दर्द का सिलसिला तीन तलाक क्या कहता है सरिया कानून

तलाक ! तलाक ! तलाक !

विजेता चौधरी:इन तीन शब्दों की शक्ति परिवार में इस कदर भूचाल ला देगा ऐसा न जोहरा अन्सारी ने सोचा था, ना तो फरीदा खातुन ने ही कल्पना की थी । मुस्लिम परिवार मे पली–बढ़ी उन दोनों ने समाज में तलाक की घटना होते हुए सुना तो था पर अपने ही जीवन में तलाक गहरा घाव छोड़ जाएगा उन लोगों को ऐसा कभी लगा ही नही ।
लेकिन हुआ कुछ ऐसा ही ।
निकाह के बाद १६ वर्ष साथ विताए महोत्तरी जिला पश्चिमी भेग स्थित पर्सादेवाड़–९ के मौलवी धर्मगुरु हबिब मोमीन अंसारी एवम् पत्नी जोहरा के बीच सामान्य झगड़ा हुवा था पर उतना बड़ा कोई मनमुटाव नही था । मुस्लिम धर्म के प्रचारक समेत रहें मौलवी हबिब का तलाक मजहब के कानून विपरित था । पत्नी के प्रति उस का आरोप खास बड़ा भी नही था । लेकिन, अंसारी ने तेरा चेहरा पसन्द नही है, तुम मुर्ख हो, इसी लिए अब मैं दूसरा निकाह करुंगा– कहते हुए सम्बन्ध विच्छेद कर लिया । तलाक मात्र नही दिया वरन् २५ वर्षीया जोहरा को मारपीट कर घरनिकाला ही कर दिया ।
इस्लाम कानून के अनुसार पत्नी को तीन बार तलाक कह देने से सम्बन्ध विच्छेद नही माना जाता । तीन महीने के भीतर पत्नी को फिर से स्वीकारने का विकल्प भी रखा गया है । लेकिन आवेश के उन्माद में रहे पुरुष तलाक को अपने वश मे लेने की परिपाटी के कारण कईं महिलाओं का जीवन अन्धकारमय बना हुआ है ।
ऐसे ही अन्धकार की नियति भोगने को बाध्य हुई, महोत्तरी पर्सादेवाड़– ९ मदरसा टोल की फरिदा खातुन । निकाह के दो वर्ष पश्चात २०६० साल में पति मोहम्मद फारुख शेख के तलाक देने के बाद गर्भवती फरिदा की जीवन यात्रा ही तहस नहस हो गई । २५ वर्षीया पत्नी को वेवास्ता करते हुए फारुख उस वक्त दूसरी महिला के प्रेम में था ।
दाम्पत्य जीवन की ड़ोर कसती जा रही थी । जब शेख ने गुस्से के झोंक में तीन बार तलाक क्या बोला, ड़ोर चटक गई– कभी न जुड़ने जैसा खण्ड़ित हो के । तलाक के तीखे तीर ११ वर्षों से उन की छाती में गड़ा हुआ है जो आज भी वक्त वेवक्त चुभता रहता है ।
कानून मे पति के तलाक कहने के ही आधार में पत्नी को उसे छोड़ने को बाध्य नहीं होने का प्रावधान होते हुए भी इसी को अर्थात तीन तलाक को ही वैधानिक बनाने के लिए पुरुष वर्ग लगे हुए हंै । सरिया कानून एवम् धार्मिक ग्रन्थ कुरान मे जो नियम नही हैं उस को जबरदस्ती लादकर पुरुषों मे जितना अभिमान बढ़ता है, महिलाएँ इसी के कारण हरपल त्रास मे जीने के लिए बाध्य होती हंै । वे लोग ना तो कहीं उजुरी कर सकती हंै, न तो न्याय ही पाती है । इतना तक हुआ की बाँके परसपुर की केशरजहाँ दर्जी को मलेसिया मे रहे पति सलीम दर्जी ने चिठ्ठी में लिख के ही तलाक देने का दुस्साहस कर ड़ाला । सलिम दर्जी कैसरजँहा को तलाक देता है, इस आशय के तीन हर्पm वाक्य लिख कर उस ने कुछ महीने पहले चिठ्ठी भेजी थी ।

कानून मे तीन बार तलाक बोल देने से सम्बन्ध नही टूटता है । फिर भी इस प्रथा ने अब तक अपजी जमीन बनाई हुई है । सवाल उठता है ऐसा क्यों ?

