थारुओं ने ललकारा है, सारा मधेश हमारा है : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, २ अक्टूबर |

उपर का नारा मधेशी दलों द्वारा आश्विन ३ गते के दिन लगाया गया था । वह दिन था नेपाल के संविधान को मधेश मेें अस्वीकार करने का दिन । उस दिन को मधेश ने काला दिवस के रुप में मनाया था । वहीं राज्य उस दिन को ऐतिहासिक जीत का दिन मानती हैं ।

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संविधान को लेकर एक ओर मधेश काला दिवस तो दूसरी तरफ नेपालियों की उत्साहपूर्ण दिपावली प्रमाणित यह करता है कि नेपाली और मधेशी दोनों एक आपस में अति भिन्न हैं । इन दोनों की अलग अलग रुची, संस्कृति, परम्परा, राजनीति, सोंचनीति, समाजनीति, विचारनीति और आवश्यकताएँ हैं । सांस्कृतिक और सामाजिक रुप से ही नहीं, ये दोनों की पाकृतिक विश्वास और मूल्य मान्याताएँ भी अलग अलग हैं । और जब पाकृतिक रुप से ही अलग अलग हंै तो कृतिम रुप से लाख कोशिश कर लें– एक नहीं हो सकते ।यूँकि संविधान को अगर नीति चलाता है तो नीतियों को नियत चलाता है । और कोई लाख संविधान बना लें, दुनियाँ की सारी अच्छाईयाँ ही उसमें डाल दें, मगर शासकों का नीति अगर गलत है तो उसका कोई अर्थ नहीं होता ।
हाल ही में नेपाली पार्टियों के कुछ वर्तमान और पूर्व मधेशी मन्त्री और सांसदों के साथ हमारी एक बैठक हुई थी । हमने उनसे निवेदन किया कि वे अपने अपने पार्टियों में कैसा महशुश करते हैं और अब मधेश को क्या करना चाहिए । जबाव में उन्होंने यही कहा कि वे वहाँ मरकर जी रहे हैं । हमने फिरसे निवेदन की कि वे मधेशी दलों में क्यूँ नहीं आ जाते ? जबाव मिला कि वे वहाँ नहीं आ सकते जहाँ उन खस पार्टियों से भी ज्यादा गन्दगियाँ फैली हुई हैं । उनसे अच्छा तो मजबूरीवश ही सही, नेपालियों के पार्टियों में ही ठीक हैं । क्यूँकि नेपाली तो मधेश को उल्लू बनाकर अपने नश्लों के प्रति इमानदार हैं । मगर मधेशी पार्टियाँ तो अपनों का भी अपना नहीं हैं । वे मधेश में अलग पार्टी भी खोल नहीं सकते क्यूँकि मधेश उन्हें भी विश्वास नहीं करेगी ।
कुछ दिन पहले मधेश के एक जिले में नेपाली पार्टियों की जिला की समस्या और निकासों के उपायों को लेकर एक बैठक हुई थी । एक मधेशी बुद्धिजिवीे उसमें आमन्त्रित थे । उन्होंने मधेशी दलों को भी बुलाने की सलाह दी । जबाव आया–उन्हें बुलाकर कोई लाभ होने को है ही नहीं । उन्हें उनकी कमिशन मिल जाये, सब ठीक है ।
आश्विन ३ के दिन मधेशी पार्टियों ने नारा लगाया, “थारुओं ने ललकारा है, सारा मधेश हमारा है ।” क्या है उस नारे के उद्देश्य–जिस नारों में थारुओं की कोई सहभागिता नहीं रही ? उनकी उपस्थिती गौण रही ? वह नारा तो ठीक वैसा ही हो गया जैसा कोई एक निकृष्ट आदमी तीसरों के खेत, बारी, धन सम्पति और मकान दिखाकर दुसरे के सामने अपना बडप्पन और सम्पन्नता दिखाता है । मगर जब उन दुसरे और तीसरे को यह बात पता चले तो पहला का हालत क्या होनी है, हम सब जानते हैं ।
थारुओं के उपस्थिती बिना की उनकी नारा मधेश आन्दोलन के लिए ठीक वैसे ही घातक सिद्ध हो सकता है जैसे किसी पेट दर्द के रोगी को उसे दिल की रोग ठीक करने बाली दबा दे दी जाय । मधेशी दलों को इस बात की खोज करनी होगी कि गजेन्द्र नारायण सिंह के नेतृत्व के मधेश आन्दोलन में जो थारु समुदाय मधेशी थे, लगानी और बलिदानी दी, वही थारु आज अपने को मधेशी कहने से घबराते क्यू“ हैं । वे अपने को नेपाली कहकर मधेशियों से अलग थलग रहने में ही गर्व महशुश क्यूँ करते हंै । किसकी कमजोरी है ? थारु गलत है या मधेशी पार्टियाँ ?
