दरबार साहिब-सिख धर्मावलंबियों का पावनतम धार्मिक स्थल : प्राची शाह (यात्रा अमृतसर स्वर्णमंदिर की)


प्राची शाह, काठमांडू | इसबार दशहरे की छुट्टियों में दिल्ली होते हुए अमृतसर जाने का अवसर मिला एक पारिवारिक यात्रा थी यह जिसने पूरा मनोरंजन दिया हमें । स्वर्णमंदिर, जालियावालाबाग और वाघा बोर्डर जाने का अवसर मिला । स्वर्णमंदिर की भव्यता ने मन मोह लिया । शरद पुर्णिमा के दिन बाबाजी के दर्शन प्राप्त हुए । पुर्णिमा होने वजह से अन्य दिनों की अपेक्षा श्रद्धालुओं की भीड अधिक ही थी । इसी दरमियाँ मंदिर के इतिहास से परिचित होने का अवसर भी मिला जिसे आपके साथ साझा कर रही हूँ ।
श्री हरिमन्दिर साहिब (पंजाबी भाषाः)
हरमंदिर साहिब– जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर भी कहा जाता है सिख धर्मावलंबियों का पावनतम धार्मिक स्थल या सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है । पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है । स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं । अमृतसर का नाम वास्तव में उस सरोवर के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरु राम दास ने स्वयÞं अपने हाथों से किया था । यह गुरुद्वारा इसी सरोवर के बीचोबीच स्थित है । इस गुरुद्वारे का बाहरी हिस्सा सोने का बना हुआ है, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर अथवा गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है । श्री हरिमंदिर साहिब को दरबार साहिब के नाम से भी ख्याति हासिल है । यूँ तो यह सिखों का गुरुद्वारा है, लेकिन इसके नाम में मंदिर शब्द का जुड़ना यह स्पष्ट करता है कि भारत में सभी धर्मों को एक समान माना जाता है । इतना ही नहीं, श्री हरमंदिर साहिब की नींव भी एक मुसलमान ने ही रखी थी । इतिहास के मुताबिक सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने लाहौर के एक सूफी संत साईं मियां मीर जी से दिसंबर, ज्ञछडड में गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी । सिक्खों के लिए स्वर्ण मंदिर बहुत ही महत्वपूर्ण है । सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहाँ आते हैं, जिनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है ।लगभग द्ध०० साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद गुरु अर्जुन देव जी ने तैयार किया था । यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है । इसकी नक्काशी और बाहरी सुंदरता देखते ही बनती है । गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं –पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं । उस समय भी समाज चार जातियों में विभाजित था और कई जातियों के लोगों को अनेक मंदिरों आदि में जाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन इस गुरुद्वारे के यह चारों दरवाजे उन चारों जातियों को यहां आने के लिए आमंत्रित करते थे । यहां हर धर्म के अनुयायी का स्वागत किया जाता है । श्री हरिमन्दिर साहिब परिसर में दो बड़े और कई छोटे–छोटे तीर्थस्थल हैं । ये सारे तीर्थस्थल जलाशय के चारों तरफ फैले हुए हैं । इस जलाशय को अमृतसर, अमृत सरोवर और अमृत झील के नाम से जाना जाता है । पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी
की गई है । हरिमन्दिर साहिब में पूरे दिन गुरबाणी –गुरुवाणी) की स्वर लहरियां गूंजती रहती हैं । सिक्ख गुरु को ईश्वर तुल्य मानते हैं । स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढÞियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं । सीढÞियों के साथ–साथ स्वर्ण मंदिर से जुड़ी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है । स्वर्ण मंदिर एक बहुत ही खूबसूरत इमारत है । इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है । मंदिर परिसर में पत्थर का एक स्मारक भी है जो, जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगाया गया है ।
श्री हरिमन्दिर साहिब के चार द्वार हैं । इनमें से एक द्वार गुरु राम दास सराय का है । इस सराय में अनेक विश्राम–स्थल हैं । विश्राम–स्थलों के साथ–साथ यहां चौबीस घंटे लंगर चलता है, जिसमें कोई भी प्रसाद ग्रहण कर सकता है । श्री हरिमन्दिर साहिब में अनेक तीर्थस्थान हैं । इनमें से बेरी वृक्ष को भी एक तीर्थस्थल माना जाता है । इसे बेर बाबा बुड्ढा के नाम से जाना जाता है । कहा जाता है कि जब स्वर्ण मंदिर बनाया जा रहा था तब बाबा बुड्ढा जी इसी वृक्ष के नीचे बैठे थे और मंदिर के निर्माण कार्य पर नजर रखे हुए थे ।स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच में मानव निर्मित द्वीप पर बना हुआ है । पूरे मंदिर पर सोने की परत चढ़ाई गई है । यह मंदिर एक पुल द्वारा किनारे से जुड़ा हुआ है । झील में श्रद्धालु स्नान करते हैं । यह झील मछलियों से भरी हुई है । मंदिर से १०० मी. की दूरी पर स्वर्ण जडÞित, अकाल तख्त है । इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं । इसमें एक संग्रहालय और
सभागार है । यहाँ पर सरबत खालसा की बैठकें होती हैं । सिक्ख पंथ से जुड़ी हर मसले या समस्या का समाधान इसी सभागार में किया जाता है ।
