थारु मुस्लिम समुदाय काे अलग थलग करने की साजिश

प्रिय पाठक मित्र गन यह लेख और इसका विश्लेषण किसी को कम या निचे दिखाने के लिए नहीं , परन्तु आज की नेपाल की तरल राजनितिक घटना क्रम और विभेदकारी राजनीति षड्यन्त्र के हम सब वर्षो से शिकार हो रहे वर्ग समुदाय को समय में सजग तथा सचेत रखने का में यह एक सकारात्मक प्रयास ही है ! 
सर्वदेव अाेझा,बैसाख २ गते
tharu
शासक के सियासत दारो को यह भलीभांति मालूम भी है की इन्हें एक आपस में तोड़ो और अलग रख्खो , फिर राजनीति का परिणाम देखो ! जो २०६४ के पहले संबिधान सभा और २०७० के दूसरे संबिधान सभा के प्राप्त परिणाम भी बताते है ! जो तराई मधेस में इनकी कुल संख्या बसोबास संख्या की लमसम ७० से ८० प्रतिशत है ! और निर्वाचन परिणाम आते समय ये ११.५% और ११.६% में सिमट जाते है !
मधेस-तराई में बसोबास थारू , मुस्लिम समुदाय को फिर से अलग थलग रखने की नया राजनीतिक षड्यन्त्र का रणनीतिक नया कानून का बीजारोपण किया जा चुका है ।  आज फिर से नेपाल की शासकीय शासन मनस्थिति के महेन्द्रबादी पुराने शासकीय सोच के साथ  यहाँ के प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख नेतृत्व हावी होते जा रहे है ! इसी का एक ज्वलन्त कानूनी रूप से बांधने में प्रयत्न शील हो रहे कुछ प्रमुख नेता अपने आप को गोप्य रूप से एक नया षड्यन्त्र का बीजा रोपण का शुरूवात कर रहे है ! आज देश में २०६३/०६४ से उठे मधेसी , आदिबासी ,थारू , अल्पसंख्यक आदि का ए संबिधान में अपने अधिकार की सुनिश्चित और गारंटी करने में सभी एक जुट होकर आंदोलित होते आगे बढ़ता देख फिरसे यहाँ की राज्य शत्ता अपने पुराने आचरण और महेन्द्रबाद सोच में पुनः यहाँ तराई मधेस में शादियों से बसोबास कर रहे यहाँ के आदिबासी थारू समुदाय , अल्पसख्यक समुदाय , इस्लाम धर्मावलम्बी मुस्लिम समुदाय , यहाँ के दलित समुदाय आदि के नाम पर अभी तक एकजुट बसोबास कर रहे ये सभी समुदायों को एक आपस में अलग थलग रखने और इन पर अलग अलग कानून बनाकर टुकडो टुकड़ो में बिभाजित कर अपने दूरगामी शोच के साथ १९वे शताब्दी की पुरानीं शासकीय शासन की राजनीतिक साेच फिर से हावी होती दिखाई पड़ रही है और इसका बीजारोपण भी हो गया है ! आज तक यदि देश के सभी पुराने इतिहास को गौर से अध्ययन और विश्लेषण किया जाय तो तराई मधेस की भूमि पर कब्ज़ा , यहाँ के प्राकृतिक संशाधन तथा बन जंगल का पूर्ण रूपेण दुहन और सर्वनाश , यहाँ के आदिबासी थारू समुदाय को कमैया और कम्लरनी बनाना , इनके पुर्खौली जमीनों को अनिमित और लोभ लालच में फसा कर इन्हें बेदखल करके भूमिहीन करना , इन्हें शिक्षा , स्वस्थ्य , और रोजगारी से अलग रखना ये इस राज्य की पुरानी और एक शियासी प्रयोग की परम्परा ही रही है ! केवल इन्हें अपने राजनितिक फाईदे के लिए मनचाहे वोट बैंक के लिए ही विभिन्न नारे के बहकावे में लोभ लालच का बंदी बना कर केवल ढपोल शंख की तरह प्रयो करना है और आज तक इस प्रयोग में ये शफल भी रहे है ! माओबादी के १० वर्षे जनयुद्ध कार्यकाल में भी अधिकतम प्रयोग और क्षति तथा शहीद यही हुए ! अब जब मधेस आन्दोलन हुआ तो इसके बाद ही मधेसियो के उजागर मांग के बाद कुछ ईनके बराबरी के अधिकार , सामाजिक न्याय , अन्य बराबर