दामन पर लगा दाग

प्रियंका पाण्डेय

हिन्दी में एक कहावत हैं, “सर मुंडाते ही ओले पडे ।” झलनाथ खनाल के नेतृत्व में सरकार गठन को अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी पूरे नहीं हुए कि सरकार में शामिल एमाले के वरिष्ठ नेता एवं उपप्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री पर करोडों रुपये घोटाले का आरोप लगा है । देश के बडे व्यापारिक घरानों से करोडो रुपये वसूलकर उनके द्वारा किए गए टैक्स चोरी का मामला दबाने के लिए वित्त सचिव को जबरन इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया है । वित्त सचिव रामेश्वर खनाल के इस्तीफे की चर्चा ने नेपाली राजनीति में भूचाल ला दिया है । इस पूरे प्रकरण से कई और तथ्य सामने आए हैं जो चौंकाने वाले हैं ।
जब से वित्त सचिव रामेश्वर खनाल ने देश के २० बडे व्यापारिक घरानों द्वारा किए गए टैक्स चोरी के खिलाफ कानूनी कार्रवाही करने की ठानी तब से ही वित्त मंत्री भरतमोहन अधिकारी के साथ उनकी ठन गयी । दरअसल अधिकारी को वित्त मंत्रालय दिए जाने के पीछे के रहस्यों पर से अब परदा उठने लगा है । यह बात भी साफ हो गई है कि आखिर किन कारणों की वजह से प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल ने अन्य मंत्रियों की तुलना में पहले ही अधिकारी को मंत्रालय का बँटवारा कर दिया । दरअसल इसके पीछे देश के २० बडÞे व्यापारिक घरानों का जबरदस्त दबाव था । ये वही घराने हैं जिनपर अरबों रुपये टैक्स चोरी करने व फर्जी वैट -मूल्य अभिवृद्धि कर) बिल पेश करने की जाँच चल रही है । वित्त सचिव खनाल जो कि एक इमान्दार, कर्तव्यनिष्ठ व अपने काम के प्रति पूरी निष्ठा रखने के लिए जाने जाते हैं, उनकी ही पहल पर टैक्स चोरी करने वालों से टैक्स वसूली के लिए कारवाही प्रक्रिया को आगे बढÞाने की जिद पर अडÞे थे । खनाल चाहते थे कि औद्योगिक घरानों से १० अरब रुपये की वसूली की जाए । लेकिन उपप्रधानमंत्री ने किसी भी व्यापारिक समूह के खिलाफ कार्रवाही करने की बात पर अपनी वीटो लगाने की पूरी कोशिश की । इसके अलावा भी कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिनपर वित्त मंत्री और सचिव के बीच गहरे मतभेद थे ।
वित्त मंत्री द्वारा बार-बार कार्रवाही में किए जा रहे हस्तक्षेप के बाद भी जब वित्त सचिव खनाल ने अपनी जिद नहीं छोडÞी तो अधिकारी ने उन्हें इस्तीफा देने को कहा । अर्थ सचिव खनाल को भी लगा कि मंत्रालय में काम करने का सहज वातावरण नहीं बन पा रहा है । तो उन्होंने मंत्री के आगे झुकने की बजाए पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया । रामेश्वर खनाल के इस्तीफे की खबर मीडिया में आते ही उपप्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री की जिम्मेवारी संभाल रहे भारतमोहन अधिकारी की कर्ुर्सर्ीीहलने लगी । चारों ओर से इसका विरोध हुआ । रामेश्वर खनाल का इस्तीफा हालांकि मंजूर नहीं हुआ है लेकिन इस मुद्दे को लेकर संसद में जमकर हंगामा भी हुआ । विपक्षी दल कांग्रेस सहित अन्य दलों ने संसद की कार्रवाही तब तक नहीं चलने देने का ऐलान किया जब तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री अपना जवान नहीं देते ।
वित्त मंत्री के रवैये ओर वित्त सचिव के इस्तीफे पर प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल की चुप्पी उनको भी शक के दायरे में लाते हैं । भारतमोहन अधिकारी को जल्दवाजी में दिए गए मंत्रालय का कार्यभार और बडÞे व्यापारिक घरानों पर कार्रवाही करने वाले वित्त सचिव रामेश्वर खनाल को अपने दफ्तर में बुलाकर झाडÞ लगने तक में प्रधानमंत्री पर भी शक की र्सर्ूइ जाती है । कहीं प्रधानमंत्री भी तो इस पूरे मामले की लीपापोती में नहीं लगे हैं ।
वित्त सचिव के इस्तीफे के बाद संसद की र्सार्वजनिक लेखा समिति ने भी वित्त मंत्री को जबाव तलब के लिए दो बार बुलाया था लेकिन अधिकारी ने संसदीय समिति में जाने के बजाए अपने पक्ष के कुछ मीडिया वालों को बुलाकर अपनी सफाई देते नजर आए । लेकिन मामला तूल पकडता ही जा रहा है । आखिर क्यों भरतमोहन अधिकारी बडÞे व्यापारिक घरानों को बचाना चाह रहे हैं । कहीं देश का अरबों रुपये आने की राह में रोडÞा तो नहीं अटका रहे हैं – कहीं इसके पीछे व्यापारिक घरानों द्वारा उन्हें कुछ ‘सहुलियत शुल्क’ तो नहीं दी गई या फिर उनकी पत्नी के नाम से दर्जनों उद्योगों में रहे करोडÞो मूल्य बराबर के शेयर डूबने की चिंता है यह तो वक्त ही बताएगा । लेकिन मंत्री पद संभालने के चन्द दिनों बाद ही उनके दामन पर दाग तो लग ही गया है ।            mmm

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