दामान पर लगा दाग:
वीरेन्द्र केएम

सरकार द्वारा हत्या के आरोप में र्सवाेच्च अदालत से सजा पा चुके माओवादी सभासद बालकृष्ण ढुंगेल को आममाफी दिए जाने के फैसले का ना सिर्फराजनीतिक रूप से विरोध हो रहा है बल्कि मानव अधिकार से जुडे संगठन भी इसका व्यापक विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा जिस व्यक्ति उज्जन कुमार श्रेष्ठ की हत्या का आरोप ढुंगेल पर लगाया गया है उनकी दीदी ने तो सरकार के इस फैसले के खिलाफ र्सवाेच्च अदालत में रिट ही दायर कर दी है। करीब एक दशक से अपने भाई के हत्यारे को सजा दिलाने के लिए प्रयासरत सावित्री श्रेष्ठ को उस समय थोडी राहत मिली जब र्सवाेच्च अदालत ने माओवादी सभासद को हत्या के आरोप में दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
लेकिन उनकी यह खुशी अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। एक तो वैसे ही सावित्री को अदालत द्वारा सजा पा चुके सभासद के अब तक खुलेआम घुमने और गिरफ्तार ना किए जाने का दर्द अभी भी था ऊपर से सरकार द्वारा आममाफी के फैसले ने उसके जख्म को और भी गहरा कर दिया। अपने भाई के हत्यारे को सजा दिलाने के लिए सावित्री अपनी बुढी मां और पिता के साथ काठमाण्डू में कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी अन्य राजनीतिक दलों के चौखट पर जाकर न्याय की गुहार कर रही है।
ढुंगेल माओवादी के तरफ से ओखलढुंगा क्षेत्र नम्बर दो से र्प्तयक्ष चुनाव लडकर जीत कर आए हुए सभासद हैं। ओखलढुंगा माओवादी के इंचार्ज और किरात राज्य सचिवालय सदस्य समेत रहे वो र्सवाेच्च अदालत द्वारा २०५५ साल आषाढ में ओखलढुंगा टारकेबारी के उज्जन कुमार श्रेष्ठ की हत्या किए जाने की बात प्रमाणित हो चुकी है। प्रधानमंत्री भट्टर्राई के करीबी माने जाने वाले ढुंगेल को सरकार द्वारा आममाफी दिए जाने से इस समय देश की राजनीति वृत में भूचाल सा आगया है। सरकार की सिफारिश इस समय राष्ट्रपति के समक्ष विचाराधीन है। ऐसे में राष्ट्रपति की मुश्किलें एक बार फिर से बढ गई है।
राष्ट्रपति के समक्ष इसके लिए चार विकल्प हैं। लेकिन इन चारों विकल्पों में विवाद तभी उत्पन्न नहीं होने की स्थिति आएगी जब प्रधानमंत्री और माओवादी पार्टर्ीीे साथ उनका तालमेल बैठ जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो राष्ट्रपति के एक बार फिर से विवादों में आने और सरकार के साथ टकराहट होने की प्रबल संभावना है। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आम नेपाली जनता में उनका विश्वास अवश्य ही कम हो जाएगा।यदि राष्ट्रपति ने सरकार की सिफारिश मान ली तो आम जनता के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति जो थोडा बहुत विश्वास लोगों के मन में पैदा हो रहा है उस विश्वास को गहरा धक्का लगेगा और साथ ही राष्ट्रपति के व्यक्तिगत सोच और उनके फैसले जो अब तक विवाद रहित और निष्पक्ष रहे हैं उअनके दामन पर दाग लग सकता है। यदि राष्ट्रपति ने सरकार की बात नहीं मानी तो माओवादी के साथ उनकी टकराहट एक बार फिर से हो जाएगी।