के हक़ अधिकार को लेकर अवश्य ही जनचेतना जरुर बढ़ा है , लेकिन अभी भी ये २०६३/०६४ के बाद भी राजनीतिक शियासत दरो की गोटी बनाते रहे है , एक आपस में एकता नहीं है ! इसका फायदा आज तक यहाँ के प्रमुख राजनीतिक पीठाधीस नेतृत्व को ही मिलता रहा है ! इसी तरह की कहानी इस तराई मधेस के भू भाग में शादियों से स्थापित बाकी मुस्लिम समुदाय के लोगो की भी मिलती जुलती प्रयोग शाला की कहानी है ! यहाँ तक की नेपाल के तराई मधेस भू भाग में बसोबास करते आ रहे इन्हें अल्पसख्यक और पिछडा रख कर अपनी रोटी बराबर सकते रहे है , साथ में इस तराई मधेस में शादियों से स्थापित इस समुदाय को अपने हित के लिए कभी मुस्लिम मधेसी नहीं है कह कर अपनी राजनितिक मोहरे के द्वारा बाकी अन्य मधेसी समुदायों से अलग थलग रखने का प्रयास भी जारी है ! इसका एक ही कारण दिखाई दे रहा है ? वह है देश की शासकीय राजनीतिक और राजनीतिक सत्ता पर वर्चस्व कायम रखना , वह इन थारू और मुस्लिम समुदायों को बाकी अन्य मधेसी समुदाय से अलग थलग और दूर रख कर ही सम्भव हो सकता है ! जो यह समुदाह भी आज तक इन्ही गोल चक्कर में ही घूम रहा होता है ! और प्रयोग भी होता रहा ! शासक के सियासत दारो को यह भलीभांति मालूम भी है की इन्हें एक आपस में तोड़ो और अलग रख्खो , फिर राजनीति का परिणाम देखो ! जो २०६४ के पहले संबिधान सभा और २०७० के दूसरे संबिधान सभा के प्राप्त परिणाम भी बताते है ! जो तराई मधेस में इनकी कुल संख्या बसोबास संख्या की लमसम ७० से ८० प्रतिशत है ! और निर्वाचन परिणाम आते समय ये ११.५% और ११.६% में सिमट जाते है ! आखिर शियासत दरो की अभी तक की ये रणनीति और कूटनीति सफल ही होता रहा है ! लोगो को कहने के लिए एक दिखावा देखे के लिए मधेसी पार्टियों की संख्या और फूट का करा ही मात्र बताते है , जो कुल वास्तविकता से बहुर दूर है ! नेपाल की आज तक की कुल पार्टियों की संख्या के अनुपात में सभी मधेसी और थारू तथा जनजाति डरता की गयी पार्टियों से भी कही भी अधिक कम है ! यह तो एक दिखवा और भुलावा ही कहना होगा ! बस यही कहकर इन्हें एक आपस से दूरी बनाये रखने का पुराना छलावा ही है ! अब आज फिर इन्ही पुरानी परम्परा तहेत प्रमुख संघियता के २ नम्बर प्रदेश के मधेस आन्दोलन से भयभीत होकर उठा रहे मधेस आन्दोलन की गंध को संघियता के ५ नम्बर प्रदेश में भविष्य में निस्तेज करने की साजिश और रणनीति के तहत ही जहा इस ५ नम्बर प्रदेश में यदि आज के आन्दोलन के मांग को देख कर तराई मधेस का भू भाग पहाड़ से अलग हुवा तो यहाँ पर शासन सत्ता की बहुमत शासन में थारू , मुस्लिम और बाकी अन्य मधेसी ही शासन में रहेगा ! क्यों की अभी के संख्या अनुसार ये लमसम शासन के इतना बसाई और बसोबास , और वहिष्करण कराने ,करने पर भी यहाँ ७०% से ज्यादे संख्या में रहेंगे ! और सत्ता भी इन्ही की रहेगी ! यहाँ यही आपसी एकता में हो जाने पर प्रमुख जनसंख्या में इस मधेस तराई के भूगोल पर प्रमुख मधेसी समुदाय , जिसमे थारू , मुस्लिम और बाकी अन्य मधेसी वर्ग ही है ! अब शासन इसी नजरिये से इन्हें एक आपस में दूर रखने का और शासन सत्ता में समानुपातिक , समावेशी सहभागिता में वन्चितिकरण करने के प्रयास में गोप्य तरीके से थारू और मुस्लिम समुदाय