दक्षिणपंथ की हवा और नेपाल : कुमार सच्चिदानन्द

इस उपेक्षित और मुख्यधारा से कटे लोगों के प्रति इनके नेताओं द्वारा समय–समय पर जो वक्तव्य उभर कर सामने आए हैं उसे आपत्तिजनक ही नहीं बल्कि घोर निन्दनीय भी कहा जा सकता है । सवाल उठता है कि राष्ट्रवाद की जिस विचारधारा को आधार बनाकर वे चल रहे हैं क्या उससे वास्तव में राष्ट्र का कल्याण संभव है ?

कुमार सच्चिदानन्द, वीरगंज २० अप्रैल |

राजनीति समय–समय पर करवटें लेती रहती है । लेकिन इन करवटों से बनीं सलवटों का प्रभाव आमलोगों के मनोविज्ञान पर भी पड़ता है । कभी इसे वह अपने अनुकूल समझती है और कभी प्रतिकूल । मगर स्थिति चाहे कुछ भी हो, यह चक्र चलता रहता है । वैसे भी राजनीति में दो धाराएँ स्पष्ट रूप से दिखलाई देती है—वामपंथ और दक्षिणपंथ । इन दोनों के बीच एक उदारपंथ की अवधारणा भी है जो आर्थिक चिन्तन के आधार पर वामपंथ से प्रभावित तो दिखलाई देता है लेकिन लोकतंत्र की चासनी में डुबाकर इसे प्रस्तुत करता है । यह बात सच है कि उदारपंथी राजनैतिक चिन्तन मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर आदर्श माना जाता है । लेकिन यह भी सच है कि इस पर वामपंथ और दक्षिणपंथ की चोटें पड़ती रही हैं । कभी फासीवाद या नाजीवाद के द्वारा तो कभी वामपंथी अतिवाद के द्वारा । लेकिन यह विचारधारा आज भी लोकप्रिय है । इसके बावजूद इतना कहा जा सकता है कि मौजूदा वैश्विक राजनीति में विशुद्ध रूप में इन दोनों ही विचारधारों की निःसारता सिद्ध हो चुकी है । इसलिए वाम और दक्षिण दोनों ही विचारधाराएँ इसका आवरण पहन कर राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है और अनेक देशों में यह प्रयोग सफल भी हो रहा है । नेपाल में भी इसकी छाया देखी जा सकती है ।
दक्षिणपंथ एक ऐसा राजनैतिक चिन्तन है जो एक तरह से राष्ट्रवादी विचारधारा की दुहाई देता है और देश की समस्त आधारभूत समस्याओं से मुख मोड़कर राष्ट्र के तथाकथित हितों के लिए व्यक्तिगत हितों की कुर्बानी देने की वकालत करता है । इसलिए इससे अतिवाद की बू भी कभी–कभी आती है । इसी अतिवादी चिन्तन के कारण इतिहास में इसका कभी–कभी विद्रूप स्वरूप भी सामने आया । चूँकि इसमें आक्रामकता अधिक होती है और इस कारण यह संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता है । कभी राजतन्त्रात्मक तानाशाही तो कभी राज्य का धार्मिक अतिवाद भी इसी का एक स्वरूप है । राष्ट्र की परिभाषा एक ऐसे जनसमूह के रूप में की जा सकती है जो एक भौगोलिक सीमा में निश्चित देश में रहता हो, समान परम्परा, समान हितों तथा समान भावनाओं से बँधा हो और जिसमें एकता के सूत्र में बाँधने की समान उत्सुकता और समान राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ पायी जाती हो । राष्ट्रीयता की भावना किसी राष्ट्र के सदस्यों में पायी जानेवाली सामुदायिक भावना है । जो उनके संगठन को सुदृढ़ रखता है । यही तात्विक अन्तर दोनों में दिखलाई देता है । राष्ट्रीयता जहाँ सबको लेकर चलना चाहती है वहीं राष्ट्रवाद में राष्ट्र के नाम पर कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाएँ कुचलने की भावना भी होती है । इसलिए किसी न किसी रूप में यह अन्तर्संघर्ष भी पैदा करता है ।
