थैलेसीमिया के विरुद्ध पारस की सक्रियता

संगीता सुवेदी
तिलाठी–३ सप्तरी के पारसनाथ मिश्र (३७ वर्षीय) थैलेसीमिया रोग से पीडि़त हैं । यह रोग दुर्लभ माना जाता है । थैलेसीमिया रोग के लिए नेपाल में मिश्र एक मात्र विज्ञ माने जाते हैं । थैलेसीमिया रोग के विरुद्ध वह विगत १० साल से स्वयम्सेवक के रूप में कार्यरत हैं । साथ में थैलेसीमिया मरीजों की आवश्यकता और अधिकार के लिए भी लड़ रहे हैं वह । इसके साथ–साथ थैलेसिमीया रोकथाम के लिए नीति निर्माण तह में भी वह काम कर रहे हैं ।

Parasnath Misra

पारसनाथ मिश्र

मिश्र थैलेसीमिया इन्टरनेशनल फेडेरेसन्स अन्र्तगत रहकर काम करते हैं । नेपाल के लिए इन्टरनेशनल फेडेरेसन्स द्वारा नियुक्त मिश्र, अभी टीआइएफ को नेपाल भिजिट के लिए काम कर रहे हैं । टीआइएफ एक ऐसी संस्था है, जो अन्र्तराष्ट्रीय रूप में थैलेसीमिया रोग के सम्बन्ध में काम करती है । उसके अंदर विश्व के ६० देश है । टीआइएफ ने विश्व के कई जगह थेलेसिमिया रोग के सम्बन्ध में रिर्सच एवं रोग निवारण के संबंध में काम कर रहा है । मिश्र भी टीआइएफ से ही प्रशिक्षित विज्ञ हैं ।
विज्ञ होने के नाते वह अभी थैलेसीमिया रोगियों को निःशुल्क सेवा में सर्मपित हैं । साथ ही तीन साल से वह कुछ बीमार लोगों को निःशुल्क औषधि की व्यवस्था भी कर रहे हैं । मिश्र सन् २००८ से कान्ति बाल अस्पताल में भी सेवारत हैं । अस्पताल में आनेवाले थैलेसीमिया रोगियों के उपचार में मिश्र डॉक्टरों को हेल्प करते हैं ।
मिश्र कहते हैं– ‘थैलेसीमिया रोग के सम्बन्ध में बहुत पत्रकार मित्र ने मेरे अतंवार्ता, आर्टिकल और फीचर प्रकाशित किया है । इससे मुझे काम करने में अधिक हौसला प्राप्त होता है ।’ उनका कहना है कि उनका पूरा जीवन थैलेसीमिया रोगियों के लिए ही समर्पित है । थैलेसीमिया परामर्श दाता की हैसियत से मिश्र ने अभी तक सिंगापुर, टर्की, पाकिस्तान, भारत, आबुधाबी, हेनोइ जैसे मुल्क का भ्रमण किया है, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में सहभागिता दी है । बताया जाता है कि थैलेसीमिया मलेरिया से प्रभावित क्षेत्र में ज्यादा दिखाई देता है । पारस के अनुसार थैलेसीमिया रोगों की पहचान करना कुछ जटिल ही काम है ।
क्या है थैलेसीमिया ?
थैलेसीमिया एक ऐसा आनुवंशिक रक्त विकार रोग है, जिसमें रोगी के शरीर में लाल रक्त कण तथा हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य अवस्था से भी कम हो जाती है । वस्तुतः मानव शरीर में आक्सीजन का परिवहन तथा संचरण करने के लिए हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन की आवश्यकता पड़ती है और यदि यह न बने या सामान्य आवश्यकता से भी कम बने तो इस परिस्थिति में बच्चे को थैलेसीमिया रोग से ग्रसित होने की आशंका अधिक रहती है । जिसका चिकित्सकीय प्रयोगशाला में रक्त परीक्षण के पश्चात ही पता चल सकता है । शिशु में इसकी पहचान तीन माह की अवस्था के बाद ही होती है । बीमार बच्चे के शरीर में में रक्ताल्पता के कारण उसे बार–बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पडती है । रक्ताल्पता के कारण उसके शरीर में लौह तत्व अधिक मात्रा में उत्पन्न होने लगता है जो हृदय, यकृत तथा फेफड़ों में प्रविष्ट होकर उन्हें क्षतिग्रस्त और दूष्प्रभावित कर देता है । जो अंततः प्राणधातक साबित होता है ।
