तुमने फिल्म “मधेशी पुत्र” को रोका, मधेश में नेपाली शासन बन्द हो : कैलाश महतो


कैलाश महतो, पराशी | सन् २००० का ऋतिक रोशन काण्ड और सन् २००४ में इराक में हुए बारह नेपालियों की विभत्स हत्या के विरोध में नेपालीयों द्वारा मधेशीयों के उपर फैलाये गये असभ्य उन्माद का नतीजा आज भी मधेश के लिए एक सवालपूर्ण सवक हैं ।

जो आरोप भारतीय सिने कलाकार ऋतिक रोशन पर लगााकर नेपाल ने उत्पात मचाते हुए नेपाली पकड के गाँव तथा शहरों में मधेशियों के उपर विभत्स अत्याचार किया था, उनके घरों पर आक्रमण की गयी थी, उनके दुकान तथा कार्यालयों में आग लगाए गये थे, मधेश आज भी कल्पना करके काँपने लगता है । वही हालात इराकी आततायीयों द्वारा सन् २००४ में बारह नेपालीयों की अक्षम्य हत्या के बाद मधेशी मुसलमानों को भूगतना पडा । उस अकल्पनिय हत्या के बाद नेपाली प्रशासन समेत के संरक्षण तथा उक्साहट में नेपालियों ने मधेशी मुसलमानों के उपर हर जगह भौतिक आक्रमण की गयी । उनके दाह्री पकडकर गालियाँ दी गयी । कितने दाह्रियों में आग लगायी गयी । कितनों पर सांघातिक आक्रमण किया गया । उनके मस्जिदों में आगजनी तक की गयी । और उसका कारण कुछ था नहीं । अगर कुछ था तो सिर्फ और सिर्फ मधेशी होना ।

सन् २००७ के नेपालगञ्ज में घटाए गये मधेशी विरुद्ध के अमानवीय हिंसा, तोडफोड तथा आगजनी में राज्य का प्रत्यक्ष संलग्नता का जो नजारा रहा, मधेश उसे भी अपने यादों के तिजोरी में सम्हालकर रखा है । और किसी का तीता याद पीडकों के लिए कतई खुशी की संकेत नहीं हो सकता ।

सन् २०१५ में राज्य द्वारा सुनियोजित रुप में टीकापुर का घटना घटाकर हजारों मधेशी थारुओं के साथ अन्याय और अत्याचार किया गया । नेपाली सेना, प्रशासन और नेपाली आततायी गुण्डों द्वारा सैकडों मधेशी थारु महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, बालात्कार किया गया । घरों में आग लगायी गयी । थारु के संचार घर को आग लगाने से पहले उसे लुटा गया । मधेशी थारु दिग्गज नेता के साथ साथ दर्जनों निर्दोष मधेशी आज भी नेपाली अत्याचार का शिकार बनकर जेल का जीवन बिता रहे हैं । हजारों लोग अपने घर परिवार को छोडकर निर्वासित जीवन जीने को बाध्य हैं । लाखों बिगहा मधेशी थारुओं की जमीन नेपाली आक्रामकों ने अतिक्रमण कर ली है । जनता के अकल्पनीय मत अन्तर से चुनाव जितने के बावजुद रेशम चौधरी को राज्य और उसके निर्वाचन आयोग ने उन्हें उनका जीत का सर्टिफिकेट न देने के तैयारी में रहे । जो पुलिस प्रशासन खुद अपराधी है, वह जन निर्वाचित रेशम चौधरी को गिरफ्तार करने का धम्की देता रहा ।

नेपाली राज्य ने मधेश को सिर्फ भौतिक रुप में ही नहीं, अपितु मानसिक, आत्मिक, अस्तित्वीय और सांस्कृतिक रुप में भी दोहन की है, कर रही है । मधेश के पहचान, स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान में भी आग लगाने का काम नेपाली शासन ने की है । उसने एकतरफा राष्ट्रवाद का अपना घिनौना महल बनाकर मधेश के राष्ट्रियता को नेपाली राष्ट्र का गुलाम बनाने का दिवास्वप्न देखता रहा है ।

किसी के राष्ट्र तथा राष्ट्रियता को गुमनाम कर उसपर अपना खोखला राष्ट्रवाद लादना किसी भी मायने में कोई राष्ट्रवाद नहीं हो सकता । वैसे भी आज के परिवेश में राष्ट्रवाद का कोई अर्थ होता नहीं है । क्योंकि राष्ट्रवाद का सारा आधार और परिभाषा यूरोपियन सभ्यता के धरासायी होने के साथ ही खत्म हो चुका है । वैसे राष्ट्रवाद कोई वाद ही नहीं होती है । यह शासकों का कमजोर लोगों पर शासन करने का एक अफिम है जो सीधे साधे शासित लोगों को मदहोस करता रहता है । राष्ट्रवाद को तो शासकों ने पूँजीवाद में ढाल दी है । पूँजीवाद को मजबूत करने के लिए शासकों ने व्यतिmवाद का विकास कर ली है, जिससे शासक और पूँजीपति दोनों मिलकर आम लोगों का शोषण और दोहन करते हैं । इस बात की पुष्टि नेपाली लेखक युग पाठक और नेता तथा राजनीतिक विश्लेषक प्रदिप गिरी ने भी की है ।

