दंगल में जीते दादा, आगे की कवायद जारी

कुमार सच्चिदानन्द:विभिन्न अर्न्तर्दलीय और बहिर्दलीय दंगल को जीतकर ‘सुशीलदा’ के नाम से पार्टर्ीीें ख्यात सुशील कोइराला द्वितीय संविधानसभा द्वारा निर्वाचित प्रथम प्रधानमंत्री बने और काफी जद्दोजहद के बाद नेकपा एमाले की लगभग पचास प्रतिशत सहभागिता को आधार बनाकर उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का प्रथम विस्तार किया । इस तरह लम्बे समय से अवरुद्ध राजनैतिक प्रक्रिया ने पर्ूण्ाता पायी । वैसे राजनीति में सत्ता और अवसर तो महत्वपर्ूण्ा होते ही हैं, लेकिन नेपाल की अन्दरुनी राजनीति इसके लिए अधिक कुख्यात रही है । यही कारण रहा है कि लगभग २२ वर्षों की लोकतांत्रिक यात्रा में राजनैतिक स्थिरता इस देश के लिए दिवास्वप्न बनकर रह गयी है । आज नेपाल का नाम विश्व के पिछडÞे देशों में शुमार है तो यह अभिशाप नहीं, क्योंकि व्यवस्था और विकास आकस्मिक होने वाली घटना नहीं होती । यह क्रमिक रूप में किसी देश में घटित होती है, अभिशप्त हम स्वयं को इसलिए मान सकते हैं कि देश को इस अवस्था से निकालने के लिए नेतृत्व मंे जिस राजनैतिक चिन्तन, दूरगामी सोच और लोक-संग्रह की भावना होनी चाहिए, उसका र्सवथा अभाव यहाँ देखा जा रहा है । इसलिए सरकारें इसके पर्ूव भी आयीं हैं और इसके बाद भी आएँगीं । shusil koiralaमहत्वपर्ूण्ा यह नहीं है । महत्वपर्ूण्ा यह है कि देश में शांति, समृद्धि, स्थिरता और विकास को घटित करने के लिए यह सरकार कितना स्वयं को सक्षम साबित कर सकती है । इस गठबंधन की सरकार के साथ एक अच्छी बात यह है कि इसके दो प्रमुख घटक ही लगभग दो तिहाई के आँकडे के करीब हैं, जो संविधान और सरकार दोनों के निर्माण और संचालन के लिए आदर्श है । लेकिन राहें इतनी आसान भी नहीं ।
प्रधानमंत्री के रूप में कोइराला के साथ सबसे महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि वे नेपाली राजनीति के चाहे नए पात्र नहीं हों मगर प्रधानमंत्री के रूप में वे नेपाली राजनीति के बिलकुल नए हस्ताक्षर हैं । सत्ता के गलियारे में उनके पदचाप पहले भी सुने जाते रहे हैं, लेकिन शासन की प्रत्यक्ष बागडोर पहली बार उनके हाथ में है । फिर उनके व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तित्व के भी कुछ पक्ष ऐसे हैं जो उनकी ओर आम लोगों में आकर्षा पैदा करते हैं । र्सवप्रथम कि जहाँ अवसरवादिता और स्वार्थपरकता का आरोप समग्र रूप में नेपाली राजनीति पर लगता रहा है, वहाँ वे राजनीति के ऐसे पात्र हैं जिन्होंने कई बार अवसर को ठुकराया है । दूसरा महत्वपर्ूण्ा पक्ष यह है कि वे व्यक्तिगत जीवन में अविवाहित हैं । उच्च चिन्तन के ऐसे लोग गौतम बुद्ध के ‘अपर्रि्रह’ की भावना से चाहे पर्ूण्ा रूप से संचालित न हों तो भी सामान्य रूप से अनावश्यक संचय के प्रति वे वीतराग हो ही जाते हैं । भ्रष्टाचार के पंक से पंकिल हमारी राजनीति में कोईराला का यह भी एक सकारात्मक पक्ष है । वर्तमान संविधानसभा के समानुपातिक सभासदों के चयन