तेवर त्योहारों के !

मुकुन्द आचार्य:इस पूरी कायनात में सबसे बडÞा अजूबा इन्सान है और इन्सान को बनाने वाला तो ऐसा जादूगर है, जिसके बारे में लोग बडÞी छोटी हर साइज की बातें बनाते-बताते आए हैं । जिस पर यकीन आए, न आए, सुनना और गौर करना तो पडÞता ही है । है न –
बीते कुछ दिनों के दरमियान तीन त्योहार अपने तामझाम के साथ आए और शान से चले भी गए । इत्तफाक से ये तीनों त्योहार गुजरते हुए मुझ से भी रूबरू हुए थे । हो गया दो-दो हाथ !
पहली मुठभेडÞ तो दशहरे से हर्ुइ । मैं ठहरा गान्धीवादी शुद्ध शाकाहारी एक अदद नमूना । दशहरे के दौरान लाखों बेजुवान जानवरों की कर्ुवानी दी जाती है । खून की नदियाँ बहती हैं । बकरे, भैंसे, भेड, कबूतर, मर्ुगे, सबों का कत्लेआम होता है, दशहरे के इस्तकबाल में । यह दशहरा राक्षस की तरह सब घोंट जाता है, बिन डकारे । जैसे लोग रिश्वत को घोंट जाते हैं । अंगूठा दिखा देते हैं । मगर हाँ, कभी-कभार कुछ कच्चे खिलाडÞी अख्तियार के हत्थे भी चढÞ जाते हैं । बेचारे … । खाते समय कुछ भी नहीं सोचते, पर पचा नहीं पाते ।
मैंने दशहरे को लताडÞा हर साल तुम लाखों जानवरों को खा जाते हो, पी जाते हो- फिर भी तुम्हारा पेट नहीं भरता – मुँह उठाए चले आते हो हर साल ! भुक्खडÞ कहीं के !! तुम्हे खुश करने के लिए लोग नए-नए कपडÞे खरीदते हैं । भले ही कर्ज लेना पडÞे । दावतों का तांता लगा रहता है । खाने खिलाने का दौर दिन-रात चलता रहता है । जुए और शराब में पानी की तरह पैसे बहाए जाते हैं । तुम जब आते हो, तो ‘हुदहुद’ और ‘निलोफर’ की तरह आते हो । कितने ही करोडÞपति रोडपति बन जाते हैं । कभी-कभी तो तुम ‘सुनामी’ बन जाते हो । लोग तवाह हो जाते हैं, जब तुम आते-जाते हो । तुम्हारा नाम तो ‘आफत’ होना चाहिए था । लोग तुम्हें दशहरा क्यों कहते हैं –
मेरे सारे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दशहरे ने सफाई पेश की- लोग अपनी कमी कमजोरियाँ छुपाने के लिए मुझ पर तोहमत लगाते हैं । कैसे वेशरम हो गए हैं, आज के लोग । मैं किसी से नहीं कहता- जानवरों की कर्ुवानी दो । लोगों को जायकेदार कबाब चाहिए, गोश्त के लजीज भेराइटी चाहिए । और इसके लिए बेजुवान जानवरों की बेरहम कुरवानी का ठिकरा मेरे सर पे फोडÞते हैं । मक्कार कहीं के । क्या ये ठग सिर्फदशहरे में ‘ननभेज’ लेते हैं – खेत खाए गदहा, मार खाए जोलाहा । यार, दशहरा मुफ्त में बदनाम हो रहा है । सब पागल हो गए हैं ।
इतने में एक खूबसूरत मोहतरमा को देख कर हम सारे गिले शिकवे भुला कर पूछ बैठे- आपकी तारीफ – खूबसूरत मोहतरमा ने मुझे झिडÞक दिया- आप वैसे तो बुजर्ुग नजर आते हो, शायद आपकी आँखे कमजोर हैं । सारी दुनिया मुझे ‘दीपावली’ के नाम से जानती है । प्यार से लोग मुझे ‘दिवाली’ भी कहते हैं । पढÞे-लिखे लोग मुझे बाइज्जत ‘लक्ष्मी पूजन’ भी कह लेते हैं । मुझे ‘रोशनी का त्योहार’ भी कहते हैं ।
मैंने कहा, अरे तो आप को उल्लू पर सवार हो कर आना चाहिए था । पांव-पैदल क्यों भटक रही हैं – आज की नकली दुनियाँ में सकली जेवरों से लदी-फदी घूम रही हैं । डर नहीं लगता – लोग तो नकली जेवर पहन कर भी घूमने में डरते हैं । आप हो कि …. ! आप को पता नहीं, नेपाल में कानून अंधा, गंूगा और बहरा हो गया है –
