तानाशाही नहीं सहमति की अपेक्षा

s-3श्वेता दीप्ति ,काठमाण्डू,२० जनबरी । बीती रात जो कुछ हुआ उसे हम लज्जास्पद कह लें, दुर्भाग्यपूर्ण कह लें, शर्मनाक कह लें या नैतिकता विपरीत कह लें किन्तु अगर यह नहीं होता तो क्या होता ? सोचने वाली बात यह भी है । यह सच है कि जो हुआ वह गलत था किन्तु बात यह भी तो है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को लाने की जिम्मेदारी किसकी है ? प्रक्रिया के नाम पर जो होने वाला था या फिर जो जबरदस्ती जनता के ऊपर लादा जाने वाला था क्या वो सही था ? जिनकी बात नहीं सुनी जाती वो तनाव में ऐसा ही कुछ कर गुजरते हैं जो निसन्देह सही नहीं है किन्तु वस्तुस्थिति को देखिए तो उनके पास कोई चारा भी नहीं था । विश्व इतिहास में यह कोई नई घटना नहीं है ऐसा होता आया है । इसलिए इसपर ज्यादा हाय तौबा करने की जगह यह सोचने की आवश्यकता है कि आगे क्या होने वाला है या क्या किया जाना चाहिए ? इतने विरोध के बाद भी सम्माननीय ओली जी के तेवर में कोई परिवत्र्तन नहीं आया है ऐसे में ऐसी घटनाओं का होना कोई अचम्भित करने वाली घटना नहीं है । हाँ जगह गलत थी क्योंकि संसद एक पवित्र स्थल होता है, वहाँ यह नहीं होना चाहिए था, पर जब वहीं इतनी अपवित्र आत्माओं का वास हो तो किया क्या जा सकता है । इतिहास की पुनरावृत्ति ना हो इस बात को अगर अभी भी सरकार नहीं समझी तो देश में जो आग सुलगेगी उसे बुझाना मुश्किल हो जाएगा । सत्तामद को त्याग कर जनता की भावना को अंगीकार करना होगा क्योंकि हालात बदल चुके हैं । तानाशाही से किसी को दबाने की कोशिश अब सहन होने की स्थिति में नहीं है इस सच को सत्तापक्ष को समझना होगा ।

 

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