में हमारे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों पर रिश्ते-नाते के आधार पर चयन का आरोप लगा है और सत्ता के भागीदारों पर भी समय-समय पर इस तरह के आरोप लगते रहे हैं । ऐसे मे कोईराला पर उनके परिवारजनों का आरोप है कि वे पारिवारिक रिश्तों को अहमीयत नहीं देते । माना जा सकता है कि वे सन्त प्रकृति के नेता हैं जो संकर्ीण्ा मानसिकता से ऊपर उठकर देश के लिए नया कुछ सोच सकते हैं । लेकिन गौरतलब है कि वर्तमान संविधानसभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीीे अध्यक्ष होने के कारण बहुमत न होने के बावजूद नेकपा एमाले ने उन्हे अपनी पार्टर्ीीे सरकार का नेतृत्व करनेे का आग्रह तो किया मगर प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचने के लिए पार्टर्ीीे भीतर जिस रस्साकसी और चढÞाव-उतार उन्हें झेलने पडÞे, उससे यह सिद्ध होता है कि पार्टर्ीीे भीतर भी वे र्सवमान्य नहीं हैं और कदम-कदम पर उन्हें चुनौतियों का सामना करना पडÞ सकता है । दूसरा महत्वपर्ूण्ा तथ्य यह है कि विगत चुनाव में भी देश के भीतर उनके पक्ष में कोई ऐसी लहर नहीं देखी गई कि व्यक्तित्व की विराट छाया को देखकर प्रतिद्वन्द्वी सहम जाए । माना जा सकता है कि जिस तरह की आन्तरिक गुटबाजी का सहारा लेकर उन्होंने पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेता शेररबहादुर देउवा को न केवल पार्टर्ीीे आन्तरिक निर्वाचन में पराजित किया बल्कि उन्हें पार्टर्ीीे कार्यवाहक अध्यक्ष पद से अलग रखा, यह स्थिति भविष्य में उनके लिए कठिन चुनौती का कारण बन सकती है । जिस साठ और चालीस फीसदी का आँकडÞा पार्टर्ीीे अन्दर आज उन्हें सबलता दे रहा है, भविष्य में आन्तरिक असन्तोष उन्हें कमजोर भी बना सकता है ।
nepal hindiआज एमाले मौजूदा सरकार की सबसे बडÞी बैसाखी है और सरकार तथा  इसके र्समर्थन में लगभग आधे की हैसियत में है । लेकिन गृह मंत्रालय को लेकर दोनों दलों के बीच लम्बे समय तक चला घमासान नेपाली राजनीति की क्षुद्र प्रवृत्ति का संकेत देता है । इस मंत्रालय की देन-लेन में आकर्षा, भय और जीद का जो आलम देखा गया उससे स्पष्ट होता है कि हमारी राजनीति ने अब तक अतीत से सबक नहीं लिया । सवाल मंत्रालय का नहीं, सवाल उस प्रवृत्ति का है जिसके तहत हमारे दल कार्यकर्ताओं के कल्याण की भावना से ऊपर उठकर देशहित और लोकहित में सोच ही नहीं पाते । इस लिए मंत्रालय विशेष के प्रति हमारी मारामारी शुरू होती है । शासन की समस्त शक्ति का संचालन हम दलगत हित में करना चाहते हैं । प्रशासनिक और आर्थिक नीतियाँ भी हमारी पर्ूवाग्रही होती हैं । यही कारण है कि विगत दो दशक में विभिन्न दलों की सरकारें बनीं । सरकार का नेतृत्व कर रहे हर दल के अनेक नेताओं ने समयक्रम में विभिन्न सरकारों का नेतृत्व किया । लेकिन कारण कुछ भी रहा हो, कुछ नया देने में सारे लोग अर्समर्थ रहे हैं । यही वह नकारात्मक पक्ष है कि किसी दल या नेता के पक्ष में आम लोगों में ध्रुवीकरण नहीं देखा गया है । यही