दरार !!! दिल से दल तक

पंकज दास

सविधान सभा और संसद के रहने तक दलों में विभाजन का कारण और उसके पीछे का अर्थ कुछ और ही होता था लेकिन संविधान सभा विघटन और संसद नहीं होने की अवस्था

prachanda_baidya

दरार !!! दिल से दल तक

में पार्टियों के विभाजन का कारण और अर्थ काफी अलग है। वैसे संविधान सभा के रहते और उसके विघटन के बाद से हर्ुइ विभाजन में एक कारण समान था और वह है सत्ता का।
पहले सत्ता के लिए दलों में विभाजन कर मंत्री बनने का एक मात्र उद्देश्य रहा करता था। इसके कई प्रमाण भी है। मसलन मधेशी जनअधिकार फोरम में पहले आए विभाजन के पीछे एक मात्र कारण सत्ता में पहुंच था। उपेन्द्र यादव के रवैये से असंतुष्ट होने का दावा करने वाले विजय कुमार गच्छेदार ने सिर्फइसलिए पार्टर्ीीें विभाजन किया था क्योंकि उन्हें उप-प्रधानमंत्री बना कर सरकार में पार्टर्ीीा नेतृत्व करने का मौका नहीं दिया था। सद्भावना पार्टर्ीीें बार-बार विभाजन इसलिए होता रहा क्योंकि उसके अध्यक्ष राजेन्द्र महतो पार्टर्ीीे प्रमुख होने के नाते खुद को ही मंत्री पद के लिए सबसे अधिक उपयुक्त मानते रहे और दूसरे नेताओं को उन्होंने मौका नहीं दिया। बाद में गच्छेदार से उन की ही पार्टर्ीीे लोग इसलिए बगावत करते आए क्योंकि मंत्री पद नहीं पाने का मलाल कई नेताओं को था। कई अन्य छोटी पार्टियों के विभाजन के पीछे भी सत्ता में जाना ही एकमात्र कारण रहता आया है। इन सबके बीच उपेन्द्र यादव से अलग हुए जेपी गुप्ता के बारे में कुछ अलग धारणा बनाई जा सकती है। क्योंकि उस समय पार्टर्ीीें विभाजन सरकार में रेणु यादव और अपने करीबी नेताओं को मंत्री बनाने के उपेन्द्र यादव के निर्ण्र्ाासे कई नेता खफा थे। इससे पहले भी पार्टर्ीीो एक बार सरकार में जा चुकी थी उस समय भी सिर्फदिग्गज लोग ही मंत्री बनाए गए थे। लेकिन बाद में मंत्री ना बन पाने वाले नेताओं की असंतुष्टि का फायदा उठाते हुए जेपी ने अपनी अलग पार्टर्ीीो बनाई लेकिन वह टिकाऊ नहीं हो पायी और आखिरकार मंत्री पद को लेकर ही वह पार्टर्ीीी बिखराव की स्थिति में आ गई है। र्
कई अन्य छोटी पार्टियां भी मंत्री पद पाने के लिए विभाजित हर्ुइ हंै। आर्श्चर्य लेकिन दुखद बात यह है कि जिस पार्टर्ीीे एक ही सभासद हुआ करते थे, उस पार्टर्ीीें दो-दो बार विभाजन आ चुका है। इस समय भी सरकार में शामिल कुछ छोटी पार्टियां जिनका कई लोगों ने नाम भी नहीं सुना था और उनके नेता को भी नहीं पहचाना था लेकिन भट्टर्राई की कृपा पात्र बन कर वे भी मंत्री बन गए। मंत्री बनने के साथ ही उन पार्टियों में भी कुछ मुद्दों को लेकर विभाजन आ चुका है। उनमें से तो कई पार्टियां ऐसी है, जिसके एक नेता सरकार में मंत्री पद का लाभ ले रहे हैं तो पार्टर्ीीे बांकी नेता विपक्षी गठबन्धन के साथ मिलकर सरकार का विरोध कर रहे हैं।
संविधान सभा विघटन के बाद से जिन बडी पार्टियों में विभाजन से देश की राजनीतिक दशा और दिशा बदल सकती है उन में एकीकृत माओवादी से मोहन वैद्य का अलग होना, फोरम लोकतांत्रिक से शरद सिंह भण्डारी का अलग होना और फोरम गणताण्त्रिक में चल रही वर्चस्व की लर्डाई है। वैसे तो इन सबके पीछे भी कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में देखा जाय तो सत्ता ही कारण दिखाई देती है। मोहन वैद्य लाख दलीलें दे कि विचारधारा में भटकाव और क्रान्तिकारी धार को छोडने के कारण ही उन्होंने माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड से अपना नाता तोडा है लेकिन इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही है। इसी तरह शरद सिंह भण्डारी को रक्षा मंत्री पद से हटाया जाना और पार्टर्ीीे भीतर गच्छेदार द्वारा उनकी बात को नहीं सुना जाना साथ ही कुछ नेताओं को मंत्री पद नहीं दिया जाना यही सब कारण मिलकर शरद सिंह भण्डारी को नई पार्टर्ीीोलने के लिए मजबूर किया है। फोरम गणतांत्रिक में इस समय वर्चस्व को लेकर जो लर्डाई चल रही है, उसमें भी मंत्री पद ही एक मात्र कारण है। जेपी गुप्ता के जेल जाने के बाद से पार्टर्ीीें सह-अध्यक्ष रहे राजकिशोर यादव पहले तो कार्यवाहक अध्यक्ष बन गए। बाद में संसदीय दल के नेता बने और फिर मंत्री पद पर खुद ही चले गए। इतना तक तो ठीक था बाबूराम भट्टर्राई से मिलकर उन्होंने कृषि मंत्री रहे अपनी ही पार्टर्ीीे नन्दन दत्त को सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में उसी तरह नन्दन दत्त ने भी बहुमत सदस्यों का दावा करते हुए राजकिशोर यादव को चुनौती दिया है। अभी उसपर फैसला होना बांकी है लेकिन आगे जो कुछ भी हो पार्टर्ीीें विभाजन तय है।

 

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