‘दलित’ शब्द की वास्तविकता

दलित शब्द उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारवादी आंदोलन काल की उपज है । विवेकानंद, एनी वेसेंट तथा रानाडे ने इस शब्द का अनेक बार प्रयोग किया है । वैसे ‘दलित’ शब्द आधुनिक है लेकिन दलितपन प्राचीन है । आज इस शब्द का लगभग सौ वर्ष पूर्व से पर्याप्त प्रयोग हो रहा है तथा तभी से इस शब्द की व्याप्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद आरंभ हुआ । व्युत्पत्ति के आधार पर इसका सही अर्थ तथा वास्तविक व्यक्ति को जानना आवश्यक है । ‘दलित’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत धातु ‘दल’ से हुई है जिसका अर्थ ‘तोड़ना’, ‘हिस्से करना’ ‘कुचलना’ है । संस्कृत शब्दकोशों के समान ही हिन्दी–अंग्रेजी शब्दकोशों में भी ‘दलित’ शब्द का अर्थ विनष्ट किया हुआ’ दिया गया है ।dalitwomen
मानक हिन्दी–अंग्रेजीकोश में ‘दलित’ शब्द के लिए ‘डिप्रेस्ड शब्द दिया है और ‘दलित वर्ग’ के लिए ‘डिप्रेस्ड क्लास’ । दलित शब्द के लिए ‘डाउन ट्रोडन’ शब्द भी व्यवहृत होता है । जिसका अर्थ ‘पददलित’ है । अंग्रेजी–हिन्दीकोश में डिप्रेस्ड क्लास का अर्थ शोषित वर्ग व दलित वर्ग दिया गया है । वृहत् अंग्रेजी शब्दकोश में दलित वर्ग के अतिरिक्त ‘हरिजन’ और ‘अस्पृश्य जातियां’ अर्थ दिए गए हैं । मानक अंग्रेजी–हिन्दीकोश में दलित शब्द के लिए ‘डिप्रेस्ड’ शब्द ही दिया गया है, जिसका अर्थ दबाना, नीचा करना, झुकाना, विनत करना, नीचे लाना, स्वर नीचा करना, धीमा करना, दिल तोड़ना तथा दलित वर्ग का अर्थ नीची जातियों के लोग, अछूत, हरिजन, पीडि़त, दबाए हुए, पददलित, कुचले–सताए हुए लोग दिए हुए हैं । ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में दलित का अर्थ ‘डिप्रेस्ड’ प्रायः नीची जातियों के अछूत वर्ग दिया गया है ।
संस्कृत तथा अंग्रेजी शब्दकोशों के समान हिन्दी शब्दकोशों में भी दलित का अर्थ ‘विनष्ट किया हुआ’ के अर्थ में किया गया है । हिन्दी शब्दकोशों में दलित का अर्थ इस प्रकार दिया हुआ है– मसला हुआ, मर्दित, दबाया हुआ, रौंदा हुआ, खंडित, विनष्ट किया हुआ । जिसका दलन हुआ हो अथवा जिसे पनपने या बढ़ने न दिया गया हो, ध्वस्त या नष्ट किया हुआ । प्रचारक हिन्दी शब्दकोश में दला हुआ, कुचला हुआ, नष्ट किया हुआ, दमन द्वारा शांत किया हुआ, अपरिमार्जित दिया गया है । उच्चतर हिन्दीकोश में जिसका दमन हुआ हो, जो कुचला गया हो, दिया गया है । हिन्दी शब्दसागर में मसला हुआ, मर्दित, रौंदा हुआ, कुचला हुआ, खंडित, टुकड़े–टुकड़े किया हुआ, विनष्ट किया हुआ, जो दबाकर रखा गया हो, दिया गया है । वृहत् हिन्दीकोश में रौंदा हुआ, कुचला हुआ, दबाया हुआ, पदाक्रांत तथा नालंदा विशाल शब्दसागर में मसला, रौंदा या कुचला हुआ एवं नष्ट किया हुआ दिया गया है । इसी प्रकार राजपाल हिन्दीकोश में कुचला हुआ, दबाया हुआ (जैसे दलित वर्ग) नष्ट किया हुआ (दलित जाति) दिया गया है । भार्गव डिक्शनरी में ‘डिप्रेस्ड’ शब्द दिया गया है, जिसका अर्थ होता है– नीचा करना, विनीत करना, उदास करना, मूल्य कम करना तथा ‘डिप्रेस्ड क्लास’ का अर्थ अस्पृश्य व अछूत जाति दिया गया है । नेपाली वृहत् शब्दकोश में दलित शब्द का अर्थ ‘दलिएको, दमन गरिएको, थिचिएको, कुल्चिएको, विध्वंस गरिएको, नष्ट गरिएको’ दिया गया है । जबकि दलित वर्ग का अर्थ ‘समाजमा हक, इज्जत र प्रतिष्ठा समान रूपले पाउन नसकेको जाति वा समूह, सामाजिक व्यवस्थाको असमसताले सोसिएको वा पछि परेको जनसमुदाय’ दिया गया है ।