स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित सभी पवित्र स्थलों की पूजा स्वरूप भक्तगण अमृतसर के चारों तरफ बने गलियारे की परिक्रमा करते हैं । इसके बाद वे अकाल तख्त के दर्शन करते हैं । अकाल तख्त के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु पंक्तियों में स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं । स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच में मानव निर्मित द्वीप पर बना हुआ है । पूरे मंदिर पर सोने की परत चढ़ाई गई है । यह मंदिर एक पुल द्वारा किनारे से जुड़ा हुआ है । झील में श्रद्धालु स्नान करते हैं । यह झील मछलियों से भरी हुई है । मंदिर से १०० मी. की दूरी पर स्वर्ण जडÞित, अकाल तख्त है । इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं । इसमें एक संग्रहालय और सभागार है ।
यहाँ पर सरबत खालसा की बैठकें होती हैं । सिक्ख पंथ से जुड़ी हर मसले या समस्या का समाधान इसी सभागार में किया जाता है । गुरुद्वारे के बाहर दाईं ओर अकाल तख्त है । अकाल तख्त का निर्माण सन १६०६ में किया गया था । यहाँ दरबार साहिब स्थित है । उस समय यहाँ कई अहम फैसले लिए जाते थे । संगमरमर से बनी यह इमारत देखने योग्य है । इसके पास शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का कार्यालय है, जहां सिखों से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं ।गुरु का लंगर में गुरुद्वारे आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खाने–पीने की पूरी व्यवस्था होती है । यह लंगर श्रद्धालुओं के लिए द्दद्ध घंटे खुला रहता है । खाने–पीने की व्यवस्था गुरुद्वारे में आने वाले चढ़ावे और दूसरे कोषों से होती है । लंगर में खाने–पीने की व्यवस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की ओर से नियुक्त सेवादार करते हैं । वे यहाँ आने वाले लोगों (संगत) की सेवा में हर तरह से योगदान देते हैं । अनुमान है कि करीब द्धण् हजार लोग रोज यहाँ लंगर का प्रसाद ग्रहण करते हैं । सिर्फ भोजन ही नहीं, यहां श्री गुरु रामदास सराय में गुरुद्वारे में आने वाले लोगों के लिए ठहरने की व्यवस्था भी है । इस सराय का निर्माण सन १७८४ में किया गया था । यहां २२८ कमरे और १८ बड़े हाल हैं । यहाँ पर रात गुजारने के लिए गद्दे व चादरें मिल जाती हैं । एक व्यक्ति की तीन दिन तक ठहरने की पूर्ण व्यवस्था है । श्री हरिमंदिर साहिब के पास गुरुद्वारा बाबा अटल और गुरुद्वारा माता कौलाँ है । इन दोनों गुरुद्वारों में पैदल पहुंचा जा सकता है । इसके पास ही गुरु का महल नामक स्थान है । यह वही स्थान है जहाँ स्वर्ण मंदिर के निर्माण के समय गुरु रहते थे । गुरुद्वारा बाबा अटल नौ मंजिला इमारत है ।
यह अमृतसर शहर की सबसे ऊँची इमारत है । यह गुरुद्वारा गुरु हरगोबिंद सिंह जी के पुत्र की याद में बनवाया गया था, जो केवल नौ वर्ष की उम्र में काल को प्राप्त हुए थे । गुरुद्वारे की दीवारों पर अनेक चित्र बनाए गए हैं । यह चित्र गुरु नानक देव जी की जीवनी और सिक्ख संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं । इसके पास माता कौलाँ जी गुरुद्वारा है । यह गुरुद्वारा बाबा अटल गुरुद्वारे की अपेक्षा छोटा है । यह हरिमंदिर के बिल्कुल पास वाली झील में बना हुआ है । यह गुरुद्वारा उस दुखयारी महिला को समर्पित है जिसको गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने यहाँ रहने की अनुमति दी थी । इसके पास ही गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब है । यह केसर बाग में स्थित है और आकार में बहुत ही छोटा है । इस गुरुद्वारे को १९०२ ई.में ब्रिटिश सरकार ने उन सिक्ख सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया था जो एंग्लो–अफÞगान युद्ध में शहीद हुए थे । गुरुद्वारे के आसपास कई अन्य महत्वपूर्ण स्थान हैं । थड़ा साहिब, बेर बाबा बुड्ढा जी, गुरुद्वारा लाची बार, गुरुद्वारा शहीद बंगा बाबा दीप सिंह जैसे छोटे गुरुद्वारे स्वर्ण मंदिर के आसपास स्थित हैं । उनकी भी अपनी महत्ता है । नजदीक ही ऐतिहासिक जलियांवाला बाग है, जहां जनरल डायर की क्रूरता की निशानियां मौजूद हैं । वहां जाकर शहीदों की कुर्बानियों की याद ताजा हो जाती है ।
गुरुद्वारे से कुछ ही दूरी पर भारत–पाक सीमा पर स्थित वाघा सीमा एक अन्य महत्वपूर्ण जगह है । यहां भारत और पाकिस्तान की सेनाएं अपने देश का झंडा सुबह फहराने और शाम को उतारने का आयोजन करती हैं । इस मौके पर परेड भी होती है ।
आवागमन
अमृतसर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा है । वहां से टैक्सी करके गुरुद्वारे पहुंचा जा सकता है । रेल व सड़क मार्ग अमृतसर दिल्ली से लगभग ५०० किलोमीटर दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग १ पर स्थित है । आसपास के सभी राज्यों के सभी प्रमुख नगरों से अमृतसर तक की बस सेवा –साधारण व डीलक्स) उपलब्ध है । राष्ट्रीय राजमार्ग १ पर किसी भी स्थान से २४ घंटे बसें चलती रहती हैं । अमृतसर रेल मार्ग द्वारा भारत के सभी प्रमुख नगरों से जुड़ा है । पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली से अमृतसर शान–ए–पंजाब या शताब्दी ट्रेन से पांच से सात घंटे में अमृतसर पहुंचा जा सकता है । अमृतसर स्टेशन से रिक्शा करके गुरुद्वारे पहुंचा जा सकता है ।

People at Golden Temple in Amritsar, Punjab, India.

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