दक्षिण एशिया रणनीतिक सक्रियता और बढने के आसार

बाबुराम पौड्याल:आनेवाले दिनों में दक्षिण एशिया और उसके आसपास के क्षेत्र में राजनीतिक और कूटनीतिक फेरबदल के आसार और तेज होते दिख रहे हैं । भारत में हाल ही में हुये चुनाव में लम्बे समय से सत्तासीन कांग्रेस पार्टर्ीीत्ता के गलियारे से बाहर हो गई है और उसकी जगह पर हिन्दु कट्टरवादी माने जानेवाली भारतीय जनता पार्टर्ीीार्थिक विकास और सुशासन को अहम् मुद्दा बनाते हुये बीते तीस सालों में सबसे अधिक लोकप्रियता के साथ सत्ता में पहुंच गई है । नये सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विकासवादी चेहरे-मोहरे के साथ सत्ता में आते ही विकास के लिए शान्ति और उसके लिए पडÞोसी देशों के साथ अच्छे सम्बन्धों की आवश्यकता की तरफदारी कर रहे हैंं । वैसे चुनावी वायदों के ही आधार पर अभी मुश्किल से सत्ता की हनीमून पूरी कर रहे मोदी सरकार को उसकी आगामी कार्यकाल के लिए अभी ही उधार में प्रशंसा व आलोचना करना बहुत जल्दबाजी होगी । क्योंकि लोकप्रिय अभिमतों की नैया को कभी-कभार जनता की निराशा के समन्दर में बहुत जल्दी डूबते भी देखा गया है । मोदी के चुनावी वायदांे को ही मानें तो लगता है कि भारत और अधिक आर्थिक वृद्धि पर जोर देनेवाला है । उनके सामने कामयाबी के लिए इसके अलावा और कोई दूसरा विकल्प फिलहाल नजर नहीं आता ।rajnath singh wth Modi modi
चीन भी अपने बढÞते अर्थतन्त्र और जापान अैार भियतनाम जैसे देशों के साथ बढते नये सीमा विवादों के कारण अपनी विदेश नीति में परिवर्तन के संकेत दे रहा है । उसकी आर्थिक विकास की रफ्तार के कारण अमरीका और यूरोपियन यूनियन के साथ पहले से ही बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं चल रहे हैं । जापान भी अब दूसरे विश्वयुद्ध की पीडÞा से बदलते वक्त के साथ उबरना चाहता है । इस बीच उसने अच्छी आर्थिक प्रगति भी हासिल कर ली है । जापान ने तो साफ कह दिया है कि वह बदलते दुनिया के साथ अब  सुरक्षा सक्रियता में भी आवश्यकता पडने पर शिरकत करेगा । यह बयान टोकियो की बढÞती सामरिक मनसूबे की ओर संकेत करता है ।
भारत, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान जैसे देश परमाणु शक्ति से सम्पन्न देश भी हैं, जिसकी ताकत को नजरअन्दाज करने का सवाल ही पैदा नहीं होता । ये शक्तिशाली देश समय-समय पर दुनिया की बडÞी शक्तियों के लिए सर्रदर्द बन रहे हैं । भारत ,चीन और जापान जैसे  देशों में आर्थिक विकास की आकांक्षा और संभावना दोनों मौजूद हैं । यदि इन देशों के बीच चल रहे विवादों पर समाधान व कोई मजबूत समझदारी हो और विकास के मसले पर साथ काम करने की इच्छा शक्ति हो तो आनेवाले दिनो में एशिया का यह क्षेत्र दुनिया का मजबूत आर्थिक केन्द्र बनने की संभावना है । ऐसे संभावित  गठबन्धन को न चाहनेवाली  ताकतें उसे रोकने के लिए इस क्षेत्र मेंे परदे के आगे या फिर पीछे से रणनीतिक सक्रियता बढÞा सकतीं है ।
