तो क्या एक बार फिर मधेश की मिट्टी खून से रंगने वाली है ? : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति , काठमांडू ,२४ मई |

मधेश आन्दोलन की दिशा किस ओर जा रही है ? क्या मधेशी मोर्चा का काठमान्डौ केन्द्रीत आन्दोलन का निर्णय गलत था ? पिछली बार के आन्दोलन में कई बार समुदाय विशेष की ओर से यह कहा जाता रहा कि समस्या का समाधान नाकाबन्दी नहीं है ।

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नेताओं को राजधानी केन्द्रीत आन्दोलन करना चाहिए, वार्ता करनी चाहिए जिसमें काठमान्डौवासी का सहयोग भी मिलेगा । किन्तु पिछले दिनों के आन्दोलन में ऐसा कुछ दिखने को नहीं मिल रहा है । जिस सैलाब की अपेक्षा थी वो नगण्य है । तो क्या एक बार फिर मोर्चा की नीति विफलता की ओर जा रही है ? छः महीनों के आन्दोलन में भी सत्ता ने मधेशियों के हौसला को ही तोड़ने का काम किया और काफी हद तक वो सफल भी हुए । आज भी जब जनता सड़क पर है तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा । अभी भी वो इसी सोच के तहत काम कर रहे हैं कि आखिर कब तक ये सड़क नापेंगे । थकेंगे और लौट जाएँगे । क्योंकि प्रधानमंत्री से जिस गम्भीरता की आशा होनी चाहिए थी इस मसले को लेकर वो दिखाई नहीं दे रही । अभी भी उन्हें यह तमाशा ही नजर आ रहा है । और अब तो वो आन्दोलन को अशांति फैलाने का तमगा भी दे चुके हैं । शांतिपूर्ण आन्दोलन में हिंसा का जो खेल खेला गया उससे मधेश की मिट्टी अब तक उबरी नहीं है । वो दर्द अब तक ताजा है । अगर मधेशी मोर्चा राजधानी में असफल रही तो उनका अगला कदम स्वाभाविक है कि फिर मधेश की ओर ही मुड़ेगा । एक बार फिर वहीं की जनता इस कहर से गुजरेगी, वहीं के बच्चे शिक्षा से वंचित होंगे, व्यापार ठप्प होगा । पर सवाल यह है कि क्या वहाँ की हानि इस देश की हानि नहीं है ? या फिर सत्ता भी उसे देश से अलग कर के ही सोच रही है ? अगर वो इसी देश का हिस्सा है तो वहाँ के घाटे या नाफे से देश का सीधा सम्बन्ध है तो क्या सत्ता को इस विषय पर गम्भीर नहीं होना चाहिए ? पर न पहले ऐसा दिखा और न ही आज यह दिख रहा है । एक ओर सरकार वार्ता बुला रही है तो दूसरी ओर अपनी बेतुकी बोली से आग में घी डालने का काम कर रही है । इस बात से क्या अंदाजा लगाया जाना चाहिए ? क्या सरकार सचमुच समाधान चाह रही है या वार्ता के नाम पर समय काट रही है ?

इधर संघीय गठबन्धन भी आपस में ही उलझ रहे हैं । आरोप प्रत्यारोप में उनका अधिकांश वक्त गुजर रहा है । मोर्चा दो खेमों में बँटी नजर आ रही है । इन परिस्थितियों में कोई अच्छे आसार नजर नहीं आ रहे हैं । एक खेमा है जो शुरु से ही राजधानी केन्द्रीत आन्दोलन के खिलाफ था जो आज भी यही चाह रहे हैं कि आन्दोलन की सरजमीं मधेश ही होनी चाहिए थी । फिर से नाकाबन्दी की बात चल रही है किन्तु इस सन्दर्भ में भी अगर गौर किया जाय तो राजधानी ने भीतरी तौर पर पेट्रोलियम पदार्थ और गैस को इतना तो जरुर स्टोर कर लिया है कि अगर नाकाबन्दी होती है तो वो फिर से दमन की नीति ही अपनाएँगे और कई महीनों तक आन्दोलन को लम्बा खींचेंगे । वैसे भी अभी सरकार पूरे जोशखरोश में है नित्य नई घोषनाएँ हो रही हैं भले ही उन्हें अमली जामा पहनाने में वर्षों लग जाय या फिर वो समय ही नहीं आए किन्तु फिलहाल तो सपने बँट रहे हैं और नेपाली जनता उस सपने का आनन्द ले रही है । प्रधानमंत्री ओली का राष्ट्रवाद का नुस्खा काफी काम कर रहा है और एक वर्ग उनके समर्थन में नारे लगा रहा है । जाहिर सी बात है कि इससे उनको दोगुना साहस मिल रहा है बोली की तीर चलाने में । भले ही यथार्थ में वो सिर्फ कपोल कल्पना ही क्यों ना हो । चीन के साथ ने इनका मनोबल इस कदर बढा दिया है कि दो वर्षों के अन्दर नेपाल का कायाकल्प बदलने की परिकल्पना तैयार होने लगी है । वैसे ओली महाशय यह भी जरुर जानते होंगे कि उनकी कुर्सी की उमर कितनी है । ऐसे में असम्भव बातों को बोलने से क्यों गुरेज किया जाय । जो जी में आए बोलते चलो ।

चीन जिस तरह अप्रत्यक्ष तौर पर नेपाल के पक्ष में खड़ा है, या खड़ा होने का दम भर रहा है, वह भारत के लिए भी चिन्ता का विषय बना हुआ है । सुरक्षा की दृष्टिकोण से यह कभी भी भारत के पक्ष की बात नहीं हो सकती । ऐसे में उनकी कूटनीति बदल सकती है । पिछले आन्दोलन में नाकाबन्दी के दौरान भारत ने जो नीति अपनाई थी वो शायद इस बार ना हो पाए । ऐसे में मोर्चा को यह तय करना होगा कि ऐसे किसी भी कदम को उठाने से पहले वो सौ बार सोचें क्योंकि काठमान्डौ में गोलियाँ खामोश हैं मधेश में ऐसी स्थिति नहीं होगी । तो क्या एक बार फिर मधेश की मिट्टी खून से रंगने वाली है ? मोर्चा को ऐसी सोची समझी नीति बनानी होगी जहाँ बारुद के मुहाने पर मधेश को खड़ा नहीं किया जाय ।

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