दार्जिलिंग क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है : प्राची शाह

दार्जिलिंग और गोरखालैंड आन्दोलन

प्राची शाह , दार्जिलिंग भारत के राज्य पश्चिम बंगाल का एक नगर है । यह नगर दार्जिलिंग जिले का मुख्यालय है । यह नगर शिवालिक पर्वतमाला में लघु हिमालय में अवस्थित है । यहां की औसत ऊँचाई २,१३४ मीटर (६,९८२ फुट) है ।
दार्जिलिंग शब्द की उत्पत्ति दो तिब्बती शब्दों, दोर्जे (बज्र) और लिंग (स्थान) से हुई है । इस का अर्थ ‘बज्रका स्थान’ है । भारत में ब्रिटिश राज के दौरान दार्जिलिंग की समशीतोष्ण जलवायु के कारण से इस जगह को पर्वतीय स्थल बनाया गया था । ब्रिटिश निवासी यहां गर्मी के मौसम में गर्मी से छुटकारा पाने के लिए आते थे ।
दार्जिलिंग अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर यहां की दार्जिलिंग चाय के लिए प्रसिद्ध है । दार्जिलिंग की दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे एक युनेस्को विश्व धरोहर स्थल तथा प्रसिद्ध स्थल है । यहां की चाय की खेती १८०० की मध्य से शुरु हुई थी । यहां की चाय उत्पादकों ने काली चाय और फÞर्मेन्टिंग प्रविधि का एक सम्मिश्रण तैयार किया है जो कि विश्व में सर्वोत्कृष्ट है । दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे जो कि दार्जिलिंग नगर को समथर स्थल से जोड़ता है, को १९९९ में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था । यह वाष्प से संचालित यन्त्र भारत में बहुत ही कम देखने को मिलता है ।
दार्जिलिंग में ब्रिटिश शैली के निजी विद्यालय भी है, जो भारत और नेपाल से बहुत से विद्यार्थियों को आकर्षित करते हैं । सन १९८० की गोरखालैंड राज्य की मांग इस शहर और इस के नजदीक का कालिम्पोंग के शहर से शुरु हुई थी ।
परिचय
इस स्थान की खोज उस समय हुई जब आंग्ल–नेपाल युद्ध के दौरान एक ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी सिक्किम जाने के लिए छोटा रास्ता तलाश रही थी । इस रास्ते से सिक्किम तक आसान पहुंच के कारण यह स्थान ब्रिटिशों के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण था । इसके अलावा यह स्थान प्राकृतिक रूप से भी काफी संपन्न था । यहां का ठण्डा वातावरण तथा बर्फबारी अंग्रेजों के मुफीद थी । इस कारण ब्रिटिश लोग यहां धीरे–धीरे बसने लगे ।
प्रारंभ में दार्जिलिंग सिक्किम का एक भाग था । बाद में भूटान ने इस पर कब्जा कर लिया । लेकिन कुछ समय बाद सिक्किम ने इस पर पुनः कब्जा कर लिया । परंतु १८वीं शताब्दी में पुनः इसे नेपाल के हाथों गवां दिया । किन्तु नेपाल भी इस पर ज्यादा समय तक अधिकार नहीं रख पाया । १८१७ ई. में हुए आंग्ल–नेपाल में हार के बाद नेपाल को इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपना पड़ा ।
अपने रणनीतिक महत्व तथा तत्कालीन राजनीतिक स्थिति के कारण १८४० तथा ५० के दशक में दार्जिलिंग एक युद्ध स्थल के रूप में परिणत हो गया था । उस समय यह जगह विभिन्न देशों के शक्ति प्रदर्शन का स्थल बन चुका था । पहले तिब्बत के लोग यहां आए । उसके बाद यूरोपियन लोग आए । इसके बाद रुसी लोग यहां बसे । इन सबको अफगानिस्तान के अमीर ने यहां से भगाया । यह राजनीतिक अस्थिरता तभी समाप्त हुई जब अफगानिस्तान का अमीर अंग्रेजों से हुए युद्ध में हार गया । इसके बाद से इस पर अंग्रेजों का कब्जा था । बाद में यह जापानियों, कुमितांग तथा सुभाषचंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की भी कर्मस्थली बना । स्वतंत्रता के बाद ल्हासा से भागे हुए बौद्ध भिक्षु यहां आकर बस गए ।
