Wed. Sep 26th, 2018

दरिद्र मानसिकता के धनि नेपाली खस बुद्धिजीवी : अजयकुमार झा


अजयकुमार झा, जलेश्वर | संस्कार और संस्कृति में संपन्न भारत जैसे गरिमावन देस के महिमावान प्रधानमन्त्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेपाल के जनकपुर यात्रा को लेकर खस समुदाय के लेखक तथा पत्रकार लगायत के अन्य तथाकथित विद्वानों में इस प्रकार हड़कम्प मचा जैसे किसी शेर को देख बंदरों में घबराहट और हड़कंप मच जाता है। दो नंबर प्रदेश को अशांत और अशुरक्षित सावित कर मोदी जी के आगमन को रोकने का दुष्प्रयास किया। तो किसी ने नेपाल में नाकाबंदी का आरोप लगाकर मधेसियों के माग और आन्दोलन को ओझिल करने का षडयंत्र भी रचा। टुइटर पर तीर्थ कोइराला जी ने तो यहाँ तक लिख डाला की अबतक भारत ने चार बार नेपाल को नाकावंदी के चपेटा में डालकर नेपाल के सार्वभौमिकता और अखंडता को दमन किया है। याद रहे, नेपाल में जो भी नाकावंदी लगाए गए 2072 से पहले वो सभी नाकावंदी नेपाली नेताओं और नागरिको के अनुनय विनय करने पर कभी राणा के क्रूर शासन और अत्याचार से त्रस्त नेपाली नागरिकों को मुक्ति दिलाने हेतु किया गया था। इसी प्रकार दुसरीबार राजा महेन्द्र से मुक्ति दिलाने हेतु वीपी कोइराला लगायत के नेपाली नेता और जनता के आग्रह पर किया गया था। तीसरी बार राजा बिरेन्द्र के नेत्रित्व में संचालित एक तंत्रीय पंचायती शासन प्रणाली के विरोध में लौह पुरुष श्री गणेशमान सिह जी के नेतृत्व में भारत सरकार से प्रार्थना कर लोकतंत्र पुनर्बहाली की दुहाई देकर नाकाबंदी करने के लिए बिनती चढ़ाया था।

अब रही बात 2072 के नाकावंदी का तो यह सीधा और साफ़ है की 200 वर्ष से अपमानित और दुसरे दर्जे के नागरिक के रुपमे जीवन यापन को बाध्य नेपाल के आधा जनसंख्या के हैशियत से विद्यमान मधेसियों ने संविधान में अपना अधिकार सुरक्षित रखने के लिए बाध्य होकर नाका पर धरना दिया जो वाद में नाकावंदी का रूप धारण कर लिया। परन्तु तीर्थ कोइराला जी ने जो नाकाबंदी का हबाला देकर भारत विरोधी अफवाह और नकारात्मक भावना को नेपाली युवा मानस पटल पर डाल रहे हैं। उन्हें इतना भी वोध और होस नहीं है की भारत ने 2019,2027 और 2047 में नाकाबंदी क्यों किया था ! आज जो स्वतन्त्रता का स्वाद ले पा रहे हैं वो भारत के कृपा का परिणाम है। याद रहे ! चीन और पाकिस्तान लोकतांत्रिक देश नहीं है। फिर भी भारत के प्रति घृणा से भड़ी दृष्टि और चीन पाक के प्रति सहानुभूति ! आखिर यह है क्या ? आज से बीस वर्ष पहले हुए साफ़ खेलकूद के फुटबल मैच में दशरथ रंगशाला में उपस्थित 90 प्रतिसत पहाड़ी पाक के पक्ष में ताली बजा रहे थे। नेपालियों के भीतर भारत के प्रति विरोध और घृणा का भाव ऋतिक रोशन काण्ड और माधुरी दीक्षित काण्ड से ही दिखाई देने लगा था। जिस एतिहासिक माओवादी जनयुद्ध जिसमे पचीस हजार नेपाली युवाओं की हत्या हुई। अरबों के भौतिक संरचनाएँ ध्वस्त कर दिए गए। नेपाल के विकास 12 वर्षों तक पूर्णतः अवरुद्ध रहा। साथही नेपालियों के जन जीवन 50 वर्ष पीछे की ओर धकेल दिया गया। उस बिद्रोह और गृहयुद्ध को भारत ने मध्यस्थता कर नेपालियो के जीवन और नेपाल के अस्तित्व को सुरक्षित किया। उसीको गालियाँ देकर ए बिरबहादुर लोग क्या सावित करना चाहते है ! संविधान निर्माण के क्रममे हुए मधेस आन्दोलन तथा सैकड़ों सहादत के फलस्वरूप मधेसियों के साथ किया गया समझौता भी कागज़ में सिमित कर धोखेबाजी कर रहे खस के विरुद्ध में चार महीने का मधेस बंद जो नाकाबंदी का रुप धारण कर लिया था। उसे अब भी खस शाषक नजरअंदाज कर भारत को बदनाम करना चाहता है। जिससे एक तीर से दो निसाना लगता है।

