दमन के दंश को झेलता देश

डॉ. श्वेता दीप्ति:देश का एक हिस्सा जहाँ समान रूप से गतिशील है, वहीं एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपनी सामान्य गति को भूलकर असामान्य गति में साँसें ले रहा है । विडम्बना यह है कि वह पूरा क्षेत्र अपनी असामान्य गति में जीने के साथ साथ प्रशासन के निर्ममतापूर्ण दमन के दंश को झेल रहा है । इस असामान्य गति को सामान्य करने की कोशिश में शासन तंत्र कहीं से ईमानदार नहीं दिख रहा बल्कि उसे दमन के सहारे दबाने की पूरी कोशिश जारी है । टीकापुर की घटना ने मन मस्तिष्क को झकझोर दिया है । नृशंस हत्याकाण्ड के पीछे असंतोष था, या सोची समझी साजिश, यह

तो निष्पक्ष जाँच के पश्चात् ही पता चलेगा किन्तु, जो हुआ वह किसी भी रूप में सही नहीं कहा जा सकता है । खास कर सेना परिचालन के पश्चात् एक खास समुदाय के घरों को जलाना और क्षति पहुँचाना तो कई सवाल खड़ा कर रहा है । गृह मंत्रालय एक तरफा वक्तव्य जारी कर रहा है । कभी जनता तो कभी पड़ोस पर आक्षेप लगा रहा है जो एक दूसरी ही घटना को जन्म दे सकती थी । इतना गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य गृहमंत्रालय से आना निःसन्देह दुखद है । टिकापुर की जनता में जो असंतोष दिख रहा है और जो बातें निकल कर आ रही हैं वो तथ्य सरकार की विफलता को ही इंगित कर रही है । संविधान, संघीयता और सीमांकन के मामले में सरकार पूरी तरह विफल दिख रही है । रोज मधेश की मिट्टी निर्दोष जनता के रक्त से रंगी जा रही है । शहादत देने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है । बीरगंज की मिट्टी रक्ताम्भ

टीकापुर की घटना ने मन मस्तिष्क को झकझोर दिया है । नृशंस हत्याकाण्ड के पीछे असंतोष था, या सोची समझी साजिश, यह तो निष्पक्ष जाँच के पश्चात् ही पता चलेगा किन्तु, जो हुआ वह किसी भी रूप में सही नहीं कहा जा सकता है । खास कर सेना परिचालन के पश्चात् एक खास समुदाय के घरों को जलाना और क्षति पहुँचाना तो कई सवाल खड़ा कर रहा है । गृह मंत्रालय एक तरफा वक्तव्य जारी कर रहा है । कभी जनता तो कभी पड़ोस पर आक्षेप लगा रहा है जो एक दूसरी ही घटना को जन्म दे सकती थी । इतना गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य गृहमंत्रालय से आना निःसन्देह दुखद है । टिकापुर की जनता में जो असंतोष दिख रहा है और जो बातें निकल कर आ रही हैं वो तथ्य सरकार की विफलता को ही इंगित कर रही है । संविधान, संघीयता और सीमांकन के मामले में सरकार पूरी तरह विफल दिख रही है । रोज मधेश की मिट्टी निर्दोष जनता के रक्त से रंगी जा रही है ।
हो गई । आन्दोलन को दंगा का नाम दिया जा रहा है । वो जनता पेशेवार अपराधी नहीं हैं किन्तु उनके साथ प्रशासन अपराधियों की तरह ही पेश आ रहा है । भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय होते हैं प्रशासन के पास, किन्तु जो रवैया उनकी ओर से दिख रहा है, उससे तो कहीं से यह नहीं लग रहा कि उनकी मंशा भीड़ तितर बितर करने की थी । जितनी मौतें हुई हैं, वो सब सर पर गोली लगने की वजह से हुई है । इसे किस रूप में लिया जाय ? मधेश की जनता टीकापुर की घटना के प्रतिशोध के रूप में बीरगंज की घटना को देख रही है । उस पर से सत्तापक्ष की खामोशी और अडि़यल रवैया मधेशी जनता को आहत कर रही है ।
