दिग्भ्रमित मधेशी मोर्चा दिशाहीन मेधश यात्रा

आज मधेशी मोर्चा के नेतागण,- माओवादी, कांग्रेस और एमाले के साथ वार्ताओ में व्यस्त हैं। इन तीनो ने जो खेमा बनाया है, मधेशी शक्ति पूरी तरह इसी में ध्रुवीकृत हैं। दर्ुभाग्यवश माओवादी और कांग्रेस-एमाले के एजेण्डा में पूरी मधेशी शक्ति विभक्त है। जरा सोचें कि इन दोनो पक्षों का प्रस्ताव और एजेण्डा क्या हैं – इन के बीच आपस में जहाँ तक सहमति हर्इ थी, जरा उसे याद करें। शासकीय स्वरूप के बारे में इनकी सहमति थी- राष्ट्रपति आलङ्कारिक हो, प्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव हो। देश के कार्यकारी प्रमुख प्रधानमन्त्री होगें- संसद से प्र.म. चुने जाएंगे।
निर्वाचन के सर्न्दर्भ में मिश्रति निर्वाचन प्रणाली अर्थात् प्रत्यक्ष और समानुपातिक दोनो में इन की सहमति थी। कूल ३११ जनो का संसद जिस में, प्रत्यक्ष निर्वाचित १७१ व्यक्ति और समानुपातिक से १४० व्यक्ति का चयन हो। और ६० का उपरी सदन -अपर हाउस) हो। केन्द्रीय सरकार की कामकाज की भाषा नेपाली ही होना तय हुआ था।
संघीयता कहें या प्रादेशिक संरचना, इन के बीच मतभिन्नता की बडी चर्चा हर्इ। कहा जाता है इसी में असहमति की वजह से संविधान सभा असफल हर्ुइ, विघटित हर्इ। पहाडी क्षेत्रो में इन के बीच मतैक्य नहीं बना। परन्तु मधेश के अंग रहें कैलाली और कञ्चनपुर जिला अखण्ड सुदूर पश्चिमाञ्चल में ही रहे। बीच का चितवन किसी भी शर्त में मधेश में नहीं रहेगा, नारायणी वा अन्य नाम जो भी हो उस के साथ ही रहेगें। और सुनसरी-मोरङ्ग-झापा मधेश से अलग विराट कहेंे वा कोचिला में रहेगें। क्या मधेश का इस निर्मम विभाजन में कही भी माओवादी-कांग्रेस-एमाले में कोई मतभिन्नता थी – कतई भी नहीं। क्या यह झूठ हैं, अखण्ड सुदूर पश्चिमाञ्चल में लेखराज भट्ट -माओवादी), शेरवहादुर देउवा -कांग्रेस) और भीमबहादुर रावल -एमाले)-एक ही साथ नहीं लडे थे – नारायणी प्रदेश के साथ ही चितवन जुडा रहेगा, मधेश में हरगिज भी नहीं। इस अभियान के मञ्च पर माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड और नेपाली कांग्रेस के डा. रामशरण महत ने साथ साथ, एक ही स्वर में ऐक्यवद्धता नहीं जताई थी – पूरव में विराट कहेंे या कोचिला प्रदेश बने, इस के लिए नेपाली काँग्रेस के डा. शेखर कोइराला-कृष्ण सिटौला, एमाले के के.पी. शर्मा ओली-झलनाथ खनाल और माओवादी के सन्तोष चौधरी समेत आन्दोलनरत होकर साथ ही जेहादी नहीं बने थे – पहाडी क्षेत्रो में इन के बीच आपसी हित में जो भी टकराव हो, परन्तु मधेश के विभाजन में ये सभी तो एक ही रहे थे। यह तथ्य है। तो फिर आज मधेशी मोर्चा इन तीनो के बीच बने दो खेमों में क्यो ध्रुवीकृत हो – जो सत्य हैं, सत्ता में नेतृत्व के लिए इन तीनो पार्टर्ीीें के बीच उत्पन्न इस घृणित संर्घष्ा एवं द्वन्द में हम क्यों उन्हे यह मुखौटा पहनावें कि उनका यह ध्रुवीकरण संघीयता के पक्ष और विपक्ष के लिए है। माओवादी सत्ता की निरन्तरता के लिए, और मन्त्री बने रहने के लिए मधेशी मोर्चा के मन्त्रीगण, नेतागण आज जिस ध्रुवीकरण की बाते कर रहे हंै, वह एक आत्मघाती झूठा दलील के सिवाय कुछ भी नहीं है।