शीतयुद्ध और उसके बाद के दिनों में उत्तर और दक्षिण कोरिया विवाद, भारत पाकिस्तान  भारत चीन विवाद से ले कर धर्म, जाति आदि तरह तरह की शक्ल में घुस रहे आतंकवाद की तमाम समस्याएँ अब भी बरकरार हैं और इस पर कई बार तीसरी ताकतों की ओर से मतलब साधने की कोशिशें हर्ुइ हैं । ऐसी शक्तियां अपने मकसद को पाने के लिए अक्सर परदे के पीछे से अस्थिरता और अशान्ति को भी बढÞावा देने में देर नहीं करती । इसका प्रयोग यहां अब तक कई बार हुआ है और कई समस्याएँ सुलझने के बजाय और उलझ गई हैं । नतीजा यह हुआ कि उसका बहुत नकारात्मक असर सीधी तौर पर विकास और आम लोगों के जीवनस्तर पर पडÞा । अफगानिस्तान इसका   उदाहरण है । मतलब यह नहीं कि सभी रणनीतिक सक्रियता नुकसानदेह ही होती है बल्कि आवश्यक भी होती है । बशर्ते कि उसका मकसद सभी के अमन और तरक्की के लिए हो । आर्थिक प्रगति और समूचे विकास के बीच का र्फक और घातक रणनीतिक सक्रियता को समझने के लिए हमें मध्यपर्ूव के खनिज तेल से सम्पन्न देशों की आर्थिक तरक्की और उसकी नकारात्मक परिणति से समझना और आसान होगा ।
बीती सदी के उत्तर्रार्ध में मध्यपर्ूव के विशेष कर अरब भूमि और उसके आसपास वाले क्षेत्र में रणनीतिक दांवपेच कुछ अधिक ही देखने को मिला । उपनिवेशवाद के खिलाफ भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आसपास उठे राष्ट्रवादी आन्दोलन की जीत से यहाँ कई देशों को आजादी मिली तो वहाँ से विस्थापित उन ताकतों कीे नजर दक्षिण एशिया के आसपास से हटकर खाडÞी क्षेत्र में पडÞी । खनिज तेल का अकूत भण्डार होने के कारण वहां के अधिकंाश देशों में पिछले पचास सालों में अच्छी आर्थिक तरक्की हर्ुइ है परन्तु इसी तेल के ही कारण बाहरी ताकतों की वहाँ बुरी नजर पडÞी और लम्बे अरसे से रणनीतिक उठा-पटक तरह-तरह की शक्लो-सूरत में आज तक चल रहा है । वहां की आर्थिक तरक्की ने आर्थिक सम्पन्नता तो दी है परन्तु अमन और भाईचारा नहंीं । इस मामले में तो  खाडÞी क्षेत्र पहले से भी और कमजोर हो चला है । बारूद की दहशत में अभी भी आम जनता सांसे लेने को मजबूर है । खाडÞी क्षेत्र के इस सफर से आर्थिक विकास और शान्ति के बीच का चोली दामन का रिश्ता कितना महत्वपर्ूण्ा है, समझना आसान हो जायेगा । इस बीच पवित्र यरुसेलम और मक्का की पावन भूमि के आसपास नये-नये बहाने बनाकर कई बार खून की होली खेली जा चुकी है । वहां की कई सत्ताओं को बाहरर्ीर् इशारों पर पलटा गया और कई को पोषित किया गया । नतीजा यही था कि खाडÞी को कुदरत से मिले तेल के बदले सिर्फदहशतगर्दी का खौफनाक विरासत मिला । बदलते समय के साथ अब खाडÞी क्षेत्र का रंग कुछ फीका सा पडÞने लगा है । लोकतंत्र और शान्ति के लिए तैनात बताने वाली बहुराष्ट्रीय सेना लौट रही है फिर भी इराक शिया और सुन्नी के दंगल में जल रहा है । फिलीस्तीन और इजराइल का तनाव ठण्डा नहीं पडÞा है । वहां ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं ।
भारत, चीन और जापान के आसपास का क्षेत्र विश्व की सबसे बडी आबादी वाला है । उत्पादनशील पूंजी के लिए यह दुनिया का सबसे बडÞा बाजार है । लोगों के बदलते जीवनस्तर और शैली के कारण बाजार के रूप में विकास कर रहा है । और प्राकृतिक सम्पदाओं का अकूत भण्डार का धनी भी है । दुनिया की बडÞी पूजी निवेश करनेवाली कंपनियों का भारत और चीन की ओर बढÞती दिलचस्पी इसका सबसे बडा सबूत है । इस से दुनिया के पारम्परिक आर्थिक केन्द्रों को शिकस्त मिलने की संभावना है । वे अपनी साख को बरकरार रखने के लिए इन देशों में और आसपास जायज या नाजायज रणनीतिक सक्रियता बढाएँगे । जिससे अस्थिरता बढने की संभावना को दरकिनार नहीं किया जा सकता ।