पहला, मधेसियों के एतिहासिक आन्दोलन को चर्चा से बाहर रखना। और दूसरा, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बिच भारत को बदनाम करना। एक करोड़ पचास लाख के आवादी वाले मधेसियों को राणाकाल से लेकर पंचायती व्यवस्था, प्रजातांत्रिक व्यवस्था और संघीय लोकतांत्रिक गणतांत्रिक व्यवस्था में भी संवैधानिक रूप से ही षडयंत्र पूर्वक कमजोर बनाने का प्रयास किया गया था। जिसका विरोध माननीय मोदी जी ने बहुत पहले जना चुके थे। राज्य के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र, सरकारी निकायों, सेना तथा प्रहरी, मंत्री, सचिव तथा राजदूत जैसे पदों से मधेसियों को वंचित किया गया है और बिरोध करने पर देशद्रोह का मुद्दा लगाया जाता है। या की सीधे माथे पे गोली मार दिया जाता है। ऐसी हालत में तो दो ही रास्ता शेष रह जाता है। (गुलामी की स्वीकृति या की डटकर मुकाबला) बतक गुलामी मानसिकता से अभिप्रेरित मधेस के कांग्रेस और कम्युनिष्ट समर्थक लोग भी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने लगे हैं। उनके बच्चों उन्हें घर में ही मधेस के समर्थन हेतु मजबूर करने लगे हैं। अब ऐसे लोगो के आत्मा भी कपने लगी है। जिसका सिधा प्रभाव नेपाल के भावी राजनीति पर परने बाला है।

मोदी के जनकपुर यात्रा ने इस भावना को अणु ऊर्जा से अनुप्राणित करने का काम किया है। मधेस के आम नागरिक में एक उत्साह और भरोसा पनपने लगा है। भविष्य सुरक्षित और विकसित होने का आसार नजर आने लगा है। वही पर नेपाल के खस लोग मोदी के जनकपुर यात्रा से जल भुन गए हैं। मोदी को जनकपुर में किया गया अबतक के भव्यतम एतिहासिक स्वागत और नागरिक अभिनन्दन के कारण पहाड़ी लोग मधेसियों को देशद्रोही तक का संज्ञा देने लगे हैं। नेपाल में सिर्फ दो विचारधारा के नागरिक हैं अभी। एक खस शासक जो ब्राहमण क्षेत्री बाहेक अन्य सभी वर्ग : हिमाल के शेर्पा, तामाङ्ग,लिम्बू पहाड़ के राई,मगर,ज्यापू,नेवार और आधी जनसंख्या बाले मधेसियों के ऊपर षडयंत्र पूर्वक हो बल पूर्वक राज करना चाहते हैं। तो दुसरे विचारधारा के नागरिक में: जनजाति, किराती,थारु,मधेसी हैं जो बराबरी का अधिकार खोज रहे हैं। सामान्यतया कुछ लोग राजावादी को तीसरा विचारधारा बाला नागरिक के श्रेणी में रखते हैं। परन्तु संविधान में जो खस आर्य जाती की परिभाषा की गई है; उसमे राजावादी और गणतंत्र वादी मूल में एक ही है। अतः मैंने मौलिक रूपसे नेपाल में दो ही विचारधारा के लोगो को पाया है।