म्यूटेशन के प्रभाव के आधार पर थैलेसीमिया को दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है । पहला मेजर तथा दूसरा माइनर । मेजर थैलेसीमिया में रोगी को बार–बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पडती है, जबकि माइनर एक प्रकार से थैलेसीमिया जीन के वाहक का कार्य है । इसलिए विवाह के दौरान रक्त परीक्षण के माध्यम से यह पता चल सकता है कि जीवन साथी में थैलेसीमिया जीन का वाहक है अथवा नहीं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में प्रति वर्ष ८ से १० हजार थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है । आंकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या का लगभग साढे तीन प्रतिशत भाग थैलेसीमिया ग्रस्त होता है । इंग्लैंड में केवल ३५० पाकिस्तान में एक लाख तथा भारत में लगभग १० लाख बच्चे इस रोग से पीडि़त है । यदि माता–पिता दोनों में माइनर थैलेसीमिया है तो बच्चों को यह बीमारी होने की २५ फीसद आशंका रहती है ।
इस रोग के चेहरे का शुष्क रहना, चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, वजन न बढ़ना, सामान्य विकास में विलंब प्रमुख लक्षण है । सुक्षमदर्शी यंत्र (माइक्रोस्कोप) की सहायता से रक्त परीक्षण के समय लाल रक्त कण की संख्या में कमी तथा उसके बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है । कम्पलीट ब्लड काउंट से एनीमिया का पता चलता है । इसी प्रकार हीमोग्लोबीन इलेक्ट्रोफोरेसीस से असामान्य हीमोग्लोबीन की स्थिति की जानकारी होती है । म्यूट्रेशन एनालिसिस टेस्ट के जरिये अल्फा थैलीसीमा के जांच के संबंध में जानकारी की जा सकती है । थैलेसीमिया पीडि़त व्यक्ति के इलाज में बाहरी खून चढ़ाने पर १२ से १५ वर्ष की आयु के मध्य बच्चों की मृत्यु हो जाती है । इस रोग में बोनमैरो ट्रांसप्लांट के साथ ही स्टेमलेस के जरिये भी इलाज लाभप्रद होता है ।
थैलेसीमिया के लक्षण
थैलेसीमिया माइनरः इसमें अधिकतर मामलों में कोई लक्षण नजर नहीं आता हैं । कुछ रोगियों में रक्त की कमी या एनीमिया हो सकता हैं ।
थैलेसीमिया मेजरः जन्म के ३ महीने बाद कभी भी इस बीमारी के लक्षण नजर आ सकते हैं ।
– बच्चों के नाखÞून और जीभ पीली पड़ जाने से पीलिया और जौंडिस का भ्रम पैदा हो जाता है ।
– बच्चे के जबड़ों और गालों में असामान्यता आ जाती हैं ।
– बच्चे का विकास रुक जाता है और वह उम्र से काफी छोटा नजर आता हैं ।
– सूखता चेहरा
– वजन न बढ़ना
– हमेशा बीमार नजर आना
– कमजोरी
– सांस लेने में तकलीफ
निदान
बच्चे में थैलेसीमिया की आशंका होने पर निदान करने के लिए नीचे दिए हुए जांच किये जाते हैं–