प्रायः तीन बार तलाक बोल देने से तलाक हो जाता है, ऐसी आम धारणा गलत है । इस्लामी संघ नेपाल के अध्यक्ष मौलाना नजरुल हसन कहते हैं– उक्त चलन गैरकानूनी और अपराध है । सरियत के कानून अनुसार तलाक के तीन महीने की प्रक्रिया होती है, उस की विधि पूरी करने के बाद ही सही अर्थ में तलाक होता है । हसन बताते हैं– विधि पूरी ना कर के तीन बार तो क्या हजार बार तलाक बोल देने से भी वो मान्य नही होता है ।
उनका कहना है कि दिन भर काम के बोझ से घर वापस आए पति को, ये नही लाए, वो नही लाए एवम् ऐसा नही किया कह कर तनाव देने के कारण अधिंकाश पुरुष गुस्से में तलाक दे देते हैं ।
तलाक के नाम से आई विकृतियों ने अशिक्षा, गरीबी एवम् कड़े नियमों के प्रतिबन्ध में रही मुस्लिम महिलाओं का जीना दूभर हो जाता है । एक ही क्षण मे घरबार विहीन बनाने बाले ऐसे नियम से महिलाएं मानसिक यन्त्रणा में जीने को विवश हैं । मौलवी, इस्लामी संघसंस्था वा मुस्लिम महिला अधिकारवादी वाले भी उक्त गलत नियम के विरुद्ध ड़ट के विरोेध न करना व न लगना भी भारी बिड़म्बना है ।
मुस्लिम महिला कल्याण समाज की अध्यक्ष सीमा खान बताती हैं– इस्लाम धर्म में तलाक छोड़पत्र की एक विधि है । पुरुष को ही नही, तलाक देने का अधिकार महिला को भी है । प्रक्रिया मात्र भिन्न है । लहड़ के रूप मे बिना सोचे एवम् बिना कारण तलाक देने बाला पापी समझा जाता है । कुरान मे इस को अधिकार के तहत नही विधिस्वरुप प्रयोग करने का उपदेश दिया गया है ।
इस्लामी संघ के अध्यक्ष हसन को लगता है कि यह समस्या ग्रामीण क्षेत्र मे ज्यादा है । अशिक्षित वर्ग ही तीन तलाक को बढ़ावा देते हैं । वो कहते हैं– शिक्षित समुदाय सरिया कानून को ही अपनाते है, ऐसा देखा गया है ।
बढ़ती समस्या
पर्सादेवाड़– ७ महोत्तरी की हसमुन खातुन को पति मुस्तकिम शेख ने साउदी अरब से टेलीफोन में ही तलाक दिया । उसी स्थान की खुस्मुदा खातुन भी भारत कें मुम्बइ मे कार्यरत पति के टेलीफोन तलाक से ही सम्बन्ध विच्छेद करने को बाध्य हुईं । महोत्तरी जिला धमौरा गाउँ– ३ की रहेना खातुन को तीन संतान जन्माने के बाद तेरा चेहरा अच्छा नही है कहते हुए तलाक दिया गया ।
प्रविधि के पहुँच और संचार माध्यम के व्यापक प्रयोग के साथ ही तलाक की मान्यता खुली होती जा रही है । वैदेशिक रोजगार बाले, चिट्ठी वा फोन मार्फत पत्नी को तलाक देना इसी का उदाहरण है ।
सरियत ने तलाक सम्बन्धी विधि सहित की व्यस्था करते हुए भी उसका उलंघन वर्षो से होता आ रहा है । पर्सादेवाड़– ९ महोत्तरी मदरसा के मौलाना बद्रे आलम कहते हैं– तीन तलाक प्रवृत्ति से पत्नी से पिण्ड़ छुड़वाने का कार्य आजकल एकदम बढ़ गया है ।
पर्सा, महोत्तरी, धनुषा, बाँके लगायत के जिलों में तलाक सम्बन्धी घटना बढ़ती ही जा रही है । मुस्लिम महिलाओं के हक में पैरवी का कार्य करने वाली समुदायिक विकास परियोजना की साधना बर्मा के मुताविक– सिर्फ महोत्तरी जिला में इस वर्ष ४ सौ ५० तलाक की घटना सार्वजनिक हुई है । जिस मे धमौरा और पर्सादेवाड़ गाविस अत्यधिक प्रभावित गाँव माना गया है । बर्मा कहती हैं– मात्र सार्वजनिक घटना इतनी है, ऐसे कईं सारे तलाक सम्बन्धी घटना तो प्रकाश में आते ही नहीं हैं ।
