तालेबान से लोहा लेने वाली को गोली मारी

BBC Hindi:पाकिस्तान में मंगलवार को तालिबान के हमले में घायल बच्ची मलाला यूसुफजई की सलामती के लिए देश भर में दुआओं का दौर जारी है.

मलाला युसुफ़ज़ई ने स्वात घाटी में तालिबान के साये में ज़िंदगी के बारे में बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखी.

शुक्रवार को देश भर में विशेष प्रार्थना का आयोजन किया गया है. पाकिस्तान के तमाम सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने सभी लोगों से इसमें शामिल होने की अपील की है.

शुक्रवार को सभी सरकारी दफ्तरों और शैक्षणिक संस्थानों में दिन के 12 बजे एक मिनट का मौन रखा जाएगा.

मलाला के समर्थन में पाकिस्तान में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं और लड़कियाँ भी खुल कर मलाला पर हमले का विरोध कर रही हैं.

गुरुवार को पाकिस्तान की नेशनल एंसेबली ने भी सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया और इस हमले की निंदा की थी.

प्रस्ताव में कहा गया कि मलाला और अन्य घायल लड़कियों के इलाज का खर्च सरकार उठाए.

स्वास्थ्य की चिंता

पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने बताया है कि ख़ैबर पख़्तूनख्वाह के आईजी को कहा गया है कि वो मलाला की परिवार को सुरक्षा मुहैया करवाएं और अगर ज़रूरत पड़े तो इलाज के लिए उसे विदेश भेजा जाए.

इस बीच, गुरुवार को भी देश भर में मलाला के समर्थन में रैलियां निकाली गईं और मलाला के जल्द ठीक होने की दुआ की गई.

“जिन लोगों ने मलाला पर हमला किया है वो न तो मुसलमान हैं और न ही पाकिस्तानी.”

शागुफ्ता, यंग नर्सेस एसोसिएशन की पदाधिकारी

मुल्तान में यंग नर्सेज एसोसिएशन ने गुरुवार को मलाला के समर्थन में कैंडल मार्च निकाला. इन लोगों ने मलाला के जल्द ठीक होने के लिए दुआ की.

इस दौरान एसोसिएशन की पदाधिकारी शागुफ्ता ने कहा कि जिन लोगों ने मलाला पर हमला किया है वो न तो मुसलमान हैं और न ही पाकिस्तानी.

इस बीच, मलाला अब भी अस्पताल में है और उसकी हालत नाजुक बनी हुई है.

गुरुवार को उसे पेशावर से रावलपिंडी के सैन्य अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया था.

लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करने वाली 14 वर्षीया लड़की मलाला यूसुफजई को मंगलवार को गोली मार दी गई थी. तालिबान ने इसकी जिम्मेदारी ली है.

कौन है मलाला?

मलाला की दास्तां दिखाती है कि उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान के जाने के बाद भी, एक 14 वर्षीय लड़की की ज़िन्दगी कितने खौफ, दर्द और कठिनाईयों से भरी है.

खुशहाल स्कूल में पढ़ने वाली मलाला भी अपने इलाके की और लड़कियों की तरह बचपन की आम खुशियों की बाट जोहती रहती थी और मिल जाएं तो सहेज कर रखती थी. लेकिन मलाला अलग निकलीं, क्योंकि उन्होंने साहस और संघर्ष का रास्ता चुना.

मलाला पहली बार सुर्खियों में वर्ष 2009 में आईं जब 11 साल की उम्र में उन्होंने तालिबान के साए में ज़िंदगी के बारे में गुल मकाई नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखना शुरु किया.

वो डायरी किसी भी बाहरी इंसान के लिए स्वात इलाके और उसमें रह रहे बच्चों की कठिन परिस्थितियों को समझने का बेहतरीन आइना है.

इसके लिए मलाला को वीरता के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला और वर्ष 2011 में बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया.

तालिबान के खौफ़ में

पाकिस्तान की स्वात घाटी में लंबे समय तक तालिबान चरमपंथियों को दबदबा था लेकिन पिछले साल सेना ने तालिबान को वहां से निकाल फेंका.

पिछले साल बीबीसी से बातचीत में मलाला ने बताया कि तालिबान के आने से पहले स्वात घाटी एकदम खुशहाल ती, लेकिन तालिबान ने आकर वहां लड़कियों के करीब 400 स्कूल बंद कर दिए.

उस दौर में मलाला ने डायरी में लिखा, “तालिबान लड़कियों के चेहरे पर तेज़ाब फेंक सकते हैं या उनका अपहरण कर सकते हैं, इसलिए उस वक्त हम कुछ लड़कियां वर्दी की जगह सादे कपड़ों में स्कूल जाती थीं ताकि लगे कि हम छात्र नहीं हैं. अपनी किताबें हम शॉल में छुपा लेते थे.”

और फिर कुछ दिन बाद मलाला ने लिखा था, “आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज़्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया. मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी.”

पटरी पर लौटती ज़िन्दगी

मलाला को तालिबान-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष बताते हुए मंगलवार को उन पर पाकिस्तानी तालिबान ने हमला किया.

