तीन तलाक पर प्रतिबन्ध शताब्दी का सर्वोच्च सामाजिक सुधार : डा.श्वेता दीप्ति


डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू | वक्त बदल रहा है । पर हमारे ही समाज में कई समुदाय ऐसे हैं जो परिवर्तन को स्वीकार नहीं करना चाहते खास कर महिलाओं के मामले में और अक्सर उन पर धर्म और परम्पराओं की तलवार लटका कर ऐसा खौफ पैदा करते हैं कि स्वयं महिलाएँ उनसे बाहर नहीं निकलना चाहती । धर्म का सम्मान एक अलग विषय है और उसका भय दिखा कर आपकी स्वतंत्रता का हनन एक दूसरा विषय है । चाहे वो हिन्दु समाज हो या मुस्लिम समाज औरतों का एक वर्ग हमेशा धर्म और परम्परा के नाम पर शिकार होती आई हैं । हर समुदाय में धर्म एक महत्तवपूर्ण मुद्दा होता है । सभी अपने धर्म का सम्मान करते हैं और उसके पक्ष में खडे होते हैं । पर जब भी मुस्लिम धर्म की बात होती है तो यहाँ लोग खुलकर कुछ नहीं बोलना चाहते चाहे वो मुस्लिम समुदाय के लोग हों या फिर किसी अन्य समुदाय के । हिन्दु धर्म की कई कमियों पर धडल्ले से मत व्यक्त किए जाते हैं और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी होते आए हैं । किन्तु मुस्लिम धर्म आज तक पुरुषवर्ग में सीमित रहा है । नेपाल में आज भी मुस्लिम महिलाएँ घरों की चारदिवारी में ही सीमित हैं । उनकी शिक्षा महज मदरसों तक ही मानी जाती है । सौ में दस प्रतिशत महिलाएँ ही हैं जो आगे हैं बाकी नब्बे प्रतिशत अाज भी पिछडी हुई हैं। कुछ महीनों पहले मैं गौर गई थी वहाँ एक मुशायरे का आयोजन था । इसका सुखद पहलु यह था कि इस आयोजन में काफी संख्या में मुस्लिम महिलाएँ श्रोता थीं और सारी रात उन्होंने इसका आनन्द लिया पर इस यात्रा में एक कटु अनुभव यह रहा कि एक मुस्लिम मित्र के यहाँ रात्रि भोजन में हम कुछ लोगों को आमंत्रित किया गया था । पर वहाँ जो मुझे अच्छा नहीं लगा वो यह था कि हमारे सामने घर की कोई महिला नहीं आईं । बाहर खाने की व्यवस्था थी । खाना बहुत ही स्वादिष्ट था पर जिन्होंने इसे तैयार किया था उनसे मैं नहीं मिल पाई । गौरतलब बात यह कि वह घर एक डाक्टर का घर था । पर्दा व्यवस्था का यह कौन सा नमूना था ? यह सिर्फ एक उदाहरण है पर यही हमारा समाज है । ऐसे ही एक अनुभव से मैं उस वक्त गुजरी जब कालेज में पढा करती थी और हर शानिवार को हमें एनएसएस की ओर से पिछडे महल्ले में ले जाया करता था । इसी दौरान एक मुस्लिम महल्ले में जान का अवसर मिला था । वहाँ जब महिलाओं से मेरी बात हुई तो कोई महिला ऐसी नहीं थी जिसके सात आठ बच्चे ना हों । शरीर कमजोर, बच्चे कुपोषण का शिकार पर बच्चों की पैदाइश पर रोक नहीं लगाने की परम्परा से जुझता वो समाज । मैंने उनसे कहा कि आप लोग परिवार नियोजन नहीं कराती ? तो उनका जवाब था यह सब अल्लाताला की मेहर है । अगर हमने इसे रोका तो हमारे जनाजे पर नमाज नहीं पढे जाएँगे । यानि धर्म का भय । अशिक्षा, गरीबी से जूझती उन महिलाओं का नजरिया था यह जो कितना सही है या कितना गलत मैं यह नहीं समझ पाई थी । पर आज वक्त बहुत बदल चुका है । सुधार भी हुए होंगे पर इसका अनुपात आज भी कम है । भारत में हुए इस ऐतिहासिक निर्णय ने नेपाल के लिए भी सोचने पर बाध्य कर दिया है ।
यहाँ भी कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जब पति ने फोन पर ही तलाक सुना दिया है ।
आज भारत में १४०० वर्ष बाद तीन तलाक पर जो फैसला आया है वह निश्चय ही मुस्लिम महिलाओं के लिए जीवनदान है । जिस डर के साए में उनकी जिन्दगी गुजर रही थी उससे मुक्ति मिली है । यह तो तय है कि कट्टरपंथियों को यह नागवार गुजर रहा होगा क्योंकि उनके वर्चस्व में सेंध लग गई है । परन्तु भारत का यह फैसला
शताब्दी का सर्वोच्च सामाजिक सुधार है। हजार वर्षों की ‘तलाक़ तलाक़ तलाक़’ की निर्दयी बेड़ियों जंजीरों को तोड़ना बहुत ही कठिन था। पति के, पत्नी पर ‘एक तरफ़ा’ फरमान सुनाने के अत्याचार की दारुण दुख भरी कहानी का ऐसा सुखद अंत तो असंभव ही लग रहा था।
क्योंकि इस महिला विरोधी, बल्कि मानवता को कुचलने वाले पाप को धार्मिक ढाल से बचाया जा रहा था। इस सामाजिक कुप्रथा को संवैधानिक संरक्षण से जोड़कर रखा गया था । इस अपराध को कानूनी कवच से सुरक्षित रखा जा रहा था।