कईं मौलना तलाक की घटना बढ़ने का कारण दहेज प्रथा को बताते हैं । विदेश मे कमाने बाले लड़के को अधिक पैसा कमाने का लोभ होता है, इस्लामी संघ नेपाल के अध्यक्ष मौलाना नजरुल हसन कहते हैं– ऐसे लड़कों को जमाई बनाने के लिए मेहेर के रकम लड़की के पिता निकाह के समय बेटी के लिए कह के देने बाले नगद रकम वा वस्तु ज्यादा देकर प्रलोभन मे ड़ाल बेटियों का विवाह करबाने का चलन बढ़ोतरी कर रहा है । इस प्रकार का विविध कारणों से विकराल समस्या उपजती हुई दिख रही है ।
वैदेशिक रोजगारी के क्रम से भी अप्रत्यक्ष रूप में तीन तलाक को बढ़ावा दे रहा है । अवस्था इस हद तक पहुँच गई है कि इष्र्याद्वेश पालने बाले, तुम्हारी पत्नी किसी और के साथ लगी हुयी है, ऐसी अफवाह विदेश मे कमाते पति को पहुँचाते है और शंका के आधार पर ही विदेश से उनके पति टेलीफोन वा चिठ्ठी मार्फत तीन तलाक दे देते है । हसन विश्लेषण करते हुए कहते हैं– ये क्रम अभी बढ़ा हुआ है ।
तीन विधि
इस्लामी कानून (सुरा–ए–तलाक) आयते– १२ रुकु– २ के मुताविक धार्मिक ग्रन्थ कुरान मजीद मे तलाक का तीन प्रक्रिया निर्धारित किया गया है । पहला तलाके हसन, दूसरा तलाके अहसन एवम् तीसरा तलाके बदई अर्थात अन्तिम तलाक । इस मे महिला गर्भवती तथा मासिक धर्म के समय में तलाक ना देने को कहा गया है । मौलाना बद्रे आलम कहते हैं– इस अवस्था मे दिया गया तलाक मान्य नहीं होता है ।
तलाके हसन में पति पत्नी को पहला तलाक देता है । उसके बाद पत्नी को घर से निकाला नही जाता, सम्पूर्ण जिम्मेवारी पूर्ववत चलती रहती है । पहले तलाक के बाद पति–पत्नी गल्ती महसूस कर पुनः साथ रहना चाहे तो राजी खुशी रह सकते हैं । इस विधि के विषय मे मोहम्मद फारुख खाँ द्वारा हिन्दी भाषा में अनूदित कुरान मजीद में कहा गया है– जो व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ना मिलने की ठान के बैठे हैं, ऐसों के लिए चार महीने का समय दिया गया है । इस बीच वे लोग रुजू अर्थात मिलना चाहें तो मिल सकते है । दूसरा तलाके अहसन में महिला मासिक धर्म से पाकपवित्र हो जाने के बाद मात्र तलाक दिया जाता है । पहले तलाक के एक महीना बाद ही दूसरा तलाक दिया जाता है । इस मे भी पहले का ही प्र्रक्रिया अपनाया जाता है । दूसरे तलाक की अवधि में दोनों ने पश्चाताप महसूस कर पुनः मिलना चाहे तो मिल सकते है । दूसरे तलाक के बाद भी साथ रहने की अवस्था ना रह जाए तो एक महीना के बाद तीसरा तथा अन्तिम तलाक दिया जाता है । विधि सहित के तीसरे तलाक के बाद पूर्ण रुप मे सम्बन्ध विच्छेद होता है । तीसरे तलाक से पहले कही दोनो मिल जाएं तो आगे का दोनो तलाक स्वतः बदर माना जाएगा ऐसा कुराने मजीद मे उल्लेख है ।
तीन तलाक पश्चात भी दोनो मिलना व साथ रहना चाहें तो उस में भी कोई समस्या नही, इस के उपाय के विषय मे भी कुरान में उल्लेख है । कुरान कहता है– पत्नी को तलाक देने के बाद पति के लिए वे जायज नही रहती, जब तक कि वे फिर दूसरे पति के साथ निकाह न कर ले और दूसरा पति उसे तलाक ना दे दें । दूसरे पति के साथ तलाक के सभी प्रक्रिया पूर्ण कर अलग होने के बाद वे फिर वापस निकाह कर सकते है ।
परन्तु बिड़म्बना, तीन तलाक के दुष्प्रभाव से इस नियम को कन्ट्रयाक्ट म्यारिज के रूप में दुरुपयोग होने की बात सीमा खान बताती हैं ।
महिला को भी तलाक देने का अधिकार
इस्लामी कानून में महिला को भी तलाक देने का अधिकार है, इस को खुला कहा जाता है । पति के साथ ना रह सकने के कारण सहित सरिया अदालत में उजुरी देना पड़ता है । कारण सही लगने पर मात्र तलाक को मान्यता दिया जाता है । जिस के लिए तीन महीना इन्तजार नही करना पड़ता ।
