दर्द भरी दास्तां थी मधुवाला की जिन्दगी

मधुबाला की खूबसूरती का बखान करने का मतलब अब सिर्फ कागज़ की बर्बादी या हार्ड डिस्क भरने के अलावा और कुछ नहीं रह गया है. लिखने वालों और समीक्षकों ने एक अभिनेत्री की अभिनय क्षमता को उसकी खूबसूरती से आगे रखना कभी ज़रूरी नहीं समझा. मधुबाला और मीना कुमारी को परदे पर दिखने वाली दो एकदम विपरीत अभिनेत्रियां माना जा सकता है. यह अलग बात है कि हमेशा खुश दिखने वालीं मधुबाला निजी जिंदगी में मीना कुमारी ही थीं. फिल्म बहुत दिन हुए (1954) की शूटिंग के वक़्त उन्हें अपनी बीमारी का पता चला कि उनके दिल में छेद है जो उस वक़्त लाइलाज़ था.

फ़िल्मी कलाकारों की दुनिया अपनी फ़िल्मी दुनिया में ही सिमटी होती है. 60 के दशक से पहले तो यह पूरी तरह ही सिमटी होती थी. मधुबाला के मामले में ये कुछ ज्यादा ही सिमटी थी. उनका नाम हमेशा ही अपने साथी कलाकारों से जोड़ा गया. इसलिए उनके साथी कलाकारों के नज़रिए से देखने पर मधुबाला की जिंदगी की एक बेहतर तस्वीर दिख सकती है.

शम्मी कपूर

शम्मी कपूर उन बड़े अभिनेताओं में से वह नाम है जिसे न मधुबाला के साथ परदे पर बनी जोड़ी की वजह से ज्यादा जाना जाता है और न ही इस अभिनेत्री के साथ किसी अफेयर की वजह से. लेकिन परतों पर परतें इस जोड़ी में भी हैं. शम्मी कपूर की साइन की हुई पहली फिल्म हम तुम और वो मधुबाला के साथ ही थी. इसका मुहूर्त तो हुआ लेकिन यह उसके आगे न बन सकी. बाद में नकाब (1955) और ब्वॉय फ्रेंड (1961) में यह जोड़ी साथ देखी गयी, लेकिन इस जोड़ी की पहली फिल्म थी रेल का डिब्बा (1953). बड़े निर्देशकों के साथ पूरे आत्मविश्वास के साथ काम कर चुके शम्मी कपूर मधुबाला के साथ और सामने स्तब्ध थे. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘मैं मधुबाला के सामने बहुत ज्यादा नर्वस था, इतना कि मैं अपने डॉयलाग्स भी भूल गया था. जब मैंने उनकी ओर देखा मेरे मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे. हां, उनका मेरे ऊपर ऐसा असर हुआ था. और यह बात मधुबाला को समझ आ गयी थी. उन्होंने मेरी मदद की और एक महीने बाद, मुझे प्यार हो गया.’

प्रेम नाथ और दिलीप कुमार दोनों मधुबाला के लिए दिल में जगह रखते थे. लेकिन दोनों को ही यह नहीं पता था कि एक और उम्मीदवार की एंट्री हो चुकी है. धर्म की दीवार बड़ी थी इसलिए शम्मी कपूर इस बात को आगे नहीं ले जा सके.

भारत भूषण

भारत भूषण के साथ मधुबाला ने चार फिल्मों में काम किया. इनमें पहली थी ‘गेटवे ऑफ़ इंडिया’ (1957). इन फिल्मों ने मधुबाला को भारत भूषण की पत्नी, सरला, के रूप में एक अच्छा दोस्त दिया. मधुबाला और सरला बेहद करीब थीं, लेकिन सरला के दूसरे बच्चे के जन्म के समय अचानक मृत्यु हो जाने से मधुबाला काफी अकेली हो गईं. इसके बाद मधुबाला ने कहा था, ‘मेरी एक ही दोस्त थी और अब वो भी नहीं रही.’