को बाकी अन्य मधेसी समुदाय से अलग थलग रखने की नयी योजना की रणनीति तयार की है ! वह है एक ऐसा नया कानून बनाने का आ रहा नया विधेयक जो विशेषकर थारू समुदाय , और मुस्लिम को विभिन्न आरक्षण जैसे शिक्षा , रोजगारी के मार्फ़त उनके हक़ हित के नाम पर उन्हें अधिकार के रूप में नहीं बल्कि राज्य के दुहाई और गिफ्ट के नाम पर नया शिरे से आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जायेगा ! यह विधेयक अभी गृह मन्त्रालय में ही है ! यदि यह विधेयक पास हुआ और कानून का रूप भी लिया तो आने वाले दिनों में देश , और पड़ोसी देश तथा यहाँ के प्राचीन आदिवासी , थारू , जनजाति और मुस्लिम समुदायों पर एक राज्य का शासकीय राजनितिक और रणनीतिक बड़ा प्रयोगशाला भी शिद्ध हो सकता है ! इसे अभी की प्रमुख राज्य की राजनितिक शक्तियों के प्रमुख नेतृत्व करता आने वाले कम्ती में ५० वर्षो तक अवश्य आवश्यकता अनुरूप प्रयोग करते और करवाते रहेंगे ! इस प्रस्तावित विधेयक को कानूनी रूप प्रदान करने के बाद सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक पछ अधिक रोचक सिद्ध हो सकता है ! जो प्रायः तपसील अनुसार भी प्रयोग में आ सकता है : (१) : विधेयक में रहे लोभ लालच से थारू और मुस्लिम समुदाय को आज उठ रहे प्रमुख अधिकार में जहा स्वायत्ता , समानता , सामाजिक न्याय जो मधेस की अधिकार की आवाज तथा मांग के रूप में आगे आई है , उसे खंडीयकरण करना और एक आपस में दूरी बढ़ाना ! (२) : थारू और मुस्लिम समुदायों को प्रमुख अधिकार की मांगो से बंचित रखना , और उसपर पुराना वर्चश्व ही कायम रखना ! (३) : राजनीतिक शासन शत्ता की भागीदारी में वर्चश्व न होने देना , और अपना स्थायित्व कायम रखना ! (४) : देश में पुरानी सत्ताशीन बिभिन्न्न पार्टी और उनके आई.एन.जी. की गोटी बने रहना , और आवश्यकता अनुरूप परिचालित होते रहना ! (५) : महेन्द्र निति की पुरानी सोच में पड़ोसी देशो के लिए भी आवश्यकता अनुसार प्रयोग करते करवाते रहना , और अन्य देशो से भी अपना बार्गेनिंग करने की छमता का आधार खड़ा करना ! (६) : कमन्युष्ट शत्ता जैसे प्रमुख मांगो को दर किनार कर आपस में द्वन्द करने और तराई मधेस में भी कमन्युष्ट पार्टी और शासन की आधार शिला को मजबूत करने की नई रणनीति और आधार स्थापित करना ! (७) : मधेसी आन्दोलन को और उनके अधिकार के मांगो को निस्तेज करना वा न्यूनीकरण करना , आंदोलित मधेसियो के विरूद्ध थारू वा मुस्लिम समुदायों को प्रयोग करना ! (८) : इसके आलावा यदि यह कानून बनाया गया , एक आपस में फूट की राजनीती में फिर कामयाब रहे और इसे लागू किया गया तो शायद शासकीय शियासतदरो के जनगंतंत्र वा दक्षिणपंथी विरूद्ध तराई मधेस में आनेवाले दिनों में कमन्युष्ट शत्ता अपना यहाँ भी वर्चश्व कायम करने में सफलता हाशिल करने में आगे हो सकेगी ! प्रिय पाठक मित्र गन यह लेख और इसका विश्लेषण किसी को कम या निचे दिखाने के लिए नहीं , परन्तु आज की नेपाल की तरल राजनितिक घटना क्रम और विभेदकारी राजनीति षड्यन्त्र के हम सब वर्षो से शिकार हो रहे वर्ग समुदाय को समय में सजग तथा सचेत रखने का में यह एक सकारात्मक प्रयास ही है ! 

 

 

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