वर्तमान में दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का एक भाग है । यह शहर ३१४९ वर्ग किलोमीटर में क्षेत्र में फैला हुआ है । यह शहर त्रिभुजाकर है । इसका उत्तरी भाग नेपाल और सिक्किम से सटा हुआ है । यहां शरद ऋतु जो अक्टूबर से मार्च तक होता है । इस मौसम यहां में अत्यधिक ७०८ रहती है । यहां ग्रीष्म ऋतु अप्रैल से जून तक रहती है । इस समय का मौसम हल्का ठण्डापन लिए होता है । यहां बारिश जून से सितम्बर तक होती है । ग्रीष्म काल में ही यहां अधिकांश पर्यटक आते हैं ।
दार्जिलिंग का इतिहास नेपाल, भुटान, सिक्किम और बंगाल से जुडा हुआ है । दार्जिलिंग शब्द तिब्बती भाषा के दो शब्द दोर्जे, जिसका अर्थ ओला या उपल होता है , तथा लिंग जिसका अर्थ स्थान होता है, से मिलकर बना है । इसका शाब्दिक अर्थ हुआ उपलवृष्टि वाली जगह जो इसके अपेक्षाकृत ठंडे वातावरण का चित्र प्रस्तुत करता है । १९वी शताब्दी के पूर्व तक इस जगह पर नेपाली और सिक्किमी राज्य राज करते थे,१८२८ में एक बेलायती ईस्ट इन्डिया कम्पनी की अफÞसरों की टुकडी ने सिक्किम जाते समय दार्जिलिंग पहुंच गए और इस जगह मैं वेलायती सेना के लिए एक स्यानिटरियम बनाने का संकल्प किया । आर्थर क्याम्पबेल, कम्पनी का एक शल्य चिकित्सक और लेफ्टिनेन्ट नेपियर (बाद में रोबर्ट नेपियर, मग्दाला के प्रथम बेरोन) को यहां पर हिल स्टेसन बनाने की जिम्मेवारी सौंपी गयी ।
१८४१ मैं बेलायतियों ने यहां एक प्रायोगिक चाय कृषि कार्यक्रम की संचालन किया । इस प्रयोग की सफÞलता के कारण यहां १९वी शताब्दी के दूसरी भाग में इस शहर में चाय बगान लगने लगे । दार्जिलिंग को बेलायतियों ने सिक्किम से १८४९ में छीन लिया था इस समय में प्रवासी विषेश करके नेपाली लोग को बगान, खेती, निर्माण आदि कार्य संचालन के लिए भर्ती किया गया । स्कटिश मिसिनरिीयौं ने यहां विद्यालय की स्थापना और बेलायतियों के लिए वेल्फÞेर सेन्टर की स्थापना किया और यह जगह को विद्या के लिए प्रसिद्ध किया । दार्जिलिंग हिमालयन रेल्वे की १८८१ में स्थापना के बाद यहां की विकास उच्च गति से हुआ । १८९८ मैं दार्जिलिंग में एक बड़ा भूकम्प आया –जिसे ‘दार्जिलिंग डिज्यास्टर’ भी कहते है) जिसने शहर और लोगों की बहुत क्षति की ।
बेलायती शासन के अधीन में दार्जिलिंग पहले तो ‘नन–रेगुलेसन जिला’ था— लेकिन १९०५ के बंगाल के बिभाजन के बाद से यह राजशाही विभाग के अन्तर्गत में सम्मिलित हो गया ।
गोरखालैंड आन्दोलन
दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है । इस मुद्दे पर बीते लगभग तीन दशकों से कई बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं । ताजा आंदोलन भी इसी की कड़ी है । दार्जिलिंग इलाका किसी दौर में राजशाही डिवीजन (अब बांग्लादेश) में शामिल था । उसके बाद वर्ष १९१२ में यह भागलपुर का हिस्सा बना । देश की आजादी के बाद वर्ष १९४७ में इसका पश्चिम बंगाल में विलय हो गया । अखिल भारतीय गोरखा लीग ने वर्ष १९५५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक ज्ञापन सौंप कर बंगाल से अलग होने की मांग उठायी थी ।