प्रेमनाथ

प्रेमनाथ और मधुबाला की जोड़ी ने तीन फिल्मों (बादल, आराम और साक़ी) में तो कोई कमाल नहीं किया, लेकिन यह जोड़ी फिल्मों से बाहर बनने को तैयार थी. एक इंटरव्यू में प्रेमनाथ ने माना था कि वे दोनों शादी भी कर सकते थे, अगर इस प्रेम कहानी के बीच अचानक दिलीप कुमार न आ गए होते. ये वो वक़्त था जब मधुबाला प्रेमनाथ और दिलीप कुमार दोनों को ही रहस्य में रखे हुए थीं. प्रेमनाथ के अनुसार उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार की ओर झुकते हुए देखा था और इसके बाद उन्होंने खुद को बीच से हटा लेना ही उचित समझा. प्रेमनाथ और मधुबाला हमेशा अच्छे दोस्त रहे और कहते हैं कि अंततः दिलीप कुमार का मधुबाला से शादी न करने का फैसला प्रेमनाथ को काफी नागवार गुजरा.

गुरुदत्त

मि. एंड मिसेस 55 को तकरीबन सभी समीक्षकों ने मधुबाला की सबसे बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया है. गुरुदत्त परदे के आगे और पीछे काम करने वालों का चुनाव करने में कभी विफल नहीं हुए. मि. एंड मिसेस 55 के शुरू होने के वक़्त मधुबाला के सितारे कुछ अच्छे नहीं थे और उनकी कई फिल्में सफल नहीं हुई थीं. तमाम सुझावों को दरकिनार कर गुरुदत्त ने मधुबाला को कास्ट किया. फिल्म बेहद सफल रही और दोनों की केमिस्ट्री भी. गुरुदत्त ने ही मधुबाला की कॉमिक टाइमिंग को सबसे पहले पहचाना था जिसे हमने बाद में महलों के ख्वाब (1957) और चलती का नाम गाड़ी (1960) में भी देखा. गुरुदत्त निजी ज़िन्दगी में जिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे वही हालात तकरीबन मधुबाला के साथ भी थे. अजीब इत्तेफाक था कि आगे चलकर मात्र चार साल के अंतराल में दोनों ने ही 40 की उम्र के पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया.

किशोर कुमार

मधुबाला की जिंदगी को किशोर कुमार के पहले और बाद, के दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है, जहां पहले में वे कुछ पाना चाहती थीं और बाद के हिस्से में जो मिला उसको संजोना चाहती थीं. अगर असफल नहीं तो कम से कम सफल वे दोनों ही हिस्सों में नहीं थीं. किशोर कुमार के साथ मधुबाला ने चार फिल्मों में काम किया जिनमें चलती का नाम गाड़ी (1960) और हाफ टिकट (1962) काफ़ी सफल भी रहीं. ये वो वक़्त था जब किशोर कुमार ने अपनी दूसरी शादी मधुबाला के साथ की. मोहन दीप की मधुबाला पर लिखी बायोग्राफी में मधुबाला और किशोर कुमार के बिगड़े हुए रिश्तों पर काफी बात है. हालांकि मधुबाला के कई करीबियों ने इस तथ्य को मानने से इनकार किया कि किशोर मधुबाला के साथ बुरा बर्ताव करते थे लेकिन यह भी सच था कि अपने आखिरी दिनों में मधुबाला ज़्यादातर अपने पिता के घर में ही रहीं और किशोर कुमार उन्हें देखने आते रहे.