कारण है किसी भी चुनाव में किसी भी दल को प्रचण्ड बहुमत नहीं मिल पाया है और असफलता का सारा दारोमदार उन्हीं आमलोगों के माथे यह कहकर मढÞ दिया जाता है कि उन्हें बहुमत नहीं मिला । सवाल है कि क्या गठबंधन की सरकारें अच्छा नहीं करतीं – जबाब ढूँढा जा सकता है कि अगर जनपक्ष मेर्ंर् इमानदारी और निष्ठा हो तो किया जा सकता है । क्योंकि लोकतंत्र में आम लोगों की ताकत और भय महत्वपर्ूण्ा होता है । निश्चित ही इस वर्ग की संवेदना बटोरने लिए कोइराला को पारम्परिक राजनीति से हट कर नया कुछ सोचना और करना होगा ।
कोईराला के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे अक्खडÞ व्यक्तित्व के स्वामी हैं । लेकिन राजनीति एक ऐसा अजगर है जो व्यक्तित्व को अपनी कुंडली में बुरी तरह कस कर मरोडÞता है । इस बात का उदाहरण नेपाली राजनीति में पर्ूवप्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल से बेहतर कौन हो सकता है – मुख्यधारा की राजनीति करते हुए उन्होंने न जाने कितनी करवटें मारी हैं कि अब उन्हें भी समझना मुश्किल सा सबक होगा कि उनकी वर्तमान स्थिति क्या है – गृह मंत्रालय नेकपा एमाले को देने के सवाल पर प्रारम्भिक रूप में कोइराला ने अपने अक्खडÞपन का परिचय तो दिया लेकिन पार्टर्ीीे अन्दरूनी तालमेल के अभाव के कारण जिस तरह उन्होंने करवट मारी उससे यह साफ हो गया कि nepali gindi magazineप्रधानमंत्री पद और उसकी स्थिरता के लिए वे किस हद तक लचीला बन सकते हैं । विरोध इस लचीलेपन से नहीं है क्योंकि यह राजनीति की फितरत है । सवाल है कि यह लचीलापन अगर बरकरार रहा तो यह फिसलन भरी राहें भी तैयार कर सकता है । क्योंकि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं । दलों के आन्तरिक और वाहृय दबाब के बादल माथे पर मँडरा रहे हैं, जहाँ परम्परागत राजनीति अपनी समस्त कुरूपताओं के साथ मौजूद है । आज उनके समक्ष यह चुनौती है कि वे व्यक्तित्व की अक्खडÞता और लचीलेपन का प्रयोगकर राष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय राजनीति और कूटनीति को किस तरह अपने पक्ष में समन्वित कर पाते हैं ।
एक बात तो मानी ही जानी चाहिए कि नेपाल आज राजनैतिक स्तर पर संक्रमण के दौर से गुजर रहा है । नवीन राजनैतिक चेतना परम्परागत राजनैतिक चेतना से आमने-सामने की अवस्था में है । यह सच है कि जिसे आज हम पराजित समझ कर दरकिनार करने की कोशिश कर रहे हैं, आज जो नेपाल में परिवर्तन देखा जा रहा है, उसी की धमक का परिणाम है । लेकिन उस संवेदना को छोडÞ कर आगे बढÞने का कोई भी प्रयास देश के लिए विधायी नहीं हो सकता । यह महज इत्तफाक है कि सरकार में शामिल दोनों ही महत्वपर्ूण्ा दल भले ही मध्यम और वाममार्गी राजनीति का प्रतिनिधित्व करते दिखलाई दे रहे हों मगर मौजूदा समय में विचारधारा के स्तर पर दोनों ही लगभग समान स्थिति में हैं और दोनों मिलकर दो तिहाई बहुमत की स्थिति में भी हैं । इसलिए राष्ट्र और राष्ट्रीयता की परिभाषा से लेकर शक्ति के विकेन्द्रीकरण और संघयीता