जेवरों के ‘शोरुम’ बनी हर्ुइ मोहतरमा ने फरमाया- अरे ओ अकल के अन्धे ! दुनिया में जितने दौलतमंद हैं, सारे के सारे उल्लू है और शान से मैं उन पर सवारी करती हूँ । मैं तुम्हें पाँव-पैदल नजर आ रही हूँ – सारी दुनिया मेरे कदमों पर कर्ुवान होने के लिए तैयार है । किस अभागा को राम ना भावे – दौलत किसे नहीं चाहिए – मेरी नजरेइनायत के लिए सारी दुनियाँ कुतिया की तरह दूम हिलाते रहती है ।
मैंने, कहा, इसीलिए शायद लोग दिवाली के बहाने रुपयों में आग लगाते हैं । पटाखे, फुलझडÞी, अनारदाना ऐसे न जाने कितने सामान बेचे और खरीदे जाते हैं । हर साल लाखों करोडÞो के पटाखे पुलिस जब्त करती है और पटाखों को अपने सीनियर अफसरों के पास चुपके से पहुँचाती है । कुछ अपने बच्चों के लिए भी रख लेती है । पैसे में आग लगा कर लक्ष्मी की पूजा करते हैं ।
चुपचाप लक्ष्मी जी मुस्करा रही थी । इधर मेरी बकबक जारी थी- बडÞे ही ताज्जुव की बात है । हे माते ! हम हिन्दू लोग गणेश जी की पूजा करते हैं, लक्ष्मी माँ के चरणों की धूल अर्थात् धन मिल जाए ऐसी कोशिश करते हैं । जुगाड बैठाते हैं । फिर भी विश्व में हम ही सब से कमजोर और निर्धन होते हैं । और मुल्कों में ना कोई गणेश जी को लड्डू खिलाता है और ना कोई लक्ष्मी जी मेरे पर सवार हों, ऐसा सोच कर उल्लू बनते हैं । वैसे नास्तिक लोग ही आज के रोज बडÞे मजे में हैं । कुवेर के समान सम्पन्न हैं । गणेश जी का नाम तक जिसने कभी नहीं सुना, वे हमसे बहुत ज्यादा सुरक्षित और सुखी हैं । ये कैसा गोरखधन्धा है माते – जरा मुझे समझाओगी भी हे विश्व की धन-दौलत की देवी ! माते ! मेरी समझ में तो कुछ नहीं आते !
भद्र महिला ने अपनी भद्रता दिखाते हुए कहा, हे नादान वृद्ध बालक । तुम्हारी अक्ल को जंग लग गई है । सिर्फमक्खन लगाने से कुछ नहीं होता । पश्चिमी देश वाले बखूबी जानते हैं- र्’वर्क इज वर्शिप’ अर्थात् कर्म ही धर्म हैं । मगर औंधी खोपडी वाले हिन्दू लोग कर्म करने को शर्म की नजर से देखते हैं । लक्ष्मी की सवारी उल्लू की है, लेकिन लक्ष्मी स्वयं तो उल्लू नहीं होती । वह सब समझती हैं । गीता को तोते की तरह रट लेते हैं, लेकिन कर्म का महत्त्व नहीं समझते । तो लक्ष्मी जी स्पेशल दया दिखा कर काम चोरों की झोली कैसे भर देगी – मेरी बात पर यकीन न आए तो छठी माता से पूछ लो । देखो वे इधर ही आ रही हैं । पवित्रता की साक्षत् मर्ूर्ति हैं, आजकल लोगों में छा गई हैं ।
मैंने छठी माता को साष्टांग दण्डवत् किया और पूछा- माँ तुम तो अपने सारे भक्तों को मुँहमांगी चीज देती हो न – माँ जो हो … ‘ बेहद शालीन महिला छठी माता ने गम्भीरतापर्ूवक कहा- वत्स । कर्म ही सब से बलवान होता है । कर्म के फल तुम्हे अवश्य मिलेंगे । अर्जुन अपने धर्म अथवा अपने स्वाभाविक कर्म से भाग रहा था । भगवान ने उसे कान पकडÞ कर युद्ध में लगाया । धर्म युद्ध के बाद ही तो पाण्डवों को हस्तिनापुर का राज्य मिला । सब अपना कर्तव्य पालन करने लग जाएं तो सारी दुनियाँ खुशहाल हो जाएगी । मेरी पूजा सिर्फसजावट करने, तडÞक-भडÞक दिखाने से सम्पन्न नहीं होती ।
मैंने मस्का लगाया- माते ! तेरे प्रसाद ठेकुवा तो हम भी खाते । फिर भी तेरा कृपाप्रसाद हम क्यों नहीं पाते – छठी माता ने मेरा कान पकडÞ कर कहा- यू नँाटी व्वाँय ! माँ से मजाक करते हो !

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