यह तो सही है कि सभी पक्ष को संतुष्ट नहीं किया जा सकता, कुछ ना कुछ कमियाँ रह ही जाएँगी । किन्तु बात निष्पक्षता की है । कमियों को स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु पक्षपात को नहीं । कम से कम अब के माहौल में, जब आम जनता अपने अधिकारों के लिए सजग हो चुकी है । भूगोल की यथार्थता और भाषिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक कारणों से मधेश क्षेत्र और वहाँ के जन समुदाय का महत्व और विशिष्ट स्वरूप नेपाल में स्पष्ट है । नेपाल की आर्थिक भित्ति तराई की सम्पत्ति और मधेशियों के श्रम पर ही आधारित है । यह बात तो हाल के भूकम्प के दौरान बहुत ही अच्छी तरह से समझ में आ गई थी खास कर काठमान्डू में । जिन मधेशियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है उनके बिना ही कई काम रुक गए थे । भूकम्प के पशचात् आधी से अधिक आबादी काठमान्डू से चली गई थी । उस वक्त यहाँ जो थे उनकी वो छोटी छोटी जरुरत जो देखने में तो छोटी हैं किन्तु उसके बगैर काम नहीं चलता मसलन उस वक्त नाई, पल्मबर, मेकेनिक, टेक्नीशियन सबकी कमी हो गई थी  । आज जितनी भौतिक संरचना की क्षति हुई है उसके पुनर्निर्माण में श्रमदान करने वाले भाई मजदूर प्रायः मधेश के हैं । किन्तु उनके लिए यहाँ किसी की नजरों में सम्मान नहीं होता । यह मानसिकता आज की नहीं है, वर्षों की है । नेपाल में प्रजातंत्र लाने और उसकी पुनःस्थापना में बड़ी संख्या में मधेशी शहीद हुए, लम्बे समय तक यातना को सहा बावजूद इसके आज भी नेपाल राज्य के वर्तमान राजनीतिक भूगोल के आरम्भकाल से ही यह समुदाय उपेक्षा, शोषण और भयदोहन का शिकार रहा है ।
राणाकाल में सामंती निरंकुश शासन के तहत इस स्थिति का आरम्भ हुआ था । राणाओं का तराई से सम्बन्ध सिर्फ राजस्व वसूलने और शिकार खेलने तक था । उन्होंने उँगलियों पर गिनने लायक कुछ जमीन्दारों और महाजनों को छोड़कर सभी मधेशियों से बँधुआ मजदूर की तरह काम लिया और वैसा ही सुलूक किया । देश के हर निकाय में उपस्थिति उस वक्त भी नगण्य थी और आज भी वही हाल है । ये सारी बातें नई नहीं हैं, इतिहास भी इतना पुराना नहीं है कि लोग इससे अपरिचित हैं किन्तु, आज जो कुछ एक वर्ग विशेष के साथ हो रहा है, वो इन घावों को ताजा कर देती है । अधिकार की लड़ाई आज भी जारी है, लोग आज भी मर रहे हैं, जनता त्रस्त है किन्तु शासक वर्ग की मदान्धता राणा शासन की याद दिला रही है । दो वर्गाें के बीच विभेद की उँची दीवार दिन–ब–दिन खड़ी होती जा रही है । एक के दिल में नफरत है तो दूसरा उसे संशय की निगाह से देख रहा है । अखण्ड सुदूर पश्चिम और थरुहट के नाम पर एक आपस में लड़ रहे हैं । पहाड़ी वर्ग से अपने बहु बेटियों को कैसे बचाया जाय थारु समुदाय इस त्रास में साँस ले रहे हैं । थारु समुदाय कल तक दास, अद्र्धदास, कमैया कमलरी बन कर जी रहे थे किन्तु आज जब उनमें चेतना जाग चुकी है अपने अधिकारों के प्रति वो सचेत हो चुके हैं तब उन्हें अपमानित करना या उन्हें अधिकारों से वंचित रखना सम्भव नहीं है । इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा ।   