज ही महिषासुर थे – इस बारे में कुछ गाइड से पूछा भी । लेकिन कोई भी संतोषजनक जवाव दे न सका । बडÞे-बडÞे आलीशान दरबार दिखे । जिसे सरकार ने सस्ते में हडÞप लिया और यात्रियों को लुभाने के लिए पुरानी चीजों को सजाकर रख दिया । कभी-कभी तो लगता है, पर्यटक सचमुच वेवकूफ होते हैं । महाराजाओं का कारवां तो गुजर गया, हम गुबार देखते रहे ।
हिन्दुस्तान ने बेशक तरक्की की है, मैं उस तरक्की को सलाम करता हूँ । मगर तरक्की का मजा सिर्फमुठ्ठीभर लोगों की मुठ्ठी में कैद है । रेल-यात्रा में दोनांे तरफ की हरियाली देख कर, फसलों की बहार देख कर यकीं करना पडÞता है- हिन्दुस्तान ने बडÞी लम्बी छलांग मारी है । फिर भी कभी-कभी मनखट्टा हो जाता है, जब दिल दिमाग को झकझोरने वाले नजारे दिख पडÞते हैं । एक ऐसा ही वाकया पेश आया ।
रेल के डब्बे में भीडÞ ऐसी कि साँस लेना भी मुश्किल, खैर हम लोग तो आरक्षित सीट वाले थे । मुझे लघुशंका की हाजत महसूस हर्ुइ । लेकिन शौचालय तक पैदल जाना मुझे लगभग नामुमकिन लगा । फिर भी हिम्मते मर्दा मदते खुदा को याद कर शौचालय तक की यात्रा तय करने के लिए मैं वीरतापर्ूवक उठ खडÞा हुआ । जहाँ तील रखने की जगह न हो वहाँ पैर रख पाना क्या मुमकिन है – ‘एक्सक्युज मी’ भैया जरा बचके’, ‘बहन जी जेरा हटके’ कहते हुए बमुश्किल में शौचालय के द्वार तक पहुँचा । जिस शौचालय का हम लोग दिन भर आराम से इस्तमाल कर रहे थे । पता नहीं रात में वह शौचालय कहाँ चला गया ।
मुझे लगा सचमुच भारत ने टेक्नोलाँजी में शानदार तरक्की की है । हो सकता है, शौचालय को किसी दूसरे बोगी में जोड दिया हो, जहाँ हाजतम­न्द ज्यादा हों । एक बुजर्ुग से पूछा, जनाव यहाँ का शौचालय कहाँ चला गया – क्या उसे भी पाखाने की हाजत लग गई । इधर तो कहीं नजर नहीं आ रहा ।
बुजर्ुग ने अपनी मेंहदी रची दाढÞी को सहलाते हुए फरमाया, आईए मेरे पीछे-पीछे मैं आप को दिखाता हूँ, गुसलखाना कहाँ है । मैं उनके पीछे हो लिया । बडÞे जदद्हो जहद के बाद हम दोनों बुजर्ुग एक इन्सानी दीवार के सामने हाजिर हुए । चट्टान की तरह खडÞे लोगों को बुजर्ुग ने समझाया, जरा आप लोग हट जाईए, इन्हें शौचालय में घुसने दें ।
कुछ देर तक तो लोगों ने अनुसनी की । फिर बडÞी मजबूरी के साथ उन्होंने रास्ता दिया । अजीव नजारा था । शौचालय के अन्दर अच्छे-अच्छे सफेद पोश लोग खडÞे थे ।
शेष ५४ पेज में
यह दिलकश नजारा देख कर मुझे रोना आ गया । मैंने हाथ पैर जोडÞ कर विनती की, आप हजरात सिर्फदो मिनट के लिए शौचालय से वाहर आ जाईए, मैं दो मिनट बाद में शौचालय आप हजरात को सही सलामत लौटा दूंगा । खुदा की कसम कोई बेइमानी नहीं होगी ।
उन लोगों ने मेरी बात मान ली । मैं शौचालय में कूद पडÞा । फारिग हो कर निकलते ही, शौचालय फिर अदृश्य हो गया ।
वह आनन-फानन में इन्सानी दीवार में तब्दील हो गया । शौचालय का कहीं नामोनिशां नहीं । मुझे कहना पडÞा, तरक्की तो हर्ुइ है, मगर ढंग से नहीं । रेल्वे इस लाइन में गाडिÞयों की संख्या कुछ बढÞा देता तो क्या बिगडÞ जाता ।
इसकी एक उलट तस्वीर पर भी गौर फरमाईए । नई दिल्ली की झोपडÞ पट्टयिों में ‘सोलार’ के डिश लगे हुए थे । गरीब भी मजे में जी रहे थे । खैर …. । विकास बिल्कुल नहीं हुआ, ऐसा कैसे कह सकते हैं !
कन्याकुमारी के एक होटल में एक नेपाली चेहरा देखने को मिला । नेपाली में बातचीत हर्ुइ । वह महोत्तरी जिले का था । मैंने कहा, मेरी शादी उधर हर्ुइ है, तूँ मेरा साला हुआ ना ! उसने मुस्कुराते हुए उदारतापर्ूवक सब्जी मेरी थाली में डÞाली ।
मैंने एक कहावत सुनी थी- जहाँ न पहुँचे गाडÞी, वहाँ पहुँचे मारवाडÞी । इसी कहावत की तर्ज में मैंने एक नई कहावत बना डाली-
देखो-देखो नेपाल की कंगाली
हर होटल में प्लेट साफ करता नेपाली ।
बडÞी तसल्ली होती है, यह जानकर कि किसी मामले में तो नेपाली लोग आगे है । भले ही वह औरों की जूठन साफ करना क्यों न हो । मैंने सुना है, यूरोप, अमेरिका, अस्ट्रेलिया आदि देशों में हमारे अच्छे-अच्छे नेपाली, शौचालय की सफाई करते हैं । नेपाली किसी कार्य को छोटा नहीं समझते । कितने महान होते है । नेपाली कैसे उच्च विचार के होते हैं । रामेश्वरम्, कन्याकुमारी और जगन्नाथ पुरी में समन्दर के नजारे ने दिल मोह लिया । काश, नेपाल का भी कोई समुद्री किनारा होता तो इसके नसीब बदल जाते । हाँ, वहाँ एक होटल में लिखा था, ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं । अच्छे बुरे लोग तो हर जगह होते हैं । जगह-जगह में भगवान की बटरिङ करते हुए, गांठ और वक्त दोनों गंवा कर, जान बची लाखों पाए, लौट कर बुद्धू घर को आए ।
-पाठकों को विशेष सलाह, तर्ीथयात्रा पर निकलने से पहले कम-स-कम सौ बार जरुर सोच लें । इतना ज्यादा भी न सोचें कि आप की अवस्था ही सोचनीय हो जाए । )

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