तारीख पे तारीख

पंकज दास:पिछले दिनों राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव सहमतीय सरकार गठन के लिए तीन बार तक का समय दे चुके हैं । पहले दो बार उन्होंने ७-७ दिनों का समय दिया, जबकि तीसरी बार में ६ दिनों की मोहलत दी । यह जानते हुए कि सभी प्रमुख दल अपनी-अपनी मांग पर अड हुए है और सहमति करना तो दूर एक दूसरे का अस्तित्व भी स्वीकर करने को तैयार नहीं है लेकिन इस आशा में कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमति बन जाए जो कि असंभव दिखता है ।
राजनीतिक दलों के द्वारा बार-बार सहमति के लिए समय सीमा की मांग करना और राष्ट्रपति के द्वारा बार-बार समय देने से अन्तरिक संविधान में रही सहमति के प्रावधान का मजाक बन कर रह गया है । ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है । इससे पहले भी हर प्रधानमन्त्री के चयन से पहले यह तमाशा जनता देखती आ रही है । देश की राजनीति में जरा भी दिलचस्पी रखने वाले आम आदमी को भी यह अच्छी तरह से पता है कि दलों के बीच सहमति से सरकार का गठन हो पाना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन है । लेकिन पता नहीं क्यों राष्ट्रपति को यह बात समझ में नहीं आती ।
संविधान सभा भंग होने के बाद से ही राष्ट्रपति किसी न किसी तरह से संदेह और विवादों से घिरते नजर आ रहे हैं । भले ही दौरा-सुरुवाल और ढाका टोपी पहन कर व खुद को पहाडÞी राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते हों लेकिन कई हरकत से उनके कई फैसले से और उनके कई आचरण से यह साबित हो जाता है कि राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव के भीतर का कांग्रेस प्रेम, कोइराला प्रेम कहीं न कहीं छुपा हुआ है । और कांग्रेस के प्रति अपनी वफादारिता को साबित करने के लिए वे किस तरह की राजनीति कर रहे हैं, यह अब किसी से छुपा नहीं है ।
राष्ट्रपति को यह लगता है कि कैसे कोइराला को प्रधानमन्त्री बनाकरअपना ऋण उतार दें । इसके लिए उन्होंने कई चालें चलीं । संविधानसभा भंग होने के तुरंत बाद निर्वाचन संबंधी अध्यादेश को रोककरतो कभी वर्तमान सरकार को कामचलाऊ बताकर कभी दलों को पुनर्स्थापना की बात कहकर तो कभी चुनाव में जाने का निर्देशात्मक सुझाव देकर । यानी कि डा. यादव की एक मात्र प्राथमिकता डा. भट्टर्राई को प्रधानमन्त्री से हटाकर सुशील कोइराला को उस पद पर  बिठाने की रही है ।
वैसे तो इसके लिए तख्तापलट तक का षड्यन्त्र किया जा चुका था लेकिन उन की इस योजना को हिमालिनी के ही पिछले अंक में र्सार्वजनिक किए जाने के बाद उस पर राष्ट्रपति की काफी किरकिरी हर्ुइ थी । हिमालिनी में तख्तापलट की योजना का खुलासा होते ही अपनी सफाई के लिए राष्ट्रपति ने माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड से लेकर प्रधानमन्त्री भट्टर्राई तक तथा कांग्रेस सभापति से लेकर एमाले अध्यक्ष खनाल तक को सफाई देनी पडÞी थी । इसलिए अपनी योजना को नाकाम होने की छटपटाहट के कारण ही बिना कानूनी व संवैधानिक आधार के राष्ट्रपति ने सहमति की सरकार गठन के लिए पहली बार समय सीमा तय की । लेकिन पहले हफ्ते में तो सरकार व सत्तारुढ गठबन्धन ने राष्ट्रपति के इस आहृवान को ही चुनौती दे दी थी । मन्त्रिपरि षद् की बैठक ने तो बाकायदा प्रस्ताव परित कर  र ाष्ट्रपति के ही इस आहृवान को असंवैधानिक करार देते हुए राष्ट्रपति के आहृवान को स्वीकार नहीं किए जानेका निर्ण्र्ााकर लिया ।
फिर  दूसर ी बार  समय सीमा दी गई तो सुशील कोइर ाला को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार  घोषित कर  दिया । दर असल माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के बुने चक्रव्यूह में कांग्रेस पार्टर्ीीmँस गई । और प्रधानमन्त्री बनने की लालसा ने सुशील कोइर ाला को महज एक मजाक बनाकर  र ख दिया । वैसे तो एकीकृत माओवादी, मधेशी मोर्चा व सत्तारुढ गठबन्धन सभी ने ना जाने कितनी बार  यह स् पष्ट कर  दिया था कि कांग्रेस व एमाले को किसी भी हालत में सत्ता का नेतृत्व नहीं दिया जाएगा । फिर  भी कोइर ाला ने अपनी उम्मेदवार ी घोषित कर  अपनी ही जगहंर्साई कर ा ली ।
उधर  र ाष्ट्रपति भी प्रचण्ड के चक्रव्यूह में फँसे दिखते हैं । जब दो बार  की समय सीमा तय होने के बाद सहमति नहीं हो पाई तो अकेले प्रचण्ड ने जाकर  ६ दिन की और  मोहलत ले ली । जबकि कोइर ाला को प्रधानमन्त्री नहीं बनाए जाने की बात स् पष्ट होते हुए कांग्रेस-एमाले ने आन्दोलन में ही जाने की चेतावनी दी थी । लेकिन र ाष्ट्रपति प्रचण्ड के झूठे आश्वासन के बाद सहमतीय सर कार  बनाने की तार ीख पे तार ीख दिए जा र हे हैं ।
सिर्फसहमतीय सर कार  बनाने पर  जोडÞ देने वाले र ाष्ट्रपति को अब सीधे संविधान सभा चुनाव में जाने के लिए विपक्षी दलों पर  दबाव देना चाहिए । जितना प्रयास वो सर कार  परिर् वर्तन के लिए कर  र हे हैं, उतना प्रयास यदि चुनाव के लिए हो और  उसके लिए कांग्रेस-एमाले को मानने का काम हो तो देश में वैशाख या जेष्ठ में चुनाव हो सकता है । लेकिन संविधान की धार ा का उल्लेख कर  सहमतीय सर कार  या फिर  कांग्रेसी नेतृत्व के सर कार  बनाने के काम को तबब्जो देंगे तो ना सर कार  ही परिर् वर्तन होगी और  ना ही संविधान सभा का चुनाव ही हो पाएगा । इसलिए सिर्फतार ीख पे तार ीख, तार ीख पे तार ीख देने से नहीं बल्कि उन तार ीखों पर  अमल किए जाने की जरूर त है ।

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