राजनीति का गन्दा खेल और नेताओं के स्वार्थ के बीच हमेशा से जनता ही होम होती आई है । नेताओं की शासन प्रवृत्ति लगभग एक सी होती है । आज थारु, मधेशी, जनजाति के बीच जिस विद्रोह का जन्म हुआ है इसका बीजारोपण सत्ता के गलियारों से ही हुआ है । जिस संघीयता के नाम पर आन्दोलन हुआ, रक्तपात हुआ उसे नजरअंदाज करने का परिणाम आज एक बार फिर आन्दोलन के रूप में ही सामने आ रहा है । संघीयता जनता को चाहिए थी किन्तु आज उसे सिर्फ दमन मिल रहा है । जातीयता, पहचान, समावेशिता, अधिकार इन शब्दों के जाल में जनता को पंmसाकर, उसकी आग सुलगाकर राजनीति की रोटी पकती रही, हाथ सिकते रहे और मासूम जिन्दगियाँ होम होती रही ।
किस दिशा में जा रहा है देश ? विश्व इतिहास गवाह है कि जब–जब आन्दोलन में हिंसा और दमनचक्र हुआ है तब–तब विखण्डन की स्थिति आई है और यह किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं होता । लम्बे उतार चढ़ाव के बाद संविधान निर्माण का समय आया उत्साहित जनता इसका इंतजार कर रही थी । किन्तु आज वही जनता बन्द और दमन की मार सह रही है । विगत के दिनों में भी तराई सशस्त्र समूहों के बीच आतंकित और असुरक्षित था । कुछ समय के लिए मधेशी जनता आतंक के इस माहोल से निकल पाई थी किन्तु आज फिर उसी चीज की पुनरावृत्ति होने के पूर्ण आसार नजर आ रहे हैं । सवाल यह है कि देश की समग्र जनता अहम है राष्ट्र के लिए, या उसी जनता के नाम पर बनने वाला संविधान । अगर जनता अहम है तो उसकी इच्छाएँ भी अहम होंगी  और अगर सिर्फ संविधान निर्माण ही आवश्यक है तो फिर तो जो हो रहा है वही सही है ।
टीकापुर की घटना ने जो वातावरण तैयार कर दिया है उसमें वहाँ की जनता स्वयं को पूरी तरह उपेक्षित महसूस कर रही है । आज तक कोई नेता वहाँ नहीं पहुँचे हैं जो उन्हें यह भरोसा दिला सके कि वो सुरक्षित हैं । आरोप लगाने का वक्त नहीं है उनके अस्तित्व को स्वीकारने का वक्त है । आज जनता को संविधान से अधिक अपने हितेषी नेताओं की जररत है तो क्या ऐसे में जनता को सम्बोधित करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है ? बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान वार्ता से ही सम्भव हो पाया है । किन्तु इसमें हठधर्मिता के लिए स्थान नहीं होती । जो अभिभावक होते हैं उन्हें नम्र होना पड़ता है वरना घर को टूटने से कोई बचा नहीं सकता । तराई की समस्या को सम्बोधन करना अत्यन्त आवश्यक है और साथ ही न्यायोचित समाधान का भी ढूँढना आवश्यक है । हिंसात्मक आन्दोलन और सरकार द्वारा कराया जा रहा दमनचक्र ये दोनों गलत हैं और इसे तत्काल रोकने की आवश्यकता है । अगर संविधान प्रक्रिया को रोका जाना आवश्यक है तो कृपया उसे रोकें, वार्ता का सौहाद्रपूर्ण वातावरण तैयार करें और निरीह जनता को मरने से बचाएँ । राजनीति किसके लिए है ? मधेश की क्षति सिर्फ मधेश की नहीं है वह सम्पूर्ण देश की क्षति है । फिर क्यों इसे नजरअंदाज किया जा रहा है ?

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