अब यदि नेपाल को हम एक परिवार के रुपमे व्याख्या करते हैं; तो भी जीवन यापन हेतु अधिकार के लिए परिवार में कलह और संघर्ष स्वाभाविक रूप से होता आया है। समझदारी कायम न होने पर लड़ाई और अंत में बटबारा होने की घटना भी सामान्य है। आवश्यक है एक सार्वजन हिताय भाव का। समग्र विकास हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण का। आपसी समझदारी और सर्वमान्य संविधान का। तराई पहाड़ और हिमाल के समुचित विकास और संरक्षण का। शालीनता के प्रतिक हिन्दू सनातन संस्कृति और सम्यकता के हिमालय बौद्ध संस्कृति के बिच प्रज्ञापूर्ण सम्वन्ध का। मधेसीयों के सृजनसिलता और पहाडियों के साहसिकता के विच प्राविधिक सम्वन्ध का। जबकि यहाँ के 7% शासक और उनके अनुयायी तथाकथित बुद्धिजीबी लोग अपनी साख और सत्ता कायम रखने के लिए नेपाल के 93% नागरिक के भावनाओं को कुचलने के लिए आध्यात्मिक देश भारत से दुरी बढ़ाकर आतंकी देश पाकिस्तान से हार्दिकता दिखा रहे हैं। इन मूढो को कौन समझाय की परिवार के किसी सदस्य को दमन करने पर उसके भाविष्य के रक्षा हेतु न्यायालय का द्वार खुला रहता है। चाहे वो राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय। नेपाल के 93% नागरिक अब अपने को इस व्यवस्था में सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं। एक एक कदम पर लड़ना पड़ता है। हर काम के लिए आन्दोलित होना पड़ता है। जो अपनेआप होना चाहिए; उसके लिए मधेसियों को आन्दोलन के शिवाय कोई उपाय नहीं है। यहाँ वही मधेसी अपने को सुरक्षित अनुभव कर रहे हैं; जो खस के गुलामी को अपने मांस मज्जा में घुसाए हुए हैं। या वो जो निपट मुर्ख हैं। जिन्हें जीवन और भविष्य का कोई वोध नहीं है। नयाँ पीढ़ी शिक्षित होते जा रहे हैं; जो गुलामी और षडयंत्र को सपने में भी स्वीकार नहीं करेंगे। आनेबाला दस वर्ष नेपाल के लिए कठोर निर्णय का काल होगा। गणतंत्र की गरिमा को समझने का प्रयास यहाँ के सत्तासीनो को करना होगा। प्रत्येक नागरिक को सम्मान पूर्वक अधिकार संपन्न करना होगा। देश का अर्थ भूमि के सीमा खंड नहीं होता है; जनता और सांस्कृतिक विरासत भी होता है। इसे गंभीरता पूर्वक लेना ही होगा। एक प्रज्ञा शुत्र के साथ कलम को विश्राम देना चाहूँगा।
*है तंत्र वही सर्वोत्तम जिसमे,
सब की सहमति ली जाए।
सब का आदर सब का ख्याल,
प्रतिभा की इज्जत की जाए।।
जबतक सब का सम्मान नहीं,
तबतक उत्तम परिणाम नहीं।।।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि,
भज बुद्धं शरणं गच्छामि।।।।
अजयकुमार झा

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प्रेम
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प्रेम

ओ३म्
नमस्ते..!
इसमें कोई बात अत्यंत कटु सत्य भी है, किन्तु कोई अतिरंजित भी..!