आज के मधेशी मोर्चा के नेतागण क्या कह सकते हैं, कि उनके इस दोहरे चरित्र के बदौलत ऊपर में उल्लेख किया गया नेपाल का ‘स्थायी सत्ता’ में बदलाव लाना संभव है – इन लोभी और पापी प्रवृत्ति के प्रयत्नो से मधेशी मोर्चा के नेतागण वस्तुतः संघीयता के लिए-मधेश के लिए काम कर रहे दिखते है – मेरे विचार में इस प्रश्न पर इमान्दारी पर्ूवक विमर्श होना आवश्यक है।
मधेशी मोर्चा ही नहीं संविधान सभा में पहँुचे सभी मधेश दलो नें तय किया था कि उनका संर्घष्ा संसद में, सडÞक में और सरकार में रहकर किया जाएगा। इन तीनांे मोर्चा में ये डÞटे रहेंगे। सच तो यह है कि संविधान सभा के चुनाव के वाद जनबल का निर्माण और आन्दोलन को संसद में दबावकारी भूमिका में पूरक बनाने के हेतु किसी भी मधेशी पार्टी इसे अपना आधार नहीं माना। सडÞक से ये पलायन कर गये। फूट और विभाजन, निरुद्देश्य सत्तायात्रा, संविधान सभा में पर्ूण्ा निष्त्रिmयता आदि कारणो से मधेशी पार्टी संसदीय कार्यवाही में पूरी तरह प्रभावहीन रहीं। सरकार में रहकर की गई भूमिका रुटीन कार्य से आगे न बढ सकी। फिर भी इस का तथ्यपरक रूप में मूल्याङ्कन होना चाहिए। सबसे छोटा उदाहरण-सरकार में रहे सभी मधेशीयो के गिडÞगिडÞाने के बावजूद भी नेपालगञ्ज में मधेशी समुदाय के खिलाफ हुए दङ्गा का रिपोर्ट को र्सार्वजनिक नहीं करवाया जा सका। नागरिकता का विषय, समावेशीकरण सम्बन्धी विषय एवं विधेयक, नेपाली सेना में मधेशी युवाओं की भर्ती का सवाल, तर्राई के शसस्त्र समूहों की मांग का सवाल-ये और ऐसे कई आधारभूत सवाल जिसको हासिल करने हेतु सरकारमेंमधेसी मोर्चा के सहभागिताको उचित ठहराया गया था( आज इन सभी विषयों की घोर उपेक्षा तथा दर्ुदशा हो रही है। मुख्य सचिव की नियुक्ति, नेपाल प्रहरी के महानिरीक्षक की नियुक्ति के मामले ने सम्पर्ूण्ा मधेश को शर्मसार किया है। सरकार का मोर्चा भी असफल ही रहा। फिर हमारे कहें जाने बाले लोग कहाँ है और क्यो है –
वास्तव में आज के मधेश की राजनीति में पार्टी का, नेताओं का मूल्यांकन एक स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ आधार तय करना आवश्यक है। अन्यथा निरन्तर की सत्ता लोलुपता, पलायनवादिता, सैद्धान्तिक-वैचारिक विचलन, अहंकार, परभक्ति, शत्रु-मिलाप जैसे असंख्य दर्र्गुण और क्रान्ति विरोधी चरित्र के बाबजूद भी यदि नेता अपने जात के, स्वजाति है-तो वे मसीहा कहेंे जाएगें। नेता की हजारों गलती, सम्झौतापरस्तता, आत्म र्समर्पणवाद के बाबजूद भी यदि वे दोषी करार नहीं दिए जाएगें तो उनके नेतृत्वमंे मधेश-आन्दोलन सदैव लाञ्छित होता रहेगा। अब हमे यथार्थ की कसौटी पर पार्टी का, नेताओं का मूल्यांकन करना ही होगा। हम जानते है कि आज मधेश में विद्यमान असन्तोष निराशा और क्षोभ का कारण ही-मधेशी पार्टी की असक्षमता और पलायनवादिता हैं। मधेश के बहुतायत नेताओं पर श्रीलङ्का का सम्झौतावादी-सत्तामुखी तमिल नेता अमृतालिंगम का दोषी चरित्र हावी हैं। तर्सथ अब एक नया रास्ता तलाशने की आवश्यकता है। मैं चाहता हूँ- इस विषय पर हमारे बीच खुली बहस हो।

 

मेरी जेल यात्रा राजनीतिक जीवन का अन्त नहीं, नई पारी की शुरुआत

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