आज दक्षिणपंथी राजनीति की हवा से लगभग पूरा विश्व प्रभावित है । इस्लामिक देशों की राजनीति में धार्मिक कट्टरता का जो रूप और इसे स्थापित करने के लिए जो अन्तर्संघर्ष देखा जा रहा है उसे दक्षिणपंथी राजनीति का ही प्रभाव माना जा सकता है । आश्चर्य इस बात का भी है कि विश्व में लोकतंत्र की गहरी जड़ों वाले देशों में भी दक्षिणपंथी राजनैतिक विचारधारा अपनी जड़ें जमा रही है । अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की विजय और भारत में भारतीय जनतापार्टी की सरकार का नेतृत्व कर रहे नरेन्द्र मोदी के व्यापक जनसमर्थन को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है । हाल ही में भारत के उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की व्यापक विजय की जमीन यही है । यह बात सच है कि भारतीय स्वतंत्रता के बाद ही भारत की बौद्धिक और राजनैतिक चिन्तन पर वाम नहीं बल्कि परिष्कृत वाम मार्ग का कब्जा रहा है । जिसे दूसरे शब्दों में उदारपंथ भी कहा जाता है । एक तरह से इसने राष्ट्र की आन्तरिक शक्तियों को कमजोर किया है और पारम्परिक बौद्धिक मनीषा पर आघात किया है । इसी के प्रतिक्रियास्वरूप भारत में भाजपा का प्रचण्ड बहुमत उभरकर सामने आया और देश का मौजूदा जो राजनैतिक मिजाज देखा जा रहा है उसके मद्देनजर सन् २०२४ तक इसकी निरन्तरता जारी रहने की संभावना है । इसी तरह की परिस्थिति अमेरिका में भी रही जहाँ अप्रवासन और धार्मिक कट्टरवाद से देश की रक्षा के निमित्त ट्रम्प विकल्प बनकर उभरे ।
नेपाल आज इसी दक्षिण और वामपंथ के संघर्ष में उलझा हुआ है । विगत एक दशक का संक्रमणकाल का अन्त अब तक नहीं हुआ । यह सच है कि नेपाल में वाम और उदार राजनैतिक विकल्पों के पर्याप्त अवसर हैं लेकिन इस विचारधारा से संचालित दलों की सबसे बड़ी सीमा यह रही है कि जनविश्वास को उस स्तर तक कोई भी दल बटोर नहीं पाया जिसके आधार पर वह राष्ट्र को नई दिशा की ओर ले जा सके । यही कारण है कि यहाँ चुनाव तो होते हैं मगर स्पष्ट बहुमत किसी दल को नहीं आता, सरकारें तो बनती हैं मगर वे इतने खम्भों पर खड़ी होती हैं कि स्वयं में संतुलन स्थापित करना उनके लिए मुश्किल सा सबक होता है और इसकी अधिकतम ऊर्जा इसी संतुलन को प्राप्त करने में समाप्त हो जाती है तथा अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे गौण हो जाते हैं । इसलिए यहाँ के कुछ दलों में भी दक्षिणपंथी विचारधारा धीरे–धीरे हावी होती जा रही है और राजनीति में वह अपना आकार प्राप्त करना चाहती है । लेकिन जो भी दल इस विचारधारा को वहन कर आगे बढ़ना चाहते हैं वे शायद यह नहीं समझ पा रहे अमेरिका और भारत जैसे देश किसी भी तरह के जन–विभेद से ऊपर उठ चुके हैं । उनके लिए इस तरह के मुद्दे राष्ट्र की आन्तरिक शक्तियों को मजबूत करने के हथियार हो सकते हैं । मगर नेपाल अभी उसी स्तर पर संघर्ष कर रहा है जहाँ देश की आधी से अधिक जनसंख्या स्वयं को विभेद का शिकार होने का दावा कर रही है और आधी आबादी को केन्द्र में रखकर राष्ट्रवाद के किसी भी नारे को अमली जामा नहीं पहनाया जा सकता ।
