तीन बुँदे का क्या कारण है मधेसी जनता सवाल पुछ रही है : राजनीतिक विश्लेषकों की राय

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काठमांडू, १६ अगस्त |तीन बुँदे सहमति पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय
सरकार में सहभागी मधेसी दल एवम् सरकार के बीच हुई तीन बुँदे सहमति तथा उनके कार्यनीति के उपर राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा : अभी ही मूल्यांकन न करें
प्रस्तुतिः विजेता चौधरी

इन को मौका दें, ये कोशिश कर रहें हैं : सीके लाल  (राजनीतिक विश्लेषक)

CK-lalमधेसी नेताओं को बेचारे की संज्ञा देते हुए विश्लेषक लाल कहते हैं–संसद राजनीति समझदारी की राजनीति है । इन पर निगरानी रखें उन्होंने कहा इनको मौका दें ये कोशिश कर रहे हैं । उन्होंने संसदीय संतुलन कायम रखने की अपील भी की ।
लाल ने कहा कि हमारे आन्दोलन में कमी नहीं आनी चाहिए । उन्होंने दल तथा नेताओं को चेतावनी द ी और कहा कि आन्दोल आज भी जारी है । उन्होंने कहा कि अपने नेता भी अगर सत्ता में जाते हैं तो उनकी भी मुर्दावाद कीजिए । लाल ने नेता तथा दल की समझदारी को चौकस बनाते हुए कहा कि जिस दिन आप समझ लेंगे कि आन्दोलन अब गन्तब्य पर पहुँच गया आप उसी दिन हार जाएँगे ।
लाल ने मधेसी जनता से मधेसवादी दलों को एक मौका देने की अपील की ।

३० से ६० दिन का हद–म्याद है इन के पास, अभी ही मूल्यांकन न करें: दीपेन्द्र झा (अधिवक्ता, मानवअधिकारवादी)

Dipendra-Jhaसीमांकन, राष्ट्रीय भाषा, वैवाहिक नागरिकता, समानुपातिक निर्वाचन लगायत की बातें हम संविधान में लिखवा पाते तो मधेसी आन्दोलन की नैतिक जीत होती । बहरहाल वो मौका चूक गए हंै हमलोग ।
अब मोर्चा तथा संघीय गठबन्धन के पास ३० से ६० दिन का हद–म्याद है । दलों के पास अभी खुला मौका है सरकार के साथ डील करने का । मधेस आन्दोलन के मुद्दा को ये लोग कैसे उठाते है तथा प्रचण्ड को टेस्ट करने का समय संविधान में लिखे जाने वाली भाषा से मूल्यांकन होगी, अभी इन के पास हद म्याद है, अभी ही मूल्यांकन न करें ।
सरकार में सहभागी इन दलों के द्वारा डील नही कर पाने के बाद की राजनीति खुली है ।
तीन बुँदों में से बुँदा नं।२ मधेसी मोर्चा तथा संघीय गठबन्धन की जीत ही है । यद्यपि मधेसी युवा को सोच समझ कर गोली मारने वाले पुलिस तथा गृहमन्त्री पर कार्यवाही होती है या नही ये तो अभी देखना बाँकी हैं । बुँदा तीन में मतदान की बातें थीं जो मधेसी नेताओं ने मतदान कर दिया है । बुँदा १, अंक विना का तमसुक लिखा गया है । जिस में अंक ही नहीं है ।
बहरहाल मधेसी जनता अब संसद के विषय में अनभिज्ञ नहीं है । अब अगर संविधान संशोधन व मांगों की सुनवाइ नही हुई तो मधेसी जनता प्रचण्ड के साथ मधेसी नेताओं को भी कठघरा में खडा करेगी ।
यद्यपि ६ विषय में संविधान संशोधन की भाषा के प्रति हम आशावादी हैं । समदूरी की सिद्धान्त के साथ नेताओं को आगे बढना होगा ।

सात बुँदे सहमति नहीं हुई, तीन बुँदे होने का क्या कारण है मधेसी जनता को सवाल करने का पूरा हक है : तुलानारायण शाह (राजनीतिक विश्लेषक)

Tula-narayan-shahतीन बुँदे सहमति होने का कारण, प्रचण्ड के समर्थक होने का कारण, व सात बुँदे सहमति नही होने का क्या कारण था जनता आप से जरुर सवाल करेगी । संसदीय वयवस्था की रक्षा के लिए संसद में वापस गए, क्या संसदीय व्यवस्था बहुदलीय व्यवस्था नहीं रु कि समावेशी व्यवस्था होनी चाहिये इस देश में । हमारा राजनीतिक संस्कार भी अजीब है, १६ बुँदे सहमति में प्रश्न उठाने पर हमारे तराई वासी हो जाते हैं । वहीं तीन बुँदे सहमति पर प्रश्न उठने पर हमारी खिसी की जाति है ।

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