उसके बाद वर्ष १९५५ में जिला मजदूर संघ के अध्यक्ष दौलत दास बोखिम ने राज्य पुनर्गठन समिति को एक ज्ञापन सौंप कर दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार को मिला कर एक अलग राज्य के गठन की मांग उठायी । अस्सी के दशक के शुरूआती दौर में वह आंदोलन दम तोड़ गया । उसके बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बैनर तले सुभाष घीसिंग ने पहाडÞियों में अलग राज्य की मांग में हिंसक आंदोलन शुरू किया । वर्ष १९८५ से १९८८ के दौरान यह पहाडÞियां लगातार हिंसा की चपेट में रहीं । इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम १३ सौ लोग मारे गए थे । उसके बाद से अलग राज्य की चिंगारी अक्सर भड़कती रहती है ।
आखिर क्यों ?
राज्य की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सुभाष घीसिंग के साथ एक समझौते के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया था । घीसिंग वर्ष २००८ तक इसके अध्यक्ष रहे । लेकिन वर्ष २००७ से ही पहाडि़यों में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बैनर तले एक नई क्षेत्रीय ताकत का उदय होने लगा था । साल भर बाद विमल गुरुंग की अगुवाई में मोर्चा ने नए सिरे से अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन शुरू कर दिया ।
लेकिन आखिर अबकी मोर्चा ने नए सिरे से गोरखालैंड की मांग उठाने का फैसला क्यों किया है? विमल गुरुंग का आरोप है, ‘गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) को समझौते के मुताबिक विभाग नहीं सौंपे गए । पांच साल बीतने के बावजूद न तो पूरा अधिकार मिला और न ही पैसा । राज्य सरकार ने हमें खुल कर काम ही नहीं करने दिया । ऊपर से जबरन बांग्ला भाषा थोप दी ।’ मोर्चा के महासचिव रोशन गिरि कहते हैं, ‘यह हमारी अस्मिता का सवाल है । भाषा, संस्कृति और रीति–रिवाजों में भिन्नता के बावजूद हमें नेपाली कहा जाता है ।’ वह कहते हैं कि नेपाली से पड़ोसी देश का नागरिक होने का संदेह होता है ।
सियासत तेज
अब राजनीतिक दल इस आंदोलन की आग में सियासी रोटियां सेंकने में जुट गये हैं । कांग्रेस ने मौजूदा हालात के लिए जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बदले की राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है वहीं भाजपा ने भी इसके लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रति सरकार के सौतेले रवैये को दोषी करार दिया है । प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी कहते हैं, ‘दार्जिलिंग की परिस्थिति के लिए ममता जिम्मेदार हैं । वह मोर्चा के साथ बदले की राजनीति कर रही हैं ।’ भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी सरकार पर मोर्चा और जीटीए के साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया है । घोष कहते हैं कि सरकार को इस मुद्दे पर एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए । लेकिन वह ताकत का इस्तेमाल कर स्थानीय लोगों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है ।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगले महीने होने वाले जीटीए चुनावों और विपक्षी राजनीतिक दलों के रवैये को ध्यान में रखते हुए पर्वतीय क्षेत्र के हालात में फिलहाल सुधार की संभावना कम ही है । लंबे समय बाद एक बार अगर गोरखालैंड की मांग उठी है तो उसके नतीजे दूरगामी होंगे । अतीत में होने वाले ऐसे आंदोलन बरसों तक खिंचते रहे हैं । अबकी भी आसार कुछ ठीक नहीं नजर आ रहे हैं ।

प्राची शाह

 

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