देव आनंद

‘अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना.’ यह गाना समझने के लिए काफी है कि देव आनंद और मधुबाला परदे पर दिखने वाली सबसे बेहतरीन जोड़ियों में से एक थे. दोनों ने नौ फिल्मों में काम किया. देव आनंद अपने हिस्से का प्यार कर चुके थे, प्यार को खो चुके थे और कल्पना कार्तिक के साथ शादी भी कर चुके थे. शायद इसलिए वे और अभिनेताओं से ज्यादा परिपक्व थे. वे मानते थे कि मधुबाला में एक निर्दोष चंचलता थी जो साथी कलाकारों को रिझाने से नहीं चूकती थी. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘मधुबाला को उनका ख्याल रखा जाना पसंद था, उन्हें प्यार था खुद को मिलने वाले प्यार से. ये एक मजेदार बात थी कि उनको निर्दोष भाव से फ्लर्ट करना पसंद था. लेकिन वे अचानक ही संजीदा हो जाती थीं, एकदम से’. एक अन्य साक्षात्कार में निर्देशक राज खोसला का भी मानना था कि मधुबाला अचानक ही आसपास के माहौल से निर्लिप्त हो जाती थीं. यह शायद वही अकेलापन था जो सामने आ जाता था.

अशोक कुमार

हिंदी फिल्मों के इतिहास में नायिका का नायक को रिझाने के लिए गाया गया कोई भी आइटम सॉन्ग इतना शालीन और सुरीला नहीं रहा जितना कि ‘आइये मेहरबां, बैठिये जानेजां..’ (हावड़ा ब्रिज, 1958). मधुबाला की पहली सफल फिल्म, महल 1949, अशोक कुमार के साथ थी. अशोक कुमार ने मधुबाला को बॉम्बे टाकीज में बतौर बाल कलाकार देखा था और बाद में वे उनकी नायिका भी बनीं. अशोक कुमार का एक साक्षात्कार में कहना था, ‘मधुबाला कभी मेरी दोस्त नहीं रही, हां, वो मेरी पत्नी के काफी करीब थी.’ अशोक कुमार ने मधुबाला को गीताबाली के साथ सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री माना.

राजकपूर

राजकपूर के साथ मधुबाला ने शुरूआती दौर (1947-48) में चार फ़िल्में कीं जिनमें नीलकमल (1947) उल्लेखनीय है . राजकपूर, उनकी बतौर अभिनेत्री पहली (नीलकमल) और आखिरी (चालाक), दोनों ही फिल्मों के हीरो थे. अपने आखिरी दौर में मधुबाला को अपनी बीमारी की वजह से कई फिल्मों को अधूरा ही छोड़ना पड़ा. 1966 में फिल्म चालाक को पूरा करने के लिए उन्होंने फिर बाहर कदम निकाला था. लेकिन बढ़ती बीमारी की वजह से उन्हें फिर काम छोड़ना पड़ा और चालाक अधूरी ही रही.

सुनील दत्त

मधुबाल के फ़िल्मी जीवन में सुनील दत्त रंग लेकर आये. मुग़ले आज़म के कुछ सीन्स को छोड़ दिया जाए तो ज्वाला मधुबाला की पहली रंगीन फिल्म थी जिसके नायक सुनील दत्त थे. हालांकि फिल्म को पूरा करने से पहले ही मधुबाला ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. बाद में एक डुप्लीकेट के साथ फिल्म को पूरा करके 1971 में रिलीज़ किया गया. मधुबाला को विभिन्न रंगों में देखने की चाह ने कुछ दिनों तक फिल्म को सिनेमा में रोके रखा.

वैसे ज्वाला से बहुत पहले 1959 में बनी ‘जाग उठा इंसान’ मधुबाला की सुनील दत्त के साथ पहली फिल्म थी जिसकी शूटिंग के लिए मधुबाला को कई दिनों तक नागार्जुन सागर डैम के निर्माणाधीन लोकेशन पर काम कर रहे मजदूरों के साथ शूटिंग करनी पड़ी. लौट कर मधुबाला ने कहा कि यह एक शानदार अनुभव था जहां उन्होंने हज़ारों लोगों की जिंदगियों को पास से देखा जो एक नए भारत के निर्माण में लगे हुए हैं. फिल्म की एक और कलाकार मीनू मुमताज़ के अनुसार वे गेस्ट हाउस में बॉम्बे से लाये अपने ग्रामोफोन पर लता मंगेशकर के गाने सुना करती थीं, और अक्सर उनकी आंखों में आंसू देखे जा सकते थे.