किन्तु, लम्बे और पीड़ादायक संघर्ष के बाद ही सही, त्वरित ट्रिपल तलाक़ कहने से शादी तोड़ देने की मनगढ़ंत परम्परा एक झटके में टुकड़े टुकड़े हो गई।
बुराई के इस वीभत्स रूप के अंत के कारण अच्छाई के एक उजले, भावुक और महिलाओं की गरिमा बढ़ाने वाले आरम्भ का श्रेय मुस्लिम महिलाओं को ही है।
आज सुप्रीम कोर्ट यदि इतना शक्तिशाली आदेश जारी कर सका है, तो इसके मूल में वे प्रताड़ित मुस्लिम महिलाएं ही हैं ( जिन्होंने परिवार टूटने के बाद भी खुद को बिखरने नहीं दिया। कोर्ट पहुंच गईं। उनकी ताकत वे माता पिता भाई बहन और बच्चे बने ( जिन्होंने समाज के उलाहनों, चारों ओर से मिलने वाले अपमान, अंधेर और अभावों को हौसलों से रौंद दिया। एकजुट होकर लड़े।

सुप्रीम कोर्ट ने कुरान ए पाक की तलाक़ संबंधी सूरा और आयतों का विस्तार से जि़क्र किया है। एक एक पंक्ति से समझाया है कि किस तरह कुरान महिलाओं के हक ओ हकूक और इज्ज़त का सबक देता है। सुन्नत जो हदीस में दर्ज पैग़म्बर का आचरण है भी ऐसे भावावेश में दिए तलाक़ को नहीं मानता। न ही इज़्मा जो आम सहमति से बनी प्रथाओं का दस्तावेज़ है। १९३७ में ब्रिटिश राज में बने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लिकेशन एक्ट की ब्रिटिश जजों द्वारा की गई ग़लत व्याख्याओं के कारण ही यह आज तक बना हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट का यह ३९५ पन्नों में लिखा फैसला नहीं बल्कि ‘न्याय’ है। जो संविधान और कानून की प्रतिष्ठा बढ़ाता है। आज क्या इसी परिवर्तन की आवश्यकता नेपाल को नहीं है ?

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