थोक भाव में मिल जाए“गे अच्छे लोग

मुकुन्द आचार्य :इस दुनियाँ में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं । एक ढूँढो हजार मिलते हैं । बस… ढूँढने वाले का नजरिया जरा साफ सुथरा होना चाहिए । गंदी नजरों से अच्छी चीज ढूंढÞेंगे तो कहाँ से मिलेगी – अजी, थोक भाव में मिल जायेंगे अच्छे लोग, जरा तबीयत से ढूंढÞो यारों ।gen
अभी हाल ही में मेरे साथ एक वाकया पेश आया । मेरी कर्मभूमि -वीरगंज) मुझे कुछ दिनों से आवाज दे रही थी । ‘आ जा बेटे ! क्या कंक्रीट के जंगलों में खोए हो ! यहाँ तर्राई की ठंडी-ठंडी पुरवैया, मच्छरों का मधुर संगीत, धूल भरी हवा, खराब तेल में तले अच्छे पकोडÞे देहाती दही- सब तुम्हें बुरी तरह से याद कर रहे हैं बेटा … । बथुए की सब्जी तेरी राह तक रही है । बैगन का भर्ता भला तुझे कैसे भुला पाता ! आ जा ममता की छांह में, थोडÞे दिनों के लिए ही सही । मैं न रोक सका खुद को ।
मैं सर के बल दौडÞा चला गया । सारे के सारे पत्रकार, अपत्रकार, कुपत्रकार, सुपत्रकार, पर्सर्ााजला के सदरमुकाम वीरगंज में अपने-अपने अखाडÞे में अपने चेले-चपाटों को चुनावी कुस्ती का दावपेंच सिखा रहे थे । खिला-पिला कर तालीम दी जा रही थी ।
वीरगंज की हर गली-चौक में पत्रकार व्यस्त, मस्त मिल जाते । उजले केश वाले मुझे ‘भैया’ कहते, काले केश वाले ‘अंकल’, ‘काका’, ‘बाबा’ बोलते । सब की बोली में मिठास कूट-कूट कर भरी थी । सब सेवा करने को लालायित । चाय और पान की तो बात ही मत पूछिए । चाय और कोक-पेप्सी पीते- पीते पेट गैस का स्टोर बन गया । पान से दोनों गलफडÞ छिल गए । चूना ने मुँह को चूना लगा दिया । खाने वाले कम और खिलाने वाले ज्यादा । ऐसे खुशगवार नजारे जिन्दगी में देखने को कम ही मिलते हैं । मैं तो अपनी खुशकिस्मती पर निहाल हो गया ।
नास्ता जब जहाँ जी करे भर पेट डकार जाईए । शाम को वीरगंज के होटलों में जम कर शराब और कबाव पर हाथ साफ कीजिए । एक रोज तो काउंटर में छोटी-मोटी मारपीट ही हो गई । ‘आज का खर्चा मैं दूंगा ।’ ‘आज की शाम मेरे नाम !’ कहने वालों में बहुत सारे दिलदार थे । जिस देश का पत्रकार इतना उदार हो, उस देश को आगे बढÞने से कौन माई का लाल रोक सकता है । मैं तो इसी खुशफहमी में घंटों खुश रहता, घंटा घर के नीचे ।
वीरगंज को अक्सर लोग आर्थिक नगरी भी कहते हैं । अब तो मुझे भी इस बात पर यकीन आ गया । क्योंकि हर पत्रकार खर्च करने को तैयार । मेरे एक पुराने मित्र ने फुसफुसाया- फलां उम्मीदवार ने फलां पत्रकार को लाख रुपये दिए हैं । जाने-माने मक्खीचूस और समय में एक कप चाय भी नहीं पिलाता, वही आज अन्य पत्रकारों को वोट के लिए अंटी ढीली कर रहा है । उससे होशियार रहना । बडÞा भारी मक्कार है । पैसा भी ले लिया और देख लेना, पैसा देने वाला भी हार जाएगा । मैंने उस खैरख्वाह दोस्त की बात को मान भी लिया, नकार भी दिया । मुझे पता था, वो भी उसी अखाडÞे के खिलाडÞी थे । खैर … आर्थिक नगरी में अर्थ का खिलवाडÞ तो होता ही है ।
उन चार-पाँच दिनों के दौरान मैंने जूते में पालिश नहीं की । पैर छू कर ‘प्रणाम !’ के गोले दागने वाले बहुतेरे वोट की भिक्षा माँगने वालों ने ”पा लगी’ करते-करते जूते चमका दिए । कहाँ मिलते हैं जी ऐसे सज्जन ! ऐसे ही अच्छे लोगों के चलते तो दुनियाँ जीने लायक है ।
कहीं भी आना-जाना हो, गाडÞी हाजिर । कोई कहता- आप कहाँ जा रहे हैं – ठहरिए, मैं गाडÞी से आप को वहाँ तक छोडÞ देता हूँ ।
कोई बाँंह पकडÞ कर खींचता, चलिए ठंडÞा पी कर आया जाए । आप भी क्या धूप खा रहे हैं !
किसी की ओर से पान के बीडÞे तश्तरी में सजा कर बार-बार पेश किए जाते । लगता था, किसी बाई जी के मुजरे में बैठे हैं । एक सज्जन इतने उदार दिल वाले थे, उनका क्या कहना । भेष बनाया था, हिन्दी फिल्म के खलनायक जैसा । बोलने ओर डोलने का फिल्मी अंदाज । मुंह में गिलौरी । हाथ दोनों जुडÞे हुए । लम्बी सी चुनरी जमीन को छूती हर्ुइ । चेहरे पे कुटिल मुस्कान । बाँकी अदा के साथ ‘वोट’ मांग रहे थे । कोई कैसे ना करता । उन्हें यकीन था, भेष से भी भिक्षा मिल जाती है । बेवकूफों की कमी नहीं ।
बाद में पता चला, इनकी गाडÞी तो शराब की बोतलेां से भरी पडÞी थी । वीरगंज आर्थिक नगरी न होती तो क्या ऐसे ठाठ देखने को मिलते – वाकई वीरगंज आर्थिक नगरी है । कोई माने या न माने, मैं तो मान गया । वर्षों से सैकडÞों पत्रकार यहाँ अपनी कलम का जादू क्या ऐसे ही बिखेर रहे हैं ।
एक होनहार नवयुवक पत्रकार जब भी सामने पडÞता, वो अपने लिए एक वोट जरूर मांगता । मतदान समाप्त हो जाने पर भी वो तो मत मांग रहा था । मैंने हैरानी से एक दूसरे पत्रकार मित्र से कहा- यह पागल है क्या – मतदान समाप्त हो जाने पर भी वोट माँग रहा है । मेरे सवाल पर पत्रकार मित्र ने ‘हा’ ‘ना’ कुछ भी नहीं कहा ।
इस बात का जवाब एक तीसरे पत्रकार ने ऐसे दिया, ‘यह तो दो साल बाद में होने वाले चुनाव के लिए अभी से मत माँग रहा है । यह पागल नहीं दूरदृष्टि वाला होनहार युवक है ।’
वाह ! क्या दूरदृष्टि है । लोग कितने सज्जन हैं । सब के चेहरे पर मुस्कुराहट । आँखों में अनोखी चमक । किसी-किसी की अन्दर तक घूरती आँखें । किसी की सूखी-सूखी, भूखी-भूखी आँखे । एक पत्रकार ने तो ऐलान कर दिया- ऐसे चुनाव ही तो पत्रकारों के लिए ‘दशहरा’ है । खाओ-पीओ, मौज करो । ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता । राम नाम की लूट है, लूट सके सो लूट !
अब आप ही बताईए, इस घनघोर कलियुग में इतने सज्जन पत्रकार कहाँ मिलेंगे, जी ! ऐसे ही सज्जनों के चलते धरती टिकी हर्ुइ है । नहीं तो कब की रसातल में चली गई होती । है न सोलहो आने खरी बात –
अजी, ना उम्मीद होने की कोई जरूरत नहीं । जिस देश में पत्रकार्रर् इमानदार और इतने सज्जन हों, उस देश की ओर कोई टेढÞी नजर से देख भी नहीं सकता । अच्छे बन्दों की कोई कमी नहीं, आप जरा गौर फरमाएं तो सही ।

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