निष्प्रभावी सरिया कानून
मौलान नजरुल हसन के मुताविक– किसी समय इस्लामी शासक ने ड़र दिखाने के लिए तीन तलाक की विधि को मान लिया था । मुसलमान के एक पक्ष उसी को नियम बना के मानते रहें । उक्त चलन गैरकानूनी होते हुए भी सजा की व्यवस्था कानून में उल्लेख नहीं है । इसी लिए समाज ऐसे अपराधी को घृणा के सिबा कुछ नही कर सकते । दण्ड़हीनता के कारण ही तलाक के इस विकराल समस्या ने समाज मे जड़ें गाड़ रखी है । नजरुल कहते हैं– इस्लामी सरीया अदालत न होने के कारण भी इस प्रकार की विकृतियां बढ़ रही है ।
सीमा खान कहती हैं– इस प्रकार की धार्मिक अफवाह हटाने के लिए धर्मगुरुओं को ही पहल करना चाहिए । कुरान में तीन तलाक को तलाक माने वा सही विधि है कहकर कहीं भी उल्लेख नही है । खान आगे कहती हैं– हम लोग पारिवारिक कानून की मांग भी इसी समस्या को नियन्त्रण करने के लिए किए है ।
मौलवी बद्रे आलम तो तलाक विधि में ही विरोधाभास देखते हैं । तीन महीना मे प्रक्रिया पूरी कर देने बाले तलाक भी तलाक है दुसरी तरफ एक ही बार तीन तलाक कह के देने बाले तलाक को भी बदर नही किय जाता । वे कहते हैं– कुरान अध्ययन की कमी, नियम का प्रचारप्रसार, सही व्याख्या के अभाव में तलाक की सही प्रक्रिया के उपर धूल जमी हुई है । ऐसी प्रवृत्ति को सुधार करने का पहला कर्तव्य धर्मगुरुओं का ही होता है, कुरान के विभिन्न नियमों की व्याख्या करके समाज को जागृत करने का उनका सुझाव है ।
सरीया कानुन लागु न होने कारण घर कर गर्इं कतिपय विकृतियाँ रोकने के लिए महिला अधिकार कर्मी परिवारिक कानून के पक्ष मे आवाज उठा रहीं हैं । नेपाली कानून मे बनाए गए कईं नियम व बात इस्लाम धर्म नही मानता । तलाक का केस तीन महीना के भीतर समाप्त हो जाना चाहिए पर नेपाली कानून मे उजुरी चलते ही समय निकल जाता है । मुस्लिम महिला कल्याण समाज की अध्यक्ष सीमा खान चाहती है, तलाक का मुददा कानूनी प्रक्रिया के भीतर आएं । इसी लिए पारिवारिक कानून मांग रहे हंै । संविधान में मुस्लिम महिला के हक को ध्यान मे रख पारिवारिक कानूनी ड़«ाफ बनाना जरुरी है । उनमी सलाह है– जिसमे मेहेर की रकम फिर्ता, बच्चों की जिम्मेबारी पुरुष को लेनी चाहिये एवम् तलाकशुदा महिला के लिए आर्थिक व्यवस्था होने के बाद ही समस्या समाधान हो सकता है । मौलाना नजरुल हसन भी पारिवारिक कानून के ही पक्ष में हैं । इस से समस्या समाधान के साथ ही विकृति नियन्त्रण संभव है । उन्होंने कहा– संविधान मे ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहें है पर नेता लोग मर्म नही समझ रहे हैं ।
सुधार का प्रयास
तलाक पीड़ित महिलाओं का पुनर्विवाह एवम् पुर्नस्थापना के लिए महोत्तरी सामुदायिक विकास परियोजना सहयोग करती आरही है । इसी संस्था मार्फत कईं महिलाओं का पुनर्विवाह भी हुआ है । आंकड़े के मुताविक धमौरा गाविस मे १५ जन, पर्सादेवाड़ मे ५ तलाक पीड़ित महिलाओं का पुनर्विवाह करबा चुके है संस्था के अध्यक्ष विजय चौधरी । वे कहते है शुरु में मौलवियों ने अवरोध किया था पर हाल पुलिस प्रशासन के ड़र से चुप बैठे हैं ।
इसी अभियान अन्तर्गत बहुत पहले मौलवी पति से तलाक पा चुकी जोहरा खातुन न्याय के बाद पुनः पति के साथ रहती हैं । परियोजना संयोजक साधना बर्मा कहती हैं मुस्लिमों की अपनी अलग ही कानूनी प्रक्रिया होने की वजह से जल्द सुधार होने के आसार कम हैं ।

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