राजनीति के मूल में विचारधाराएँ होती हैं जिससे राजनीति की गाड़ी चलती है । लेकिन नेपाल में सबकुछ इतना गडमगड्ड है कि यहाँ कौन वाम और कौन दक्षिण–सबकी राग एक सी है । इसलिए तथ्यों को समझना भी मुश्किल होता है और समझाना भी । कहने के लिए नेपाल में वाम और दक्षिणमार्गी विचारधाराओं के साथ–साथ मध्यममार्गी दल भी हैं । मगर सत्ता और अवसर की भूख इनमें इतना ज्यादा है कि सिद्धान्तों को ताख पर रखकर समझौते करना और अवसर का लाभ लूटना इनकी फितरत बन चुकी है । इसलिए विचारधाराएँ गौण हो जाती हैं और इनका मिलाजुला स्वरूप सामने आता है । नेपाल के विभिन्न कम्युनिस्ट दलों को स्पष्ट रूप से वामपंथी राजनीतिक दलों के अन्तर्गत रखा जा सकता है और यहाँ हिन्दूराष्ट्र स्थापित करने के एजेण्डे को साथ लेकर चल रही पार्टियों को दक्षिणपंथी विचारधारा से संचालित पार्टी कही जा सकती है । इस दायरे में फिलहाल मधेश की राजनीति करने वाले दलों को भी रखा जा सकता है क्योंकि मधेश की मुक्ति इनकी एकसूत्रीय प्राथमिकता है । इसके लिए अतीत में भी इन्होंने बड़े–बड़े आन्दोलन किए हैं और वर्तमान समय में भी किसी न किसी रूप में उनका संघर्ष जारी है । ऐसा नहीं कि अन्य विचारधाराएँ इनके पास नहीं हैं लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इन्हें पल्लवित होने का अवसर नहीं मिला है । इसलिए मूल से अलग इनका यदि कोई एजेण्डा है भी तो उसे आकार देने में उन्हें समय लगेगा । बहरहाल कहा जा सकता है कि इनकी नीतियाँ चाहे जो भी हो मगर इन्हें दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में ही शुमार किया जा सकता है क्योंकि यह एक निश्चित वर्ग के कल्याण की बात करता है नेपाल की राजनीति आज इसी वाम और दक्षिण मार्ग के संघर्ष की कहानी है । राजनैतिक दलों का एक वर्ग ऐसा है जो किसी भी हालत में समता और समानतामूलक समाज की स्थापना के पक्ष में नहीं है और देश को परम्परागत शासन प्रणाली के अन्तर्गत चलाना चाहता है जबकि दूसरा वर्ग ऐसा है जो किसी हालत में पारंपरिक शासन प्रणाली का विरोध करता है और सदियों से किए जा रहे शोषण के चक्र से देश के दलित और उपेक्षित समुदाय को मुक्ति दिलाना चाहता है । यही संघर्ष और टकराव की एक जमीन है । एक वर्ग ऐसा है जो राष्ट्रवाद के नाम पर पूरे देश को एक ही साँचे में ढालना चाहता है जबकि दूसरा वर्ग ऐसा है जो अपनी पहचान को किसी भी हालत में गुमने नहीं देना चाहता । लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती । यहाँ के मध्यममार्गी दलों में भी ऐसे नेता हैं जो दक्षिणपंथी सोच से प्रभावित हैं और अपने–अपने दलों की नीतियों को प्रभावित करने में समर्थ हो जाते हैं जिसके कारण समस्याएँ सुलझने के बजाय और अधिक उलझ ही जाती हैं ।