जैसे मुद्दे पर दोनों का आधारभूत नजरिया एक ही है । आज इन दलों ने विगत चुनाव में जो सफलता प्राप्त की उसका एक मुख्य कारण यह है कि रणनीतिक रूप में इन दोनों दलों ने मधेशी बहुल क्षेत्रों में मधेशी उम्मीदवार दिये और सफलता भी प्राप्त की । लेकिन आज जो मंत्रिमण्डल का स्वरूप सामने आया है उसमें इन दोनों दलों ने इसकी उपेक्षा की है । नेपाली काँग्रेस के अन्दर शेरबहादुर देउवा समूह ने अपने हिस्से में मिले चार मंत्रालयों में दो मधेशी चेहरे को अवसर दिया है । यद्यपि चित्रलेखा यादव को अवसर देकर एक तीर से दो निशाना साधने की कोशिश उन्होंने की है कि एक ओर एक महिला को भी प्रतिनिधित्व दिया है और मधेशी मंत्रियों की संख्या में भी इजाफा किया है । अगर इस समूह के मंत्रियों को अलग कर दिया जाए तो विश्वास करना मुश्किल है कि इस देश की आधी जनसंख्या में अन्य समुदाय के लोग भी हैं ।
मौजूदा मंत्रीमंडल की नेकपा एमाले की अपनी व्याख्या है । मंत्रिमण्डल में र्सवथा असन्तुलित प्रतिनिधित्व के माध्यम से इस दल ने मधेश आन्दोलन की संवेदना से खुद को पूरी तरह अलग रखने का संकेत दिया है । इसके लाभ-हानि के दूरगामी असर चाहे जो भी हों लेकिन तत्काल तो उन्होंने यह स्पष्ट संकेत दे ही दिया है कि उनकी आगामी कार्यदिशा में कोई बदलाव या नयापन नहीं । इस पर भी महत्वपर्ूण्ा यह है कि इस दल ने मंत्रिमंडल में अपने दल के प्रतिनिधित्व के द्वारा एक तरह से लोकतंत्र की मूल्य-मान्यताओं के साथ ही खिलवाडÞ किया है । प्रत्यक्ष निर्वाचन में ९१ सीटों पर विजय प्राप्त किए इस दल ने प्राप्त दस में छः गैर सांसदों को मंत्रिमंडल में भेजा है । उनका तर्क है ‘पार्टर्ीीें योगदान और सबको अवसर ।’ यह सच है कि लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता की होती है । लेकिन हमारे यहाँ हर पार्टर्ीीें गुटबन्दी इतना प्रबल है कि मंत्री चाहे जिस किसी पार्टर्ीीे हों, उनकी पहली प्रतिबद्धता अपने गुट के नेताओं के प्रति होती है क्योंकि उनकी कृपा से वे इस रूप में स्वयं का वजूद मानते हैं । लेकिन गैर सांसदों को मंत्री बनाकर इस दल ने मतदाता के मतों की और मंत्री बनने की पात्रता की बचीखुची प्रतिबद्धता भी समाप्त कर दी है । अब सवाल उठता है कि अगर नेताओं द्वारा मनोनयन ही मंत्री पद का आधार है तो आम जनता के अमूल्य मत का मूल्य क्या है – इस गलत प्रवृत्ति को हतोत्साहित न कर पाना किसी हद तक सरकार के मुखिया की असफलता तो मानी ही जा सकती है ।
आज मौजूदा सरकार के लिए सबसे बडÞी चुनौती बनकर उसके सामने खडÞा है मधेश और इसकी संवेदना । यह सच है कि आज इससे जुडÞे लोग पराजय के मनोविज्ञान से गुजर रहे हैं और कुछ हद तक सुषुप्त भी हैं । मधेश समर्थित राजनैतिक दलों की स्थिति यह है कि वे आज एक निराशा के मनोविज्ञान से गुजर रहे हैं । कारण स्पष्ट है कि प्रथम संविधानसभा के कार्यकाल में प्रायः अधिकांश महत्वपर्ूण्ा मंत्रालयों पर मधेश समर्थित दलों के नेताओं का दबदबा रहा है । गृह, संचार, प्रतिरक्षा, विदेश, आपर्ूर्ति