ताबडतोड भ्रमण किस काम का :-
श्रीमन नारायण

पा“च दर्जन चिनियों अधिकारियों के साथ चीन की कम्यूनिष्टपार्टी नेता झु योङकाङ पिछले महिने काठमाडौं आए। नेपाल के इतिहास में इतना बडा जम्बो टोली लेकर कभी कोई विदेशी प्रतिनिधि मण्डल नेपाल नहीं आया। झु ने नेपाल यात्रा के दौरान देश के तीनों बडे दल के नेताओं के साथ लम्बी बातचीत की और राजनीतिक दिलचस्पी दिखाई। मधेशवादियों से भी उनकी मुलाकात हर्इ। उनके नेपाल भ्रमण के दौरान ३ अरब ५४ करोडÞ नेपाली रुपये के सहयोग समझौता पर दस्तखत भी हुए। नेपाल पुलिस ने भी उनके लिए मनमाफिक तोहफे का इन्तजाम किया था। तिब्बत की सीमा पार करके नेपाल में प्रवेश कर रहे ६ तिब्बती शरणार्थियों को गिरफतार किया। चीन को भला इससे बेहतर तोहफा और क्या मिल सकता था –
चिनियां कम्युनिष्ट पार्टी प्रभावशाली सदस्य झु योङकाङ के नेतृत्व में आए प्रतिनिधि मण्डल में तीन मन्त्री, चार उपमन्त्री सहित विभिन्न क्षेत्र के उच्च अधिकारी शामिल थे। नेपाल में एक सरकार के पतन होने के बाद दूसरी सरकार बनने की तैयारी चल रही थी। ऐसी परिस्थिति में किसी विदेशी मित्र से आगमन की अपेक्षा नहीं की जाती है परन्तु चीन की ओर से उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व मण्डल का तुफानी दौरा युद्ध स्तर पर हुआ।
हमेशा नेपाल की गतिविधि को नेपाल का आन्तरिक मामला कहने वाला चीन अपने स्वभाव के विपरित झू को नेपाल भेजा। झु ने मुफ्त में सल्लाह भी दे डाला कि नेपाल के राजनीतिक दल राजनीतिक सहमति बनाकर शान्ति प्रक्रिया को अंजाम तक पहुँचाएगे और नया संविधान बनाने में सक्षम होंगे। पर्ूव प्रधानमन्त्री झलनाथ खनाल से मिलकर उन्होंने कहा कि चीन, नेपाल को उच्च प्राथमिकता में रखा है इसलिए मजबूत और विकसित नेपाल ही चीन के लिए सुखद तथ्य होगा। चीन नेपाल को दिलचस्पी के साथ देखता है। यह तो व्यवहार से ही साबित होता है कि नेपाल चीन के प्राथमिकता में है। चीनी नागरिकों को नेपाल भ्रमण के लिए अपने गन्तव्य में नौवे नम्बर रखना और दक्षिण एशिया में पहले नम्बर पर रखना इसी का संकेत है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन तिब्बत के पर्ूवाधार निर्माण, विकास के लिए निवेश, नयी राज्य व्यवस्था, स्थिरता और शान्ति सुरक्षा के लिए ताईवान को भी पीछे छोडÞ पहले नम्बर पर रखा है। चीन का मानना है कि उसके लिए बाहरी खतरा का कारण चीन न होकर नेपाल हो सकता है। इसलिए नेपाल में उनके अधिकारी ताबडÞतोडÞ भ्रमण कर रहे हैं। दक्षिण एशिया के बडÞे बाजार भारत चीन को चाहिए। अतः वह नेपाल को दोनों देशों के बीच का ट्रान्जिंट प्वाइंट बनाना चाहता है।
पाँच महीने पहले चीनी जनसेना के प्रमुख विङदे के नेतृत्व में एक सैनिक प्रतिनिधि मण्डल नेपाल आया। उनके नेपाल भ्रमण के दौरान एक अरब ३८ करोडÞ नेपाली रुपये के सहयोग पर हस्ताक्षर हुआ। विङदे सैन्य से कहीं अधिक राजनीतिक सन्देश देने में व्यस्त दिखे। इसबार सुरक्षा मामला और शान्ति सुरक्षा का व्यवस्थापन देखने के लिए झू आए। नेपाल प्रहरी को ग्यारह करोडÞ रुपये का सहयोग देने पर समझौता हुआ।
बिजिंग पेट्रोलियम इन्स्िटच्यूट से जियो फिजिकल र्सर्भे तथा एक्सप्लोरेसन में इन्जिनियरिङ की पढर्Þाई पूरी कर चुके झू सीपीसी के पोलिट व्यूरो में नौवें नम्बर का सदस्य है। प्रधानमन्त्री जियाङ जेमिन की भतिजी से इनकी शादी हर्ुइ है। सन् २००६ से ही राजनीति तथा कानुन के सचिव है। इसकी जिम्मेवारी काफी महत्वपर्ूण्ा है। सरल शब्दों में कहा जाय तो झू चीन के उपप्रधानमन्त्री और कानुन तथा गृहमन्त्री का हैसियत रखते हैं। सन् २००७ तक चीन के इतिहास का सबसे अधिकार सम्पन्न र्सार्वजनिक सुरक्षा मन्त्री भी हुए। तिब्बती मामलों के ये उच्च अधिकारी है।