शारीरिक जांच ः व्यक्ति की शारीरिक जांच और सवाल पूछ कर डॉक्टर थैलेसीमिया का अंदाजा लगा सकते है । पीडि़त व्यक्ति में रक्त की कमी के लक्षण, लीवर और स्प्लीन में सूजन और शारीरिक विकास में कमी इत्यादि लक्षणों से थैलेसीमिया का अंदाजा आ जाता हैं ।
रक्त की जांच ः माइक्रोस्कोप के नीचे रक्त की जांच करने पर लाल रक्त कण के आकार में कमी और अनियमितता साथ ही हीमोग्लोबिन की कमी से थैलेसीमिया का निदान हो जाता हैं । हीमोग्लोबिन एलेक्ट्रोफोर्सिस जांच में अनियमित हीमोग्लोबिन का पता चलता हैं । म्युटेशनल एनालिसिस जांच करने पर अल्फा थैलेसीमिया का निदान किया जाता हैं ।
उपचार
रक्त चढ़ाना ः थैलेसीमिया का उपचार करने के लिए नियमित रक्त चढाने की आवश्यकता होती हैं । कुछ रोगियों को हर १० से १५ दिन में रक्त चढ़ाना पड़ता हैं । ज्यादातर मरीज इसका खर्चा नहीं उठा पाते हैं । सामान्यतः पीडि़त बच्चे की मृत्यु १२ से १५ वर्ष की आयु में हो जाती हैं । सही उपचार लेने पर २५ वर्ष से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं । थैलेसीमिया से पीडि़त रोगियों में आयु के साथ–साथ रक्त की आवश्यकता भी बढ़ते रहती हैं ।
खेलासोन थेरेपी ः बार–बार रक्त चढाने से और लौह तत्व की गोली लेने से रोगी के रक्त में लौह तत्व की मात्रा अधिक हो जाती हैं । लीवर, स्पीलिन, तथा हृदय में जरुरत से ज्यादा लौह तत्व जमा होने से ये अंग सामान्य कार्य करना छोड़ देते हैं । रक्त में जमे इस अधिक लौह तत्व को निकालने के प्रक्रिया के लिए इंजेक्शन और दवा दोनों तरह के ईलाज उपलब्ध हैं ।
बोन मेरो ट्रांसप्लांट ः बोन मेरो ट्रांसप्लांट और स्टेम सेल का उपयोग कर बच्चों में इस रोग को रोकने पर शोध हो रहा हैं । इनका उपयोग कर बच्चों में इस रोग को रोक जा सकता हैं ।
जागरूकता ः आज समाज में थैलेसीमिया को लेकर अज्ञानता हैं । हमें थैलेसीमिया से पीडि़त लोगो में इस रोग संबंधी जागरूकता फैलानी चाहिए ताकि इस रोग के वाहक इस रोग को और अधिक न फैला सके ।
गर्भावस्था ः अगर माता–पिता थैलेसीमिया से ग्रस्त है तो गर्भावस्था के समय प्रथम ३ से ४ माह के भीतर परीक्षण द्वारा होनेवाले बच्चे को थैलेसीमिया तो नहीं है, इसका परीक्षण करना चाहिए । बच्चे को थैलेसीमिया होने पर गर्भपात कराना चाहिए ।
शादी ः हमारे यहाँ अक्सर शादी करने से पहले लड़के और लड़की की कुंडली मिलाई जाती है और फिर शादी की जाती हैं । थैलेसीमिया से बचने के लिए शादी से पहले लड़के और लड़की की स्वास्थ्य कुंडली मिलानी चाहिए, जिससे पता चल सके की उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं । स्वास्थ्य कुंडली में थैलेसीमिया, एड्स, हेपेटाइटिस बी और सी, आरएच फैक्टर इत्यादि की जांच करानी चाहिए । भारत में थैलेसीमिया को ग्राहय और कैरी करनेवाले कुछ विशेष जाति के लोग ज्यादा हैं, जैसे की ब्राह्मण, गुजराती, सिंधी, पंजाबी, बोहरा और मुस्लिम जाति के लोगों को रोकथाम के लिए स्वास्थ्य कुंडली का परीक्षण अवश्य कराना चाहिए ।

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