इन सुनहरे संभावनाओं को साकार करने के लिए बहुत बडÞÞी-बडÞी चुनौतियों से सामना करना पडेÞगा । सबसे बडÞी समस्या तो यह है कि यहां के देशों के बीच जो पारम्परिक आपसी दरारें हैं उनको कम किया जाये और विश्वास के बीज बोये जायें । जिस्म पर एक दूसरों के दिए घावों पर मरहम पट्टी किये वगैर की सीनाजोरी से विश्वास का माहौल नहीं बन सकता । अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, भूटान और मालद्वीप अपेक्षाकृत छोटे और पिछडेÞ देशों को भी विकास की धार में आने का माहौल बनाना आवश्यक है । इसके लिए इन देशों को भी जिम्मेवार बनना होगा । क्योंकि भारत और चीन के खिलाफ होनेवाली अनपेक्षित गतिविधियांे का प्रयोग न चाह कर भी इन्हीं देशों की भूमि से विभिन्न रूपों में होने की संभावना है । एशियाई देशों में बहुत बडÞी संख्या में लोग गरीबी में जीने को मजबूर हैं । गरीबी के ऊपर असंतोष के बीज बडÞे आसानी से बोये जा सकते हैं । इसके अलावा यहां की सुन्दर सांस्कृतिक विविधता को सम्मानजनकÞ रूप में आगे बढÞाने की आवश्यकता को समझना होगा । इस विविधता को कहीं से भी अगर अन्तरविरोध के रूप में बदलने का प्रयास होता है तो यह सबसे बडÞा दर्ुभाग्य हो सकता है ।
नेपाल, भारत और चीन जैसे बडÞेÞ और महत्वाकंाक्षी देशों के बीच में अवस्थित छोटा और अविकसित देश है । लम्बे अरसे से राजनीतिक अस्थिरता को झेलता हुआ नेपाल एशिया के रणनीतिक महत्व वाला देश माना जाता है । विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल की इस अस्थिरता के लिए बाहरी शक्तियांे की परदे के आगे और पीछे से चलनेवाली रणनीतिक सक्रियता ही बहुत हद तक जिम्मेवार है ।
नेपाल को चाहिए कि वह चीन और भारत के विकास की रफ्तार का लाभ उठाए । सुनहरे भविष्य के लिए चीन और भारत के बढÞते रिश्ते के बीच में होने के नाते सेतु का काम कर अपने को समृद्ध करे । भारत और चीन नेपाल से चाहते हैं कि उनके विरोधी ताकत नेपाल को उनके खिलाफ प्रयोग न करे । इस आग्रह के प्रति नेपाल को गंभीर होना चाहिए । खुली आर्थिक नीतियों के नाम पर तकरीबन तीन दशक काफी कुछ कागजों में किये जाने के बावजूद भी कोई खास प्रगति नहीं हो पायी है । नेपाल के पास विदेशी पूंजी को आकषिर्त करना तो दूर स्वदेशी पूँजी को परिचालन का माहौल तक नहीं है । विदेशी औद्योगिक पूँजी निवेश केे लिए पूँजी की सुरक्षा, कच्चे पदार्थो की उपलब्धता, उद्योग संचालन का माहौल और उत्पादित चीजों के लिए बाजार का होना आवश्यक होता है, जो नेपाल के पास नहीं है । कच्चा पदार्थ और बाजार के लिए भारत और चीन के साथ अच्छे व्यापारिक संबन्धों को बनाए बिना असम्भव है ।
आनेवाले दिनों में संभावित सभी प्रकार के खतरों के प्रति सजग रहने की आज की आवश्यकता है । अब पुराने शीतयुद्धकालीन सामरिक राष्ट्रवाद का समय जा चुका है और अब का राष्ट्रवाद बन्दूक के साये में नहीं बल्कि आधुनिक प्रविधियों से सम्पन्न गतिशील अर्थतन्त्र के बल पर खडÞÞा रहेगा । J

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