दहेज मुक्त मिथिला

दहेज की समस्या समाज के लिए अभिशाप है। खासकर मिथिलांचल में दहेज की बढती मांग लोगों के लिए समस्या बनती जा रही है। दहेजप्रथा को रोकने के लिए समाजिक चेतना के साथसाथ महिलाओं में जागरुकता जरुरी है। जनसंसार में आयोजित परिचर्चा में उक्त बाते दहेज मुक्त मिथिला संस्था की उपाध्यक्ष करुणा झा ने कही। नेपाल में दहेज मुक्त मिथिला अभियान चला रही करुणा झाका कहना है कि सांस्कृतिक सामाजिक रुप से समृद्ध एवं आर्थिक रुप से दयनीय मिथिलांचल में दहेज मुक्ति आन्दोलन वक्त की जरुरत है। मिथिला के दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, पूणिर्या, भागलपुर व सीतामढी में कल कारखाने नही है। यहां बाढ का डर बना रहता है। रोजगार की तलाश में लोग बाहर चले जाते है। ऐसे में लडकियों की शादी में दहेज के अलावा बारातियों के भोजन की मात्रा, मद्यपान, मांसाहार व विदाई का खर्च इतना ज्यादा होता है कि व्यवस्था करते करते आदमी आर्थिक बोझ में दब जाता है। उनकी संस्था ने इस परंपरा पर रोक लगाने की मुहिम शुरु की है। इसमें अब युवा वर्ग भी दहेज न लेने व देने के शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करके इस आनदोलन से जुड रहा है। कार्यक्रम में पत्रकार गीतेश शर्मा ने कहा कि ऋग्वेद में दहेज का जिक्र किया गाया है धर्म से ही दहेज की परंपरा शुरु हर्ुइ है लेकिन अब दहेज समाज के लिए नासूर बन गया है। सामाजिक चेतना से दहेज पर बंदिश लगायी जा सकती है। इसमें नौजवानों को खुद आगे आकर दहेज के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। बैदेही परिषद के उपाध्यक्ष महेश चन्द्र झा ने कहा कि समाज को दहेज मुक्त करने के लिए लडकियों को ज्यादा से ज्यादा शिक्षित किया जाना चाहिए, आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए, दहेज मुक्त मिथिला से अभी १००० सदस्य जुडे है। कार्यक्रम मे पवन झा सहित कई बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
भारतीय संस्कृति के प्राचीन जनपदों में से एक राजा जनक की नगरी मिथिला का अतीत स्वणिर्म धनबल, जनबल और आत्मबल में मिथिला की ख्याति पूरी दुनियाँ में थी। देवभाषा संस्कृत की पीठस्थली मिथिलांचल में एक से बढकर एक संस्कृत के विद्वान हुए जिनकी विद्वता भारतीय इतिहास की धरोहर है। उपनिषद के रचयिता मुनि याज्ञवल्क्य, गौतम, कणाद, कपिल, कौशिक, वाचस्पति, महामहो पाध्याय, गोकुल वाचस्पति, विद्यापति, मंडन मिश्र, अयाची मिश्र, जैसे नाम इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में रवि के प्रखर तेज के समान आलोकित है। चंदा झा ने मैथिली मे रामायण की रचना की। हिन्दू संस्कृति के संस्थापक आदिगुरु शंकराचार्य को भी मिथिला में मंडन मिश्र की विद्वान पत्नी भारती से पराजित होना पडा था। कहते हैं उस समय मिथिला में पनिहारिन से संस्कृत में बार्तालाप सुनकर शंकराचार्य आर्श्चर्यचकित हो गए थे।
कालांतर में हिन्दी व्याकरण के रचयिता पाणिनी, जयमंत मिश्र, महामहोपाध्याय मुकुन्द झा “बक्शी” मदन मोहन उपाध्याय, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर”, बैद्यनाथ मिश्र “यात्री” अर्थात नागार्जुन, हरिमोहन झा, काशीकान्त मधुप, कालीकांत झा, फणीश्वर नाथ रेणु, बाबू गंगानाथ झा, डा. अमरनाथ झा, बुद्धिधारी सिंह दिनकर, पंडित जयकान्त झा, डा. सुभद्र झा, जैसे उच्च कोटि के विद्वान और साहित्यिक व्यक्तित्वों के चलते मिथिलांचल की ख्याति रही। आज भी राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात्रि्राप्त कतिपय लेखक, पत्रकार, कवि मथिलांचल से संबन्धित है। मशहूर नवगीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्रा, कवयित्री अनामिका सहित समाचार चैनल तथा अखबारों मे चर्चित के केन्द्रों में भी मैथिल की सक्रियता देखने में आती है।