मधेश नेपालियों का कोई विजित भूमि नहीं है जिसपर नेपाली शासक अपना राष्ट्रवाद का खेती करें । इसका अपना अलग अस्तित्व है जिसे नेपाली विद्वान् राजनीतिज्ञ, लेखक, पत्रकार, वकिल, विश्लेषक तथा इतिहासकारों को सहर्ष स्वीकारना चाहिए । अंग्रेजों के शासनाधिन में रहे भारत व मधेश से जब वे चले जाते हैं तो भारत आजाद हो जाये, और मधेश पराधिन कैसे रह सकता है ? अंग्रेजों ने तो अपने शासनाधिन में रहे मधेश को दो लाख रुपये के बदले में नेपाल को उब्जाकर खाने को दिया था । अंग्रेजों ने जब भारत छोडा तो मधेश स्वतः आजाद हो जाता है जिस बात की जिक्र सन् १९५० में नेपाल भारत बीच हुए सन्धि का धारा ८ समेत करता है ।

किसी का कोई सामान चोरी कर लें या हत्या कर दें तो नेपाल के कानुन समेत ने बिगो, क्षतिपूर्ति व जेल सजाय का प्रावधान बनाया है । मधेश पर अनधिकृत नेपाली अतिक्रमण, चोरी, डकैती, हत्या, बेइज्जती तथा बलत्कार तो नेपालियों ने दो सौ एक वर्षों से करता आ रहा है । उसके सजाय व क्षतिपूर्ति के साथ मधेश मधेशियों को मिलना चाहिए या नहीं ?

मधेशी कलाकारों द्वारा फिल्मित “मधेशी पुत्र–२” पर प्रतिबन्ध लगाना नेपाली राज्य का विभेद और नश्लीय शासन का पराकाष्ठा है । केन्द्रिय चलचित्र जाँच समिति, सिंहदरबार ने २०७४ पुष ६ गते के दिन प.सं ७४÷७५, च.नं. ३१२ के पत्र द्वारा उस फिल्म में “अपांङ्ग सरकार, घण्टा, शर में गोली मारने के दृश्यों लगायत ऋप् च्बगत” नामक शब्दों को फिल्म से पूर्णतः हटाने का निर्देश किया है । जबकि उस फिल्म का उद्देश्य केवल मधेश के इतिहास, संस्कृति, परम्परा और पूर्खों की वीरतापूर्ण कर्मों को प्रस्तुत करना भर है । उसका अन्य कोई भी उद्देश्य नहीं हो सकता । यह प्रमाणित होता है कि नेपाली साम्राज्य मधेश के मौलिक पहचान, गर्विला इतिहास, संस्कृति व गौरवशाली मधेशी परम्पराओं को मधेश और विदेश में चलचित्र के माध्यम से भी प्रचार प्रसार करने में बाधक बन रही है, तो वहीं पर नेपाली चलचित्र बोर्ड द्वारा निर्मित “भैरब” जैसे भद्दा और नश्लीय फिल्म को नेपाली चलचित्र सेन्र बोर्ड ने चलाने की भद्दा अनुमति देती है । ज्ञात हो, उस फिल्म में मधेश के राजनीति, मधेशी नेता और नेतृत्व तथा आम मधेशी जनजीवन को उपहास तथा तिरष्कार किया गया है ।

ज्ञात हो, सीके राउत अब कोई समान्य व्यतिm, या किसी क्षेत्र विशेष काव्यतिm नहीं है । वे कोई आततायी या आतंककारी नहीं है । वो मधेशी नव वंशों का पूर्खा है । मधेश का आवाज है । यूवाओं का धडकन है । बहनों का पुकार है । प्रकृति का सन्देश है । माँओं का अनमोल रत्न है । मधेश का भविष्य है । बुजुर्गों का सहारा है । आजादी का वो धारा है । आजादी इश्कवाजों का प्यारा है और अन्धेरे आकाश का तारा है । उस फिल्म को नेपाल हाल फिलहाल चलने दें या रोक दें, मगर आजाद मधेश का वह एक दौलत है । उस दौलत का सीके अनु है, जिसके बिना कुछ निर्माण ही असंभव है । इसीलिए सीके का नाम तो हटना कल्पना है । बाँकी हमारा इतिहास है जिसे फिल्म निर्माता छोड नहीं सकते ।

नेपाली टेलिसिरियल्सों में मधेश पर मजाक उडाने बाले शब्द और दृश्यों को टेलिकास्ट करने का पूर्ण छूट होती है । कान्तिपुर टेलिभिजन पर मधेशी के भूमिका में रहे एक पात्र को “मिठाइलाल जादब” संवोधन के साथ मैथिली भाषा को बेइज्जत करने का काम हो रहा है । ज्ञानमणि नेपाल के एक पुस्तक में मधेशियों को जानवर ही कहा गया है । वहाँपर नेपाल चलचित्र बोर्ड, नेपाली टेलि श्रृंखला बोर्ड और नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान को लकवा मार गया है क्या ? वहाँ पर रोक व प्रतिबन्ध क्यों नहीं ?

नेपाली राज्य ने दो शताब्दियों में जो किया है और अभी भी कर रहा है, उससे मधेश को उर्जा ही मिल रही है । अब कहीं वो समय न आ जाये कि मधेशी भी किसी दिन नेपाली भाषा, नेपाली टोपी और संस्कृतियों पर आनन्ददायी कार्टुन बनाकर अपने बच्चों को हँसाये । नेपाल और नेपाली शासन ने मधेश का “मधेशी पुत्र–२” पर प्रतिबन्ध लगाने का साजिश की है, मधेश अब मधेश में नेपाली शासन और साम्राज्य बन्द करने को ठान ली है ।

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