दानी कहू“ शंकर–सम नाहीं

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
शंकरजी के समान कोई दानी नहीं है । शिवजी एक ही बार में इतना दे देते हैं कि फिर कभी किसी से मांगने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती । शिव से दान पानेवाला हमेशा के लिए याचक हो जाता है । इसलिए यदि मांगना हो तो शिवजी से ही मांगो, क्योंकि ऐसा उदार औघरदानी और शीघ्र प्रसन्न होने वाला कोई दूसरा है नहीं । दाता में दीनो पर दया करने का गुण एवं देने की सामथ्र्य होनी चाहिए । भगवान शंकर में ये दोनों गुण विद्यमान है । ‘संभु सहज समरथ भगवान ।’ शिवजी कृपालु और दीनदयाल दोनों है, भगवान होने से सर्व समर्थ है । आशुतोष है, थोड़ी–सी पूजा कर देने मात्र से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारो फल दे देते हैं ।
भगवान शंकर मरणासन्न जीव के कान में रामनाम मन्त्र फूँककर काशी में उसे मोक्ष प्रदान कर देते हंै– जासु नाम बल शंकर कासी, देते सर्वाह सय गति अविनासी ।
सौलभ्य गुण उनका ऐसा है कि एक लोटा जल चढ़ाने से, गंगाजल, मदार पुष्प एवं बेलपत्र चढ़ाने से, धतुरा और चार अक्षत के दाने चढ़ाने मात्र से इहलोक के सुख और परलोक सहज ही देते हैं । जैसे कल्पवृक्ष अपनी छाया में आए हुए व्यक्ति को अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है, वैसे ही आप शरणागत की समस्त इच्छाएँ पूरी कर देते हैं ।
शिवजी की स्तुति करते हुए अयोध्यापति महाराज दशरथ ने उन्हें अवढरदानी कहा है– सुमिरि महेसहि कहड निहारी । विनती सुनहु सदाशिव मोरी ।
आशुतोष तुम्ह अवढर पानी । आरति हरहु दीन जनु जानी । (रा.च.मा. २।४४।७।८)
यहाँ शिवजी के लिए महेश, सदाशिव, आशुतोष एवं अवढरदानी– ये चार विशेषण दिए है, जो अत्यन्त सार्थक है । महेश अर्थात् महान ईश्वर हैं आप, जो कार्य कोई नहीं कर सकता, वह आप कर सकते हैं । दूसरा विश्लेषण है सदाशिव अर्थात् आप कल्याणकारी हंै, तीसरा विशेषण है आशुतोष अर्थात् शीघ्र ही सन्तुष्ट होनेवाले हैं– आप अवढ़रदानी हैं अर्थात् आप के दान की सीमा नहीं है । आपके समान कोई दानी नहीं है, ऐसे महान दानी हैं कि याचक की याचना पर अप्रत्याशित अभिलाषित वस्तु भी दे बैठते हंै और देते–देते अघाते भी नहीं । जितना भी बड़े–बड़े शक्तिशाली राक्षसाें को शक्ति प्रदान किया है वे सब शिवजी की ही तपस्या कर के पाते हंै वे महा पुरुष जिसका अपना कोई लालच न हो, देते हैं वे महादानी जिसका अपना कोई स्वार्थ न हो, निःस्वार्थ हो । जिसकी प्रवृति स्वभाव से ही दान देने की है । इन्हें बिना दान दिए चैन नहीं पड़ता । देने की धुन सदा सवार रहती है ।
दूसरे दानी तो याचकों को एक बार देकर छुट्टी पा जाना चाहते हैं । दोबारा कहीं कोई याचक मांगने आया तो वे चिढ़ जाते हंै, किन्तु शंकर जी दोबारा आए हुए याचकों को आते देख उनका पुनः पुनः आदर करते हैं । शिवजी की दानशीलता उलाहना ब्रह्मजी माता पार्वती को देते हुए कहते हंै, ‘वावरो रावरो नाहु भवानी’ हे भवानी । आप के पति शंकरजी तो बावले से हो गए हंै । बावलापन क्या है ? इसे आगे कहते हंै, आप के पति बड़े भारी दानी हो गए हंै । दान देने के कुछ नियम हैं । ये उन नियमों का तोड़कर मनमानी कर रहे हैं । मनमानी क्या है ? जिन लोगों ने भूल से भी कभी किसी को दान नहीं दिया, वे ही तो इस जन्म में भिक्षुक बने हैं । वेद रीति यह है कि दान में आदान व प्रदान दोनों होना चाहिए अर्थात् जिसने कभी दान नहीं दिया, उसे दान लेने का अधिकार नहीं । ऐसे अदानी कृृपण ही भिक्षुक बनते हैं । शिवजी ऐसे ही भिखमंगे को निरन्तर दान दिए जा रहे है । वे वेदमार्ग का अनुसरण नहीं करते, फिर उनके दान देने की कोई सीमा भी नहीं । रावण एवं वाणसुर सभी दैत्यों को इन्होंने बिना विचारे अपार सम्पत्ति दे रखी है । हे भवानी आप अपने घर का ध्यान रखिए अन्यथा आप के घर में शमशान की राख, भांग–धतूरा और फूल–पत्तियों के अलावा कुछ बचेगा ही नहीं बर्तन के नाम पर एक खप्पर एवं वाहन के नाम पर बैल मात्र बचा है । आप अन्नपूर्ण हैं अवश्य, पर कब तक इनकी पूर्ति करेंगी ?
यह तो हुई आपके स्वामी की स्थिति, यदि आप इनके साथ न होती तो इनकी स्थिति क्या थी ? घर की हालत ऐसी खस्ता और दान देने का ऐसा शौक । इनके दान को देखकर सरस्वती और लक्ष्मी को भी ईष्र्या हो रही है । सरस्वती इसलिए खिन्न है कि शिवजी इतना दान दे रहे हैं कि मैं इसका वर्णन करते–करते थक गई हूँ तथा लक्ष्मीजी इसलिए इष्र्या कर रही है कि जो वस्तुएँ बैकुण्ठ में भी दुर्लभ है । वे शिवजी इन कगालों को बाँट रहे हंै ।
ब्रह्मजी कहते हैं, जिनके भाग्य में मैने सुख लिखा ही नही, शिवजी ने उन्हें स्वर्ग भेज दिया । अर्थात् बह्मा का लिखा भाग्य पलटकर अनाधिकारियों को स्वर्ग भेज रहे हंै । स्वर्ग में पुण्यात्मा के लिए मैंने स्थान रखा है, अब इन नये भिक्षुकों के लिए मै स्वर्ग में कहाँ स्थान दूँ मेरे तो नाको दम आ गया है ।
शिवजी ने पापियों को पुण्यआत्मा बना दिया, दुखी और कंगालो को राजा बना दिया, प्रकृति के सारे नियम ही पलट दिए । दुख और दीनता याचकता के ही अंग है । भावार्थ यह है कि शिवजी की दानशीलता ने सभी दीनों और कंगालों को सुखी और राजा बना दिया, कोई दीन–हीन रंक रहा ही नहीं । भगवान सदा भक्तों को वर देते हंै ।
भगवन भाव की भूखी, रे मनमा भगवन भाव की भूखी । शिवगीता में कहा गया है, जन्मों जन्म तपस्या के बाद, शिवभक्ति करने की इच्छा उत्पन्न होती है । (शिव शिव)

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