चीन को नेपाल के पहाडÞी क्षेत्र से नहीं तर्राई से डर है। समग्र मधेश एक प्रदेश होने के बाद मधेश में उसे पाँव पसारने का मौका नहीं मिलेगा लिहाजा वह लुम्बिनी के जरिए भारत सीमा के करीब तक पहुँचना चाहता है। तर्राई में वह अपना सशक्त उपस्थिति बनना चाहता है। धरान, बुटवल, विर्तामोडÞ, वीरगंज, नेपालगन्ज आदि स्थानों पर चाईना स्टडी सेन्टर का स्थापना कर एवं नेपाल चीन मैत्री संघ का शाखा खोलकर अपनी गतिविधि बढÞा रहा है। फिर भी वह सन्तुष्ट नहीं है।
चीन ने किमाथाङका-जोगबनी, केरुङ-रक्सौल, चामे बेसी शहर-रक्सौल, लोमान्थाङ-सुनौली, ताक्लाकोट-अतरिया, महेन्द्रनगर के उत्तर दक्षिण रेल मार्ग से जोडÞकर भारत के भन्सार तक पहुँचने का लक्ष्य बना रखा है। नेपाल में चीन ने उद्योग के जरिए भी अपना हस्तक्षेप काफी हद तक बढÞाया है। कहना न होगा कि नेपाल में चीन के निवेश का मूल आशय राजनीतिक एवं सामरिक है। वैसे चीन की ओर से अब तक नेपाल में सात अरब से कुछ अधिक निवेश हुए हैं और चार सौ से अधिक व्यवसायी ने अनुमति लिया है। वहीं भारत ने अब तक ३२ अरब से अधिक निवेश किया है और पाँच सौ व्यापारियों ने कारोबार सञ्चालन के लिए अनुमति लिया है। लेकिन निकट भविष्य में ही चीन, भारत से आगे निकल जाएगा। निकट भविष्य में ही चीन से तीन दर्जन इन्जिनियर एवं विशेषज्ञों का एक दल भी नेपाल आ रहा है, जो रिंगरोड के निर्माण एवं सुधार के लिए अध्ययन करेगी।
नेपाल के गृह सचिव के नेतृत्व में तिब्बत के सिमा से जुडेÞ ताप्लेजुङ, संखुवासभा, सोलुखुम्बु, सिन्धुपाल्चोक, दोलखा, मनाङ, मुस्ताङ, हुम्ला, खोटाङ, आदि ग्यारह जिल्लों के प्रहरी एवं प्रशासन के प्रमुखो ने हाल ही में चीन का भ्रमण किया। यह भ्रमण मुख्यतः चीन के स्वार्थ से जुडÞा था। मसलन तिब्बती शरणार्थियों को तिब्ब्त से बाहर नहीं जाने दिया जाय और उन्हें वापस चीन भेज दिया जाय। चीन विरोधी गतिविधि पर पैनी नजर रखी जाए। नेपाल और तिब्बत प्रशासन के बीच ३ किलोमिटर तक दोनों देश के नागरिकों आवागमन करने देने की अनुमति देने की बात पर सहमति पहले ही हो चुकी है। परन्तु चीन ऐसा नहीं होने दे रहा है। ऐसा शिकायत नेपाल के स्थानीय लोगों का है। उत्तरी सीमा से जुडÞे नेपाली क्षेत्र के स्थानीय जनता स्थानीय चीनी सैनिकों से हमेशा अपमानित एवं प्रताडिÞत होते रहते हैं।
नेपाल में चीन का एकसूत्री योजना है। किसी भी तरह इसको अपने पक्ष में करना और उसके बाद दक्षिण एशिया कें बाँकी देशों पर प्रभाव बढÞाना। झू योंगकांग के नेपाल भ्रमण सें पर्ूव सन् २००३ में किसी उच्च चीनी अधिकारी का नेपाल दौरा हुआ था। वैसे सन २००६ में जियाङ गाउली के नेतृत्व में भी २५ सदस्यीय एक टिम नेपाल आयी थी। गाउली भी सीपीसी के पालिटव्यूरो सदस्य एवं तियानजीन नगर कमिटी के सचिव थे। अनवरत रुप से चीनी अधिकारी का नेपाल भ्रमण स्पष्टतः नेपाल में चीन के बढÞते गहरी दिलचस्पी एवं हस्तक्षेप का परिणाम है।
लुम्बिनी का विवाद स्पष्ट हो चुका है। अब माओवादी सुप्रीमो यह कहते हैं कि लुम्बिनी विकास के नाम पर होने वाले खर्च नेपाल की सरकार ही करेगी जबकि पर्ूव विदेशमन्त्री कहते है कि युनिडो और एपेक के बीच में ऐसा कोई समझौता ही नहीं हुआ। यूनिडो ने भी इसका खण्डन किया है और कहा है कि एपेक का साथ उसका समझौता ही नहीं हुआ। चीनी अधिकारियों का नेपाल भ्रमण नेपाल में चीन के बढÞते हस्तक्षेप का नतिजा है।

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