०६३–६४ के मधेश आन्दोलन में एक रहे मधेशी समुदाय पलक झपकते ही कोई दलित, कोई मुसलमान, कोई आदिवासी, जनजाति, वैश्य, बाजी, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, उच्च जात के, निचले जात के, पिछडे वर्ग के, अगले वर्ग के कैसे और क्यूँ बन गये ? सामाजिक जीवन में भले ही वे तत् तत् वर्ग और समुदाय के रहे हों, मगर राजनीतिक आन्दोलन में वे सिर्फ मधेशी थे । राज्य ने अपने शासन काल में कभी किसी जात या धर्म विशेष के रुप में उन्हें गालिया“ और शोषण नहीं की । बल्कि मधेशी मानकर उनके साथ विभेद की । न कभी दलित विकास की बात की, न उसके आरक्षण की । फिर क्या हुआ कि राज्य ने अलग अलग जात और सम्प्रदायों के नाम पर आरक्षणें और कोटे तोक दिए ? उसने समग्र रुप में मधेशियों को उनके एकता को तोडने का प्रपञ्च शुरु की–जिसकी उद्देश्य मधेशीे समझ नहीं पा रहे हैं । टुट फुट के शिकार होकर भिखारी बनते जा रहे हैं । अब तो वे मधेशी नहीं,े आदिवासी, जनजाति, दलित, थारु, बाजी आदि बन रहे हैं । यह मधेशी दलों के लिए खुल्ला चुनौती है ।
इतिहास, संस्कृति, पर्व, परम्परा, रहनसहन, रीतिरिवाज और व्यवहारों को देखें तो अपवाद के बाहेक (अपवाद तो एक घर में भी होता है ) थारुओं का सारा जीवन शैली मधेशियों का है । थारु अपने को बुद्ध के वंश मानते हैं । विनय पिटक में बुद्ध ने स्वयं कहा है कि वे मज्झिम देश के मधेशी हैं । थारु अपने को थारु और बाकी मधेशी को बाजी कहते हैं । क्या है थारु और बाजी ? बुद्ध ग्रन्थ ही प्रमाणित करता है कि राजा शुद्धोदन के राज्य में कोलिय, देवदह, बज्जिका तथा रामग्राम आदि गणराज्य थे । बज्जिका गणराज्य में बास करने बालों को बाजी कहा गया – जिसमें शाक्य वंश के थारु भी थे । थारु कोई जात नहीं, एक सभ्यता से सम्बन्धित हैं जो थार सभ्यता कहलाता है । सबसे मजेकी बात तो यह है, जो थारुओं को स्वयं याद करना होगा कि नेपाल, गोरखा और पहाडी इलाकों से खस लगायत के लोग जब मधेश में आना शुरु किए तो उनकी पहली मुलाकात ही भित्री मधेश तथा जङ्गलों के बीच रहने बाले थारुओं से हुई जिन्हें नेपालियों ने मधेशी कहा । प्राचीन एवं मध्य मानव इतिहासों के अनुसार भी मधेश में सम्राट मनु से लेकर जनक, विराट, सहलेश, बिम्बीसार, अजातशत्रु, अशोक, हरिसिंह देव, मुकुन्द सेन, लोहांग सेन, राजा भोज, अवध नरेश, दङ्गी शरण तथा शहादत अलि खान जैसे शुरवीर, पराक्रमी एवं जनप्रिय राजाओं ने शासन किया है । नेपालियों के अनुसार ही नेपाल में अगर भित्री मधेश है तो उसकी बाहरी मधेश कहाँ है ? मधेशी भारत के मध्य प्रदेश के कैसे हो गए ? गाली देते समय थारुओं को मधेशी, धोती, काले, इण्डियन, लेकिन मधेशी एकता के समय वे नेपाली कैसे हो गयें ? वे नेपाली ही हंै तो नेपाली राज्य द्वारा अन्य नेपालियों को दिए जाने बाले सुविधा, सुरक्षा, संरक्षण, अवसर उनके लिए क्यू नहीं ? थारुओं के धन, सम्पति, खेत, खलिहान और इज्जत समेत को राज्य ने लूटा क्यूँ ? न्याय के लिए आवाज उठाने बाले थारुओं को अन्य मधेशी जैसे ही गाली, गोली और राज्य आतंक की सुली क्यूँ ? मासुम उन थारुओं को चेतना कौन देगा ? कब दिया जाएगा ? मधेशी दल कर क्या रही है ?
शराबियों का एक झुण्ड होता है । वे बडे इमानदार होते हैें तब जब वे नशे में चुर होते हैं । उन्हें किसी चीज की परवाह नहीं होती । उनकी दुनिया बडी हँसीन होती है, खुबसरत होती है । क्षण में ही हर चीज की वे मालिक होते हैं और क्षण में ही फकिर । वे संसार को दुश्मन मान लिए तो दुश्मन और मान लिए मित्र तो सारे मित्र । उनके लिए सत्य भी सत्य होते हैं और असत्य भी सत्य होते हैं । उनकी अलग ही अङ्क गणित होती है । और तकरीबन वही हालात थारु और बाजी कहलाने बाले मधेशियों की है । इसकी परम्परागत इलाज दो दिखती है ः–
१. या तो शराब का नशा टुट÷छुट जाये,
२. या उसकी  मौत हो जाये ।
लेकिन धन्य है शराबी और उनके विवश परिवार बाले जिनके इलाज के लिए शराब छुडाने की दबाईया“ मेडिकल साइन्स ने निर्माण कर दी है ।
समस्या यह है कि वे दबाईयाँ रोगी खुद नहीं खा सकते । क्यू“कि वे बेहोस पडे हैं । देखना यह है कि उन्हें वे औषधिया“ खिलाता कौन है ?

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