सेना की कार्रवाई के बाद, स्वात घाटी में स्थिति बदल रही है. नए स्कूल भी बनाए जा रहे हैं. पर मलाला कहती हैं ये सब बहुत जल्दी होने की ज़रूरत है क्योंकि गर्मी में तंबूओं में पढ़ना बहुत मुश्किल है.

हालांकि मलाला इस बात पर चैन की सांस लेती हैं कि कम से कम अब उन जैसी लड़कियों को स्कूल जाने में कोई खौफ नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में मलाला ने कहा कि वो बड़े होकर क़ानून की पढ़ाई कर राजनीति में जाना चाहती हैं. उन्होंने कहा था, “मैंने ऐसे देश का सपना देखा है जहां शिक्षा सर्वोपरि हो.”

साथ ही मलाला याद करती हैं कि तालिबान के दौर में लड़कियां और महिलाएं बाज़ार नहीं जा सकती थीं, “तालिबान को क्या मालूम कि महिलाएं जहां भी रहें, उन्हें खरीदारी पसंद है.”

वो बताती हैं कि बाज़ार में किसी तालिब से पकड़े जाने पर डांटा जाना या घर लौटा दिया जाना या फिर मारा जाना, ऐसे अनुभव अब भी याद आते हैं तो वो सिहर जाती हैं.

उस दौर में महिलाएं घर से बाहर किस तरह का बुर्का पहनकर जाएं इस पर भी रोकटोक थी, मलाला कहती हैं कि इन छोटी-छोटी पाबंदियों से आज़ादी का अहसास बहुत सुकून देता है.

तालेबान से लोहा लेने वाली को गोली मारी!

 

लड़कियों की शिक्षा के लिए अभियान करने वाली एक 14-वर्षीय पाकिस्तानी किशोरी को देश के उत्तर-पश्चिम में स्वात घाटी में गोली मारी गई है और वो घायल हैं.

मलाला युसुफ़ज़ई पर क्षेत्र के मुख्य शहर मिंगोरा में हमला तब हुआ जब वो स्कूल से घर वापस लौट रही थी.

वे पहली बार सुर्खियों में वर्ष 2009 में आईं जब 11 साल की उम्र में उन्होंने तालेबान के साये में ज़िंदगी के बारे में बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखना शुरु किया. इसके लिए उन्हें वर्ष 2011 में बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था.

पाकिस्तान की स्वात घाटी में लंबे समय तक तालेबान चरमपंथियों को दबदबा था लेकिन पिछले साल सेना ने तालेबान को वहां से निकाल फेंका.

अभी ये साफ़ नहीं है कि हमले का निशाना मलाला ही थी लेकिन पहले भी उन्हें धमकी दी जा चुकी है. हादसे के समय उनके साथ एक और लड़की थी.

हादसे के बारे में अलग-अलग जानकारी सामने आ रही है. स्थानीय सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि एक दाढ़ीवाले बंदूकधारी ने स्कूली छात्राओं से भरी गाड़ी रोकी, मलाला का नाम लिया और फिर गोली चला दी.

लेकिन एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी उर्दू को बताया कि कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने स्कूली छात्राओं पर उस समय गोली चलाई जब वे बस में चढ़ने वाली थीं.

हिम्मत की मिसाल

शुरुआती ख़बरों के मुताबिक मलाला को सिर या गरदन में गोली लगी लेकिन अब वो अस्पताल में हैं और ख़तरे से बाहर है. हादसे के समय मलाला के साथ जो लड़की थी वो भी घायल हुई है.

“आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज़्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया. मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी.”

मलाला युसुफ़ज़ई की डायरी के अंश

मलाला सिर्फ़ 11 वर्ष की थीं जब तालेबान ने स्वात घाटी में लड़कियों के स्कूल बंद करने का फ़रमान जारी किया था.

मलाला ने गुल मकाई नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखी जिसमें उन्होंने तालेबान के शासन की वजह से लोगों को हो रही मुसीबतों का खुलासा किया.

उनकी पहचान लोगों के सामने तब आई जब स्वात से तालेबान को खदेड़ा जा चुका था. बाद में उन्हें वीरता के लिए राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला और वो बच्चों के एक अंतरराष्ट्रीय शांति पुरुस्कार के लिए नामांकित की गईं.

‘जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी’

पिछले साल बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि लड़कियां डरती थीं कि “तालेबान उनके चेहरे पर तेज़ाब फेंक सकते हैं या उनका अपहरण कर सकते हैं.”

मलाला ने बताया था, “इसलिए उस वक्त हम कुछ लड़कियां वर्दी की जगह सादे कपड़ों में स्कूल जाती थीं ताकि लगे कि हम छात्र नहीं हैं. अपनी किताबें हम शॉल में छुपा लेते थे.”

तालेबान के लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने के बारे में मलाला की डायरी का एक हृदयस्पर्शी अंश कुछ इस प्रकार है: “आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज़्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया. मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी.”

बड़े होकर मलाला क़ानून की पढ़ाई करने और राजनीति में जाना चाहती हैं. उन्होंने कहा था, “मैंने ऐसे देश का सपना देखा है जहां शिक्षा सर्वोपरि हो.”

 

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