दिलीप कुमार

नया दौर (1957) की सफलता के साथ एक कोर्ट केस भी चल रहा था, जहां दिलीप कुमार और मधुबाला एक दुसरे के सामने खड़े थे. नया दौर में एडवांस फीस लेने के बाद भी मधुबाला ने अपने पिता के कहने पर मुंबई से बाहर जाकर शूट करने से मना कर दिया था. इसलिए कि मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान को लगता था कि यह शेड्यूल निर्माता बी आर चोपड़ा ने सिर्फ इसलिए रखा है कि दिलीप कुमार मधुबाला के साथ रोमांस कर सकें. रिश्तों में गजब की खटास आ चुकी थी. लेकिन मधुबाला का मन अब भी साफ़ था. फिल्मफेयर के एक पत्रकार के मुताबिक़ नया दौर की घटना के बाद मधुबाला ने उन्हें विशेष तौर पर घर बुलाकर इसलिए इंटरव्यू दिया था क्योंकि वे जानती थीं कि पत्रकार दिलीप कुमार के करीबी हैं. उन्हें उम्मीद थी कि वे उनका यह संदेश दिलीप कुमार तक पहुंचाएंगे कि वे अब भी उनसे कितना प्यार करती हैं. हालांकि इस संदेश को दिलीप कुमार ने दो शब्दों में सख्ती से खारिज कर दिया.

बेहद सफल जोड़ी होने के बाद भी मधुबाला और दिलीप कुमार की सिर्फ चार फिल्में ही आयीं. तराना (1951) की सफलता से शुरू हुयी इस जोड़ी ने अपनी आखिरी फिल्म मुग़ले आज़म (1960) में भी सफलता के झंडे गाड़े. एक साक्षात्कार में दिलीप कुमार का कहना था, ‘मधुबाला की खूबसूरती ने उसकी कई और खूबियों को दबा दिया. हालांकि वो खूबसूरत थी लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसका चेहरा बहुत तराशा हुआ था.’

तराना (1951) की सफलता के बाद दिलीप कुमार और मधुबाला की कई फिल्मों की घोषणा हुई थी. लेकिन अलग अलग कारणों से सिर्फ चार को छोड़ कोई भी फिल्म नहीं बन सकी. मुग़ले आज़म भी मधुबाला की झोली में मीना कुमारी और निर्माता के आसिफ के बीच विवाद हो जाने के बाद आई. मीना कुमारी मुग़ले आज़म के लिए 15 दिन की शूटिंग कर चुकी थीं.

मधुबाला ने और भी कई अभिनेताओं के साथ फिल्में कीं जैसे कि प्रदीप कुमार, रहमान, अभी भट्टाचार्य, अजित और नासिर खान. मोतीलाल के साथ की गी उनकी फिल्म हंसते आंसू (1950) को ए सर्टिफिकेट मिला. इससे खुद मधुबाला यह फिल्म नहीं देख सकीं क्योंकि वे उस वक़्त 17 वर्ष की थीं. बलराज साहनी के साथ की गई उनकी एकमात्र फिल्म ये बस्ती ये लोग पूरी न हो सकी, इसका भी कइयों को अफसोस होगा.

मधुबाला शायद अपनी निजी जिंदगी में मीना कुमारी की तरह नहीं दिखना चाहती थीं. अलबत्ता उनकी जिंदगी कई मायनों में मीना कुमारी से भी ज्यादा तकलीफदेह थी. एक साक्षात्कार में देव आनंद का कहना था, ‘वो काफी हिम्मती थी. लोगो को ये पता लगना मुश्किल था कि वो बीमार है. वो अपने काम से प्यार करती थी और हमेशा हंसती रहती थी. फिर अचानक एक दिन वो कहीं खो गयी.’

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