इस प्रकार दलित शब्द के विभिन्न शब्दकोशों में विभिन्न अर्थ–संदर्भ प्राप्त होते हैं । दलित वर्ग दलित से ही संबद्ध है । शब्दकोशों में समाज के उस वर्ग को जिसे सबसे निम्न समझा जाता है और जिसे उच्च वर्ग के लोग विकसित नहीं होने देते हैं, दलित वर्ग कहा गया है । दलित शब्द आधुनिक युग की ही देन है लेकिन दलितपन अत्यंत प्राचीन है । भारत में सन् १९३३ में तद्युगीन सरकार ने जो निर्णय लिया था, उसमें ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ शब्द का प्रयोग ‘पददलित’ के लिए किया था । पददलित शब्द ‘दलित’ शब्द के पर्यायवाची शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है । भारत में सन् १९३० के लगभग समाजवादी विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ और उस विचारधारा के अंतर्गत आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से जो वर्ग दबा हुआ, कुचला हुआ एवं शोषित है, ऐसे वर्ग के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हुई तथा उस वर्ग को ही दलित वर्ग के रूप में देखा गया, जिसमें प्रायः भारतीय वर्ण और जाति व्यवस्था के अनुसार शूद्रों की गणना की जाती है । इस प्रकार भारत में दलित शब्द का प्रयोग उन्नीसवीं शताब्दी से ही होता रहा है । यद्यपि ‘दलित’ शब्द आधुनिक है लेकिन उस शब्द से जुड़ी भावना प्राचीन काल से ही उत्पन्न हो गई थी ।
प्राचीनकाल में दलितों के लिए शूद्र, अतिशूद्र, चांडाल, अंत्यज, अस्पृश्य आदि शब्दों का प्रयोग किया है । भारतीय वर्ण व्यवस्था के जाति व्यवस्था में बदलने पर शूद्र की दयनीय अवस्था हो गई थी । यहीं से दलित के लिए विभिन्न अभिधानों का प्रयोग आरंभ हुआ, जो दलित शब्द के ही पुरखे हैं । शूद्र अर्थात् दलित को भारतीय समाज के उच्च वर्ग द्वारा अस्पृश्य–अपवित्र समझा गया । आधुनिक युग में मानवतावादी विचारधारा के प्रादुर्भाव के कारण महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ‘बहिष्कृत’ शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे जातिगत वैषम्य समाप्त किया जा सके । भारतीय वर्ण–व्यवस्था में शूद्रों को चतुर्थ श्रेणी में रखा गया है । प्रायः उन्हें अछूत समझा गया । जाति व्यवस्था के नियम अधिक कठोर होने पर शूद्रों की अवस्था अति दयनीय हो गयी थी । यद्यपि प्रारम्भ में शूद्रों को पर्याप्त सामाजिक अधिकार प्राप्त थे तथा वे अछूत नहीं समझे जाते थे । आज भारतीय संविधान में शेड्युल्ड कास्ट÷दलित शब्दों का प्रयोग किया गया है ।
इस प्रकार नेपाल में भी प्राचीन काल में ‘दलित’ के लिए चांडाल, अनार्य, अस्पृश्य, शूद्र आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है । मुलुकी ऐन (सिविल कोड) वि.सं. १९१० में ‘दलित’ के लिए ‘पानी नचल्ने, छोइछिटो हाल्नुपर्ने जात’ का प्रयोग किया गया है । प्रजातन्त्र पुनस्र्थापना पश्चात् ‘उपेक्षित, उत्पीडि़त, सीमान्तकृत, बहिष्कृत, शोषित, पीडि़त, बलनेरेवल ग्रुप, डाउनड्रोडन, निग्लेक्टेड, सप्रेस्ड, ऑप्रेस्ड आदि शब्दो का प्रयोग किया है । इसी प्रकार नेपाल के अंतरिम संविधान, २०६३ और नेपाल के संविधान में ‘दलित’ शब्द का ही प्रयोग हुआ है । फिलहाल कुछ राजनीतिक दलों के दलित नेताओं ने दलित शब्द की जगह ‘शिल्पी समुदाय’ कहकर संबोधित करते हैं । ध्यातव्य है कि ‘शिल्पी समुदाय’ शब्द दलित या दलित वर्ग के लिए प्रतिनिधित्व नहीं करता है ।
समग्रतः कहा जा सकता है कि आरंभ में ‘दलित’ शब्द ‘अस्पृश्य’ शब्द तक के अर्थ में ही सीमित था लेकिन आज आधुनिक युग में दलित वर्ग के अंतर्गत केवल अस्पृश्य वर्ग ही नहीं अपितु सामाजिक रूप से अविकसित, पीडि़त, शोषित, निम्न जातियों के वर्गों की गणना होती है । आज स्थिति बदल गयी है, दलित चेतना के कारण दलित वर्ग में सामाजिक क्रांति–सी उत्पन्न हुई है । अर्थात् प्रजातन्त्र पुनस्र्थापना के पश्चात् अनेक सुधारवादी संगठनों, समाज सुधारकों, मानवाधिकार कर्मियों के अथक प्रयत्न से दलित वर्ग की स्थिति में प्रर्याप्त अंतर आया है । आज नेपाली समाज में दलित वर्ग कुछ हद तक घुल–मिल–सा गया है । दलित वर्ग की स्थिति को सुधारने के लिए राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक अधिकार प्रदान किए गए हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर अभी भी दलित वर्ग की शोषण–प्रक्रिया रुकी नहीं है । अशिक्षा और निर्धनता के काले बादलों में वह अपनी अस्मिता के लिए स्वयं भी प्रयत्नशील है, जिससे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे समानता तथा वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके ।

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