इससे पहले भी रूकमांगद कटवाल प्रकरण में राष्ट्रपति और माओवादी के बीच हर्ुइ विवाद के कारण सरकार की बलि चढानी पडी थी। कहीं वही स्थिति तो एक बार फिर से नहीं उत्पन्न हो जाएगी। इसकी संभावना भी काफी अधिक है। क्योंकि प्रधानमंत्री ने मालदीव से लौटते हुए स्पष्ट कह दिया कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेगी। ऐसे में यदि राष्ट्रपति सरकार के पास इस फैसले को पुनर्विचार के लिए भेजते हैं है तो राष्ट्रपति के अधिकार को सीमिति किए जाने का एक नयां बहस देश में शुरू हो जाएगा। कुछ लोग राष्ट्रपति को इस बारे में यह सल्लाह दे रहे हैं कि थोडे समय के लिए इस फैसले को होल्ड पर रखा जाए। ताकि शान्ति प्रक्रिया को लेकर दलों के बीच जो समझौता हुआ है उसमें कोई भी खलल ना पडे। लेकिन विपक्षी दलों के तेवर को देखते हुए यह लगता है कि लगता है कि ढुंगेल को आममाफी दिए जाने के फैसले के कारण कहीं पूरी की पूरी शान्ति प्रक्रिया ही खतरे में ना पड जाए।
ढुंगेल नेपाली सेना के भगौडा की सूची में भी हैं। उनका नाम सैनिक अभिलेख में भगौडा सैनिक के रूप में उल्लेख है। २०४४ साल से नेपाली सेना में नौकरी करने वाले बालकृष्ण ढुंगेल २०४५ साल में नेपाली सेना के काठमाण्डू स्थित सेना के ट्रांजिट कैम्प से २०४५ साल मंसिर १४ गते फरार हो गए। ढुंगेल को गिरफ्तार करने के लिए नेपाली सेना ने पुलिस को बकायदा पत्र भीलिखा था। लेकिन कोई अता पता नहीं होने की वजह से ढुंगेल को ६० दिनों के बाद नेपाली सेना की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उज्जन श्रेष्ठ की मौत से पहले भी एक बार किसी मुकदमें में ढुंगेल कुछ दिनों तक जेल में रहे। बाद में उज्जन की हत्या के बाद आठ सालों तक जेल की सलाखों के पीछे उन्हें रहना पडा। २०६३ में राजनीतिक मुद्दा की वजह से शान्ति समझौता के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था।
लेकिन ढुंगेल अपने ऊपर लगे इन आरोपों का खण्डन करते हैं। ढुंगेल का कहना है कि उज्जन पर माओवादी के खिलाफ सुराकी करने का आरोप था और वो माओवादी के लिष्ट में पहले से ही थे। इस वजह से उनकी हत्या की गई। लेकिन साथ ही ढुंगेल ने यह भी कहा कि हत्या उन्होंने नहीं बल्कि पुष्कर नाम के एक शख्स ने की जो कि इस समय दिल्ली में रह रहा है। पुष्कर भी माओवादी का ही कार्यकर्ता है।
सिर्फउज्जन कुमार श्रेष्ठ की हत्या से ही श्रेष्ठ परिवार आहत नहीं है। उस परिवार पर एक के बाद एक तीन घाव लगे हैं। उज्जन की हत्या के बाद इस हत्या की शिकायत पुलिस के पास करने और ढुंगेल का नाम उस हत्या में दिए जाने के कारण ही उज्जन के बडे भाई गणेश कुमार श्रेष्ठ की भी २०५९ साल में दिन दहाडे हत्या कर दी गई थी। इस सदमें को गणेश की बेटी बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने आत्महत्या कर ली थी। गणेश की हत्या में सीधे तौर पर ढुंगेल का नाम नहीं होने के बावजूद यह हत्या उन्हीं के इशारे पर किए जाने की बात सभी जानते हैं। पुलिस में शिकायत दिए जाने के बाद ढुंगेल ने कई बार गणेश श्रेष्ठ को जान से मारने की धमकी दी थी।
२०६७ साल में एमाले नेता छविलाल कार्की की हत्या में भी ढुंगेल का नाम सामने आया था। लेकिन इस मुकदमें की सुनवाई अभी चल ही रही है। इतने सारे हत्या के मामले में शामिल होने के बावजूद और र्सवाेच्च अदालत द्वारा उन्हें हत्या के ही मामले में दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा दिए जाने के बावजूद माओवादी को इसमें राजनीतिक कारण दिखता है। अब देखना यह है कि ढुंगेल को राजनीतिक कारण की आड में आममाफी दिए जाने के बाद आउर कितने ही ऐसे अपराधी हैं जिन्हें आममाफी दिए जाने की एक नई बहस शुरू हो जाएगी। सरकार के इस फैसले ने कानून व्यवस्था के फैसले को भी चुनौती दिए जाने और उसे बदलने की एक बार परम्परा शुरू हर्ुइ तो हर राजनीतिक दल अपने र्समर्थकों पर लगे व्यक्तिगत मुकदमों को राजनीतिक आवरण देकर उसे जेल से बाहर करवाने की कोशिश अवश्य करेंगे।
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