जैसे मंत्रालय उनके हाथ में रहे हैं । लेकिन आज वे सत्ता के गलियारे से पूरी तरह दूर हैं । विडम्बना यह है कि मधेश समर्थित दलों में ऐसे नेता भी रहे हैं जो र्समर्थन की थाली लेकर सत्ता के परिसर में कुलाचें मारने के लिए पूरी तरह तत्पर थे, मगर उन्हें किसी ने पूछा तक नहीं । आज उनके पास भी अवसर है कि अपनी स्थिति की पहचान करें और अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करें । परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों लेकिन उन्हें भी अपनी सही स्थिति का ज्ञान कराने में मौजूदा राजनैतिक घटनाक्रमों ने अपना योगदान दिया है । आज इन दलों की स्थिति यह है कि ये आम लोगों के बीच अपनी उपेक्षा की आवाज लेकर भी नहीं जा सकते । लेकिन सरकार के कदमों पर तो इनकी पैनी नजर रहेगी ही । पहला अवसर तो मंत्रिमण्डल की असंगत संरचना ने इन्हें दे दिया है । आज इनके बीच एकीकरण के जो प्रयास हो रहे हैं, अगर वह सफल हुआ तो एक सकारात्मक संदेश तो सम्बद्ध क्षेत्र में जाएगा ही, अपने असंतुलित और असंयमित कार्यांे के द्वारा मौजूदा सरकार भी उन्हें जागरण का संदेश देगी ।
समय कोई भी हो, अवसर के साथ चुनौतियाँ होती ही हैं । स्वाभाविक रूप में मौजूदा नवगठित सरकार के साथ भी चुनौतियाँ हैं । लेकिन इनकी सबसे बडÞी चुनौती है निर्धारित समय पर संविधान राष्ट्र को समर्पित करना । इस सर्न्दर्भ में सबसे महत्वपर्ूण्ा है कि लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धान्तों के अनुसार इसमें हर वर्ग की संवेदना को समेटने का प्रयास होना चाहिए । यह सच है कि संविधान को र्सवमान्य बनाना संभव नहीं मगर इसे बहुजन मान्य बनाने का प्रयास तो होना ही चाहिए । किसी क्षेत्र या वर्ग की संवेदना की उपेक्षा इसके दर्ीघजीवन पर प्रश्न-चिहृन खडÞा करेगी । मौजूदा सरकार के लिए सबसे सहज पक्ष है कि मात्र दो दलों की संख्या से वह दो तिहाई के आँकडÞे को छू सकती है । लेकिन यही सहजता उसके लिए असहजता का कारक भी बन सकती है । क्योंकि सरकार निर्माण के र्समर्थन के लिए जिस तरह राष्ट्रपति के चुनाव से लेकर गृहमंत्रालय प्राप्त करने का मुद्दा उन्होंने उठाया, सभासदों के शपथ-ग्रहण से लेकर मंत्रियों के चयन और शपथ-ग्रहण तक में उन्होंने जिस प्रकार क्षेत्रीय संवेदना की उपेक्षा की उससे स्पष्ट है कि उन्होंने अपनी जिद को पूरी करवाने का तरीका ढँूढ लिया है और इस तरह की परिस्थितियाँ भविष्य में भी आ सकती हैं । इस आग्रह-पर्ूवाग्रह का असर संविधान-निर्माण की कार्य-तालिका पर भी पडÞ सकता है । लेकिन व्यक्तित्व का मूल्यांकन भी कठिन परिस्थितियों में ही होता है । ‘सुशील दा’ परिपक्व, समर्पित, अक्खडÞ और सन्त प्रकृति के नेता माने जा रहे हैं । वे इस पर विजय प्राप्त कर नेपाल के ऐतिहासिक प्रधानमंत्री बन सकते हैं । अवसर उनके हाथ में है । इतिहास उनकी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है ।

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