मगर इसका फायदा इस क्षेत्र को नहीं मिल पा रहा। राज्य और केन्द्र सरकारद्वारा अनवरत उपेक्षा और स्थानीय लोगों की विकाशविमुख मानसिकता के चलते कभी देश का गौरव रहा यह क्षेत्र आज सहायता की भीख पर आश्रति है। बाढग्रस्त क्षेत्र होने के कारण प्रतिबर्षयह क्षेत्र कोशी, गंडक, गंगा आदि नदियों का प्रकोप झेलता है। ऊपर से कर्मकाण्ड के बोझ से दबा हुआ यह क्षेत्र चाहकर भी विकास की नयी अवधारणा को अपनाने में सफल नही हो पा रहा। जो लोग शैक्षणिक, आर्थिक और ासमाजिक रुप से सक्षम हैं भी वे आत्मकेंन्द्रित अधिक हैं इसीलिए उनका योगदान इस क्षेत्र के विकास में नगण्य है। मिथिलांचल से जो भी प्रबुद्धजन बाहर गए उन्होने कभी घूमकर इस क्षेत्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। पूरे देश और विश्व में एक से बढकर ओहदे पर मैथिल मिल जाएँगे मगर अपनी मातृभूमि और मातृभाषा के विकास की उन्हें अधिक चिंता नही है।
ऐसे में सामाजिक आंदोलन की जरूरत को देखते हुए स्थानीय और प्रवासी शिक्षित एवं आधुनिक विचारों के एक युवा समूह ने नए तरीके से मिथिलांचल में सुधारबादी आन्दोलनों की शुरुआत की है।
दहेज मुक्त मिथिला के बैनर तले संगठीत हुए इन युवाओं ने मिथिलांचल में कोढ का रुप ले चुकी दहेज प्रथा को समाप्त करने के लक्ष्य के साथ समाज में ब्यापक सुधार का बीडा उठाया है। मिथिलांचल की प्राचीन संस्कृति के प्रचार-प्रसार, धरोहरों की सुरक्षा एवं नवीन विचारों को अपनाकर समाज में नयी चेतना फैलाने के साथ-साथ नारी शिक्षा को प्रमुखता देने के लिए इस मुहिम से जुडे लोग पूरे देश में मैथिल समाज को एकत्रित करने में जुट गए है। इसका सकारात्मक प्रभाव भी परिलक्षित हो रहा है। देहज मुक्त मिथिला कें सदस्य देश के बडे शहरों एवं महानगरों में ही नही अपितु छोटे छोटे शहरों मे तथा गाँव-गाँव में जाकर लोगों को इस प्रथा के खिलाफ एकजूट करने में लगे है।
संस्थाका लक्ष्य मिथिलांचल में सामूहिक विवाह के आयोजन के जरिये दहेज की विभीषिका को खत्म करना है। एक समय मिथिला में स्वयंबर की प्रथा थी। कन्या अपनी मर्जी से स्वयंबर में अपने लिए योग्य पति का चुनाव करती थी। सीता का स्वयंबर इसका ऐतिहासिक प्रमाण है।
कलांतर मेै अन्य समाजों की भांति मिथिला में भी विवाह के नाम पर कुरीतियों का खेल शुरु हुआ और फिर कुप्रथाओं ने मिथिला की उत्तम संस्कृति को ऐसा जकडा कि यह समाज परिहास का पर्याय बन गया। गीतनाद की मनोरम संस्कृति दहेज की बजह से आर्तनाद की संस्कृति में तब्दील होती गयी। बेटियाँ गर्भ में ही मारी जाने लगीं। जीवन के हर अवसर पर गति पाने बाले समाज में बेटियों का जन्म शोक का कारण बनने लगा।
समाज का एक वर्ग अपने रुतवा को कायम रखने के लिए दहेज को बढावा देता गया और गरीब इसकी आग में जलने को बेबस हो गए। बेटी के हाथ पीले करने में घर की जायदाद बिकने लगी और बहुत सी बेटियाँ तो बिन ब्याहे जिंदगी भर पिता का बोझ बनकर रह गई।
ऐसे में समाज में जागृति की पुकार वक्त की जरुरत थी और दहेज मुक्त मिथिला उसी जागृति की एक किरण है। संस्था ने मैथिल समाज के लिए कुछ आदर्श विवाह आचार-संहिता का पैस्ताव दिया है और लोगों से अपील की है कि वे मिथिलांचल एव) मैथिल समाज के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सोच में बदलाव लाएँ। बेटा-बेटी को एक समान समझें एवं बेटों के समान बेटियों की शिक्षा को भी समान महत्व दें।  ±±±

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