यह बात तो साफ है कि विश्व की कोई भी राजनैतिक पार्टी दलित–उपेक्षित और मेहनतकश लोगों की वकालत करती है । लेकिन नेपाल की सबसे बड़ी विडम्बना है कि स्वयं को शुद्ध वामपंथी कहने वाला दल ही आज ऐसे राष्ट्रवाद की वकालत कर रहा है जिसकी परिभाषा के दायरे में देश की आधी जनसंख्या नहीं समाती । इस उपेक्षित और मुख्यधारा से कटे लोगों के प्रति इनके नेताओं द्वारा समय–समय पर जो वक्तव्य उभर कर सामने आए हैं उसे आपत्तिजनक ही नहीं बल्कि घोर निन्दनीय भी कहा जा सकता है । सवाल उठता है कि राष्ट्रवाद की जिस विचारधारा को आधार बनाकर वे चल रहे हैं क्या उससे वास्तव में राष्ट्र का कल्याण संभव है ? लगभग आधी जनसंख्या जिसका मुखर विरोध कर रही है, उसके अभाव में राष्ट्र को किस सूत्र में एकीकरण का पाठ पढ़ाया जा सकता है । किसी भी तरह के राजनैतिक अतिवाद के मार्ग पर अगर कोई भी दल चलता है तो उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि किसी एक निश्चित वर्ग को लेकर की जाने वाली राजनीति किसी निश्चित मुकाम की ओर हमें नहीं ले जा सकती । किसी न किसी रूप में देश में यह संघर्ष की जमीन पैदा करती है जिसे किसी भी रूप में विधायी नहीं मानी जा सकती ।
आज देश के माथे पर स्थानीय चुनाव का दायित्व है । यद्यपि इसकी अनिश्चितता दिखलाई दे रही है तथापि सरगर्मी भी जोरों पर है । इसलिए यह जो राष्ट्रवाद दिखलाई दे रहा है वह राष्ट्र के हितों से अधिक चुनावी हितों को लक्षित है । क्योंकि ऐसे मुद्दे तलाशने में यहाँ के दल असक्षम रहे हैं जो चुनावों में उनकी नाव को जीत तक ले जा सके । ऐसे में कम से कम और सीमित लोगों को ही सही संग्रहित करने में यह राष्ट्रवाद कुछ हद तक कारगर हो सकता है । अन्यथा इसका इससे बड़ा खामियाजा और क्या हो सकता है कि एक निश्चित क्षेत्र में चुनावी सभा करना भी इस दल के लिए मुश्किल सा हो रहा है और राजनैतिक अभियान लेकर इस क्षेत्र में आने में भी इसके आला नेताओं को कठिनाई हो रही है । लेकिन जिस मुद्दे को केन्द्र में रखकर वे शक्ति को संग्रहित करना चाहते हैं उसके विरुद्ध भी पूरे देश में किसी न किसी रूप में कड़ी प्रतिक्रिया है । ऐसा नहीं है कि इस देश में शासन की पारम्परिक संरचना से किसी क्षेत्र विशेष के लोग ही पीडि़त और प्रताडि़त हुए हैं बल्कि पहाड़ और हिमाल की अनेक जनजातियाँ भी इससे प्रभावित हुई हैं और हवा का रुख वे भी भाँप रहे हैं तथा किसी न किसी रूप में संगठित भी हो रहे हैं । इसलिए कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद की यह आँधी किसी भी रूप में किसी भी दल को त्राण दिलाने की स्थिति में नहीं है ।
आज देश की जो हालत है उसका सबसे बड़ा कारण है कि यहाँ की मध्यममार्गी पार्टियाँ जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खड़ी नहीं उतर सकी । उन्होंने यह नहीं समझा कि समय के साथ–साथ परिस्थितियाँ भी बदल रही हैं, शिक्षा और संचार–क्रान्ति के कारण लोगों के ज्ञान और स्वाभिमान का स्तर निरन्तर बढ़ता जा रहा है । शब्दों के जाल उलझाकर किसी भी जाति, क्षेत्र या वर्ग को बहुत दिनों तक अँधेरे में नहीं रखा जा सकता । आज जो समस्याएँ मूलभूत रूप में देश में दिखलाई दे रही है, कोई स्थापित मध्यममार्गी दल उसका समाधान ठान ले तो वहीं से देश में नया सबेरा का एहसास किया जा सकता है । अन्यथा, दक्षिण हो या वाम–कोई भी अतिवाद देश को त्